Brain Cancer: वाशिंगटन डीसी से एक बड़ी खबर सामने आई है. ऑन्कोसाइंस नाम की एक साइंस पत्रिका में छपी नई स्टडी में ग्लियोब्लास्टोमा नाम के दिमाग के सबसे खतरनाक कैंसर के इलाज को लेकर एक नया तरीका खोजा गया है. यह कैंसर इतना जानलेवा है कि सर्जरी, रेडिएशन और कीमोथेरेपी के बावजूद मरीज आमतौर पर 1 महीने से ज्यादा जीवित नहीं रह पाते हैं. इसकी एक बड़ी वजह है ब्लड-ब्रेन बैरियर, यानी दिमाग के चारों तरफ मौजूद एक सुरक्षा दीवार, जो ज्यादातर दवाओं को दिमाग के अंदर ट्यूमर तक पहुंचने ही नहीं देती. इस रिसर्च की अगुवाई नाइट्रिक ऑक्साइड सर्विसेज कंपनी के जोसेफ ए. बावर और क्लीवलैंड क्लिनिक फाउंडेशन टॉसिग कैंसर सेंटर के वैज्ञानिकों ने मिलकर की है. 

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विटामिन बी12 से बनी खास दवा

वैज्ञानिकों ने नाइट्रोसिलकोबालामिन नाम का एक कंपाउंड तैयार किया है, जिसे संक्षेप में एनओ-सीबीएल कहा जाता है. यह असल में विटामिन बी12 का ही एक बदला हुआ रूप है, जो शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ता है. इस दवा को टेस्ट करने के लिए वैज्ञानिकों ने कई तरीके अपनाए, जैसे कैंसर सेल्स के एक बड़े पैनल पर इसका असर देखना, चूहों में ग्लियोब्लास्टोमा ट्यूमर पर इसकी जांच करना, और इंसानी कैंसर सेल्स पर इसे दूसरी दवाओं के साथ मिलाकर टेस्ट करना.  नतीजों में पाया गया कि यह दवा कई तरह के कैंसर पर असर दिखाती है, और दिमाग से जुड़े ट्यूमर पर भी इसका मध्यम असर देखा गया. सबसे बड़ी बात यह रही कि जानवरों पर हुए प्रयोग में यह दवा शरीर में देने के बाद सफलतापूर्वक ब्लड-ब्रेन बैरियर को पार करके सीधे ट्यूमर तक जा पहुंची. 

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ट्यूमर में टिककर करती है असर

रिसर्च में एक और खास बात सामने आई कि यह दवा ट्यूमर में जाकर लंबे समय तक टिकी रहती है. ट्यूमर के अंदर नाइट्रेट का स्तर इलाज के बाद कम से कम चौबीस घंटे तक ऊंचा बना रहा, जबकि शरीर के बाकी सामान्य हिस्सों में यह स्तर जल्दी घट गया. इससे पता चलता है कि यह दवा खासतौर पर ट्यूमर में ही रुककर सीधे वहीं नाइट्रिक ऑक्साइड छोड़ती है. इसके अलावा जब लैब में इस दवा को मौजूदा कैंसर इलाज जैसे ट्रेल और टेमोजोलोमाइड के साथ मिलाकर टेस्ट किया गया, तो कैंसर सेल्स की बढ़त पहले से कहीं ज्यादा रुक गई.

यानी यह दवा अकेले काम करने के साथ-साथ मौजूदा इलाज को भी ज्यादा असरदार बना सकती है, यहां तक कि उन ट्यूमर पर भी जो टेमोजोलोमाइड जैसी दवा के खिलाफ प्रतिरोधी हो चुके हैं. हालांकि यह नतीजे उम्मीद जगाने वाले जरूर हैं, लेकिन वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि यह अभी एक शुरुआती पायलट स्टडी है और इसे असली इलाज में इस्तेमाल करने से पहले और गहरी रिसर्च की जरूरत होगी. 

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