Health Advice: भारत में हर साल लाखों लोग डायबिटीज (Diabetes) के शिकार हो रहे हैं. डायबिटीज वैसे तो दो तरह की होती है लेकिन कुछ मामलों में टाइप-3 की डायबिटीज (Type 3 diabetes) भी देखी गई है. गलत खान-पान, बदलती लाइफस्टाइल की वजह से डायबिटीज की समस्या बढ़ रही है. बच्चे, युवा और बुजर्ग तक इसके शिकार हो रहे हैं. इस आर्टिकल में आइए जानते हैं डायबिटीज टाइप 1,2,3 में अंतर, लक्षण और किससे सबसे ज्यादा बचने की जरूरत.
 
डायबिटीज टाइप -1 
इसे डायबिटीज की पहली स्टेज कहा जाता है. टाइप -1 डायबिटीज को कुछ समय तक किशोर मधुमेह या इंसुलिन पर निर्भर मधुमेह के तौर पर कहा जाता था. इस स्टेज में, मरीज के शरीर का अग्न्याशय बहुत कम या बिलकुल भी इंसुलिन नहीं बनाता है. आनुवंशिकी और कुछ वायरस की वजह से टाइप 1 डायबिटीज हो सकती  है. यह आमतौर पर इंसान के बचपन या किशोरावस्था के दौरान विकसित होने लगता है. टाइप 1 डायबिटीज का इलाज नहीं है. इंसुलिन, संतुलित आहार और जीवनशैली में बदलाव के साथ ही इसे कम लेवल पर मेंटेन किया जा सकता है.
 
डायबिटीज टाइप-2 
टाइप 2 डायबिटीज की वजह से हमारे शरीर में खून का संचार, तंत्रिका, और प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यूनिटी सिस्टम पर असर पड़ सकता है. डायबिटीज की इस स्टेज में मरीज के शरीर का पेंक्रियाज़ जरूरत के मुताबिक या फिर भरपूर मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता है.
 
डायबिटीज टाइप 3 
टाइप 3 डायबिटीज, बेहद कम मामलों में होती है. कभी-कभी कुछ मामलों में इसके बारे में तब जिक्र किया जाता है जब टाइप 2 डायबिटीज का मरीज का इलाज के दौरान या इलाज के बाद में अल्जाइमर से पीड़ित हो गया. अल्जाइमर रोग, जिसमें इंसान की याद्दाश्त कमजोर होती जाती है और खत्म भी हो सकती है. इसकी सबसे बड़ी वजह, एक खास तरह के इंसुलिन से इम्युनिटी और इंसुलिन लगाने से दिमाग बिल्कुल काम न करना है. डॉक्टरों के मुताबिक, कहा जाता है कि इन तीनों में सबसे गंभीर स्टेज टाइप 3 डायबिटीज में होती है.
 
टाइप 3 डायबिटीज के लक्षण
  • मेमोरी लॉस जिससे हर दिन के कामों और सामाजिक संबंधों पर असर पड़ता है
  • कामों को पूरा करने में दिक्कत
  • अक्सर चीजों को किसी जगह रख भूल जाना
  • कोई भी निर्णय न ले पाना. व्यक्तित्व या व्यवहार में अचानक बदलाव
  • लिखने, बोलने और समझने में परेशानी होना
  • भ्रामक बातें करना वगैरह
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