भारत सहित दुनियाभर के तमाम देशों में डायबिटीज के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. स्कॉटलैंड की यूनिवर्सिटी ऑफ ग्लासगो के नेतृत्व में नेपाल में एक अहम  स्टडी शुरू होने जा रहा है, जिसका उद्देश्य यह जानना है कि क्या पारंपरिक खानपान की ओर लौटकर टाइप-2 डायबिटीज को रोका जा सकता है या यहां तक कि उसे उलटा भी जा सकता है. रिसर्चर का कहना है कि प्रोसेस्ड फूड कम करना और हल्का वजन घटाना दक्षिण एशिया के लिए कम लागत वाला प्रभावी समाधान साबित हो सकता है.

Continues below advertisement

टाइप-2 डायबिटीज तेजी से बढ़ रही

दक्षिण एशिया और अन्य निम्न व मध्यम आय वाले देशों में टाइप-2 डायबिटीज तेजी से बढ़ रही है. एक्सपर्ट अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या आधुनिक, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड और उच्च कैलोरी वाले खाद्य पदार्थ इस बीमारी के फैलाव के पीछे बड़ी वजह हैं. इसी दिशा में ग्लासगो विश्वविद्यालय ने नेपाल के धुलीखेल अस्पताल के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय परियोजना शुरू की है, जिसका नाम CoDIAPREM रखा गया है.

Continues below advertisement

4 साल में निकलेगा निष्कर्ष

यह चार वर्षीय परियोजना 2026 से 2030 तक चलेगी और इसे हॉवर्ड फाउंडेशन से 17.8 लाख पाउंड की फंडिंग मिली है. डायबिटीज और मानव न्यूट्रिशियन एक्सपर्ट प्रोफेसर माइकल लीन के नेतृत्व में यह स्टडी जांच करेगा कि क्या समुदाय के स्तर पर पारंपरिक आहार अपनाने से टाइप-2 डायबिटीज की रोकथाम संभव है और क्या पहले से बीमार लोग लंबे समय तक रिमिशन हासिल कर सकते हैं.

नेपाल में भी तेजी से बढ़े मामले

कुछ दशक पहले तक नेपाल में टाइप-2 डायबिटीज बहुत कम थी. हालांकि दक्षिण एशियाई आबादी में जेनेटिक जोखिम मौजूद है, लेकिन जैसे-जैसे प्रोसेस्ड और ऊर्जा-घने खाद्य पदार्थों का चलन बढ़ा और लोगों का वजन बढ़ा, बीमारी के मामले भी तेजी से बढ़ने लगे. आज अनुमान है कि नेपाल में 40 वर्ष से अधिक उम्र के हर पांच में से एक व्यक्ति टाइप-2 डायबिटीज से प्रभावित है. लंबे समय तक दवाइयों और नियमित जांच का खर्च कई लोगों के लिए वहन करना मुश्किल है.

क्या होगा इसमें?

CoDIAPREM परियोजना यह जांचेगी कि पारंपरिक भोजन को फिर से अपनाने और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को कम करने से क्या लोग हल्का वजन घटा सकते हैं. वजन कम होना डायबिटीज की रोकथाम और रिमिशन में अहम भूमिका निभाता है. यह कार्यक्रम अस्पतालों पर आधारित नहीं होगा, बल्कि समुदाय स्तर पर स्थानीय स्वयंसेवकों की मदद से चलाया जाएगा, ताकि कम संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी इसे लागू किया जा सके. स्टडी में यह देखा जाएगा कि क्या पारंपरिक आहार नई डायबिटीज के मामलों को रोक सकता है, क्या मरीज बिना दवा के लंबे समय तक सामान्य ब्लड शुगर बनाए रख सकते हैं और क्या यह बदलाव कई वर्षों तक टिकाऊ रहता है. नेपाल में किए गए शुरुआती पायलट स्टडी ने कम लागत में उत्साहजनक परिणाम दिखाए हैं.

यह रिसर्च वैश्विक प्रमाणों पर आधारित है, जो अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड, मोटापे और इंसुलिन रेजिस्टेंस के बीच संबंध दिखाते हैं. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन और इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन के अनुसार, शरीर में अतिरिक्त चर्बी लीवर और पैंक्रियास जैसे अंगों को नुकसान पहुंचाती है और ब्लड शुगर कंट्रोल बिगाड़ती है.

इसे भी पढ़ें: Cancer Warning Symptoms: देश में हर साल बढ़ रहे कैंसर के 15 लाख मामले, जानें जानलेवा बीमारी के 3 सबसे कॉमन लक्षण

Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.