Ashura 2026: इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना मुहर्रम बेहद पवित्र माना जाता है. इसी महीने की 10वीं तारीख को आशूरा मनाया जाता है. दुनिया भर के मुसलमानों के लिए यह दिन विशेष महत्व रखता है. हालांकि, शिया और सुन्नी समुदाय इस दिन को अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाते हैं.

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कहीं रोज़ा रखा जाता है तो कहीं कर्बला के शहीदों की याद में मातम और जुलूस निकाले जाते हैं. आशूरा केवल एक धार्मिक अवसर नहीं है, बल्कि यह त्याग, सत्य, न्याय और ईमानदारी के लिए संघर्ष की याद भी दिलाता है. यही वजह है कि इस दिन की अहमियत दोनों समुदायों में है, लेकिन इसकी अभिव्यक्ति अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है.

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आशूरा क्या है?

"आशूरा" शब्द अरबी भाषा के "अशरा" से बना है, जिसका अर्थ है "दस". यह मुहर्रम महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस दिन से जुड़ी कई ऐतिहासिक और धार्मिक घटनाओं का उल्लेख इस्लामी परंपराओं में मिलता है. सुन्नी मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन हज़रत मूसा और उनकी कौम को फिरऔन के अत्याचारों से मुक्ति मिली थी. इसी कारण इस दिन रोज़ा रखने को पुण्यकारी माना जाता है. वहीं शिया समुदाय के लिए यह दिन इमाम हुसैन इब्न अली और उनके साथियों की शहादत की याद से जुड़ा है.

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कर्बला की घटना क्या थी?

इस्लामी इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है कर्बला का युद्ध वर्ष 680 ईस्वी में वर्तमान इराक के कर्बला क्षेत्र में इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया था.

मान्यता है कि तत्कालीन शासक यज़ीद प्रथम की सत्ता को स्वीकार करने से इमाम हुसैन ने इनकार कर दिया था. इसके बाद कर्बला में हुए संघर्ष में इमाम हुसैन और उनके साथियों की शहादत हुई। यह घटना शिया समुदाय के धार्मिक इतिहास का केंद्रीय आधार मानी जाती है.

शिया मुसलमान आशूरा कैसे मनाते हैं?

शिया समुदाय के लिए आशूरा शोक और स्मरण का दिन होता है. इस अवसर पर इमाम हुसैन की शहादत को याद किया जाता है. कई स्थानों पर मजलिस आयोजित की जाती हैं, जिनमें कर्बला की घटना का वर्णन किया जाता है. ताजिया और जुलूस निकाले जाते हैं तथा लोग मातम कर अपने दुख और श्रद्धा को व्यक्त करते हैं.

शिया मान्यता के अनुसार, इमाम हुसैन ने सत्य और न्याय की रक्षा के लिए अपना बलिदान दिया था। इसलिए आशूरा उनके साहस और बलिदान को याद करने का अवसर माना जाता है।

सुन्नी मुसलमान आशूरा कैसे मनाते हैं?

सुन्नी समुदाय में आशूरा का महत्व अलग रूप में देखा जाता है। इस दिन रोज़ा रखने की परंपरा है. इस्लामी परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि पैगंबर मुहम्मद ने आशूरा के रोज़े को महत्वपूर्ण बताया था. कई सुन्नी मुसलमान 9 और 10 मुहर्रम या 10 और 11 मुहर्रम को रोज़ा रखते हैं। इसे आध्यात्मिक शुद्धि और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है.हालांकि सुन्नी समुदाय भी इमाम हुसैन की शहादत का सम्मान करता है, लेकिन उनके धार्मिक अनुष्ठान शिया समुदाय से भिन्न होते हैं.

रोज़ा और मातम के पीछे क्या है बड़ी वजह?

आशूरा पर रोज़ा और मातम की परंपराएं अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं. शिया समुदाय इस दिन इमाम हुसैन और कर्बला के शहीदों की याद में मातम करता है और उनके बलिदान को याद करता है.

वहीं, सुन्नी समुदाय आशूरा को इबादत और रोज़े के माध्यम से मनाता है. दोनों समुदाय इस दिन को श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाते हैं, लेकिन उनकी परंपराएं अलग-अलग हैं.

आशूरा का संदेश

आशूरा का मूल संदेश सत्य, धैर्य, न्याय और ईश्वर के प्रति निष्ठा है. चाहे इसे रोज़े के माध्यम से याद किया जाए या कर्बला के शहीदों की स्मृति में मातम के रूप में, यह दिन इंसान को सिद्धांतों के लिए खड़े रहने और कठिन परिस्थितियों में भी सही मार्ग चुनने की प्रेरणा देता है.

Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. यहां यह बताना जरूरी है कि ABPLive.com किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी या मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह लें.