Benefits Of Properly Boiled Eggs: क्या आपको उबले अंडे पसंद हैं? ज्यादातर लोगों के लिए यह सबसे आसान और झटपट बनने वाला फूड है. लेकिन हैरानी की बात यह है कि बहुत से लोग अंडा सही तरीके से उबाल ही नहीं पाते. कोई उसे ज्यादा उबाल देता है, तो किसी का अंडा अधपका रह जाता है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अंडा उबालने का कोई परफेक्ट तरीका सच में है?. चलिए आपको बताते हैं कि इसके लिए परफेक्ट तरीका क्या है.
देखने में अंडा उबालना बेहद आसान लगता है, लेकिन सही टेक्सचर पाना उतना आसान नहीं होता. अक्सर जर्दी सूखी और चूरा-सी हो जाती है, जबकि एग व्हाइट चिपचिपी रह जाती है. इसकी वजह यह है कि अंडे की जर्दी और सफेदी अलग-अलग तापमान पर पकती हैं और दोनों के बीच सही संतुलन बनाना मुश्किल होता है. लेकिन अब नई रिसर्च ने अंडा उबालने का एक ऐसा तरीका बताया है, जो इस पुरानी समस्या का हल दे सकता है.
अंडा उबालना मुश्किल क्यों होता है?
अंडे के दो मुख्य हिस्से होते हैं जर्दी और सफेदी. जर्दी करीब 65 डिग्री सेल्सियस पर पकती है, जबकि सफेदी को पकने के लिए लगभग 85 डिग्री सेल्सियस तापमान चाहिए. आमतौर पर जब अंडे को 100 डिग्री सेल्सियस पर उबाला जाता है, तो सफेदी तो ठीक से पक जाती है लेकिन जर्दी सख्त हो जाती है. वहीं, अगर कम तापमान पर पकाया जाए, तो जर्दी नरम रह जाती है और सफेदी अधपकी.
अंडा उबालने का साइंटिफिक तरीका
इटली की नेशनल रिसर्च काउंसिल के वैज्ञानिक पेलेग्रिनो मुस्टो की अगुआई में रिसर्च टीम ने पीरियॉडिक कुकिंग नाम का एक नया तरीका बताया है. इस तरीके में अंडे को कुल 32 मिनट तक अलग-अलग तापमान में पकाया जाता है. इस दौरान अंडे को कभी उबलते पानी 100 डिग्री सेल्सियस में रखा जाता है और कभी हल्के गुनगुने पानी करीब 30 डिग्री सेल्सियस में रखा जाता है.
इस प्रक्रिया से जर्दी का तापमान करीब 67 डिग्री सेल्सियस पर स्थिर रहता है, जबकि सफेदी अलग-अलग तापमान से गुजरती है. नतीजा यह होता है कि जर्दी क्रीमी और मुलायम रहती है और सफेदी अच्छी तरह पक जाती है न ज्यादा सख्त, न चिपचिपी. रिसर्चर्स ने आधुनिक तकनीकों से अंडे की बनावट, स्वाद और केमिकल स्ट्रक्चर की जांच की और पाया कि यह तरीका पारंपरिक उबालने से बेहतर रिजल्ट देता है.
क्या इसके फायदे भी हैं?
सिर्फ स्वाद ही नहीं, बल्कि सेहत के लिहाज़ से भी यह तरीका फायदेमंद माना जा रहा है। रिसर्च में पाया गया कि इस तरीके से पकाए गए अंडों में पॉलीफेनॉल्स की मात्रा ज्यादा होती है. पॉलीफेनॉल्स ऐसे माइक्रोन्यूट्रिएंट्स हैं, जिनमें एंटीऑक्सिडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं. एक स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों की डाइट में पॉलीफेनॉल्स की मात्रा ज्यादा होती है, उनमें हार्ट रोग, कैंसर और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों का जोखिम कम देखा गया है.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.