<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>दांतों की झनझनाहट को इन घरेलू तरीकों से करें कम, ऐसे मिलेगा आराम</title><atom:link href="https://www.abplive.com/health/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Thu, 15 Oct 2026 21:44:53 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[Global Handwashing Day: हाथ धोने का सही तरीका क्या है? जानें हर एक बात]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/global-handwashing-day-proper-handwashing-technique-steps-3202344</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/global-handwashing-day-proper-handwashing-technique-steps-3202344#respond</comments><pubDate>Thu, 15 Oct 2026 13:31:56 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/global-handwashing-day-proper-handwashing-technique-steps-3202344</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;When To Wash Your Hands Daily Routine:&lt;/strong&gt; हाथ धोना हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का इतना सामान्य हिस्सा है कि अक्सर हम इस पर ज्यादा ध्यान ही नहीं देते. बचपन से हाथ धोने की आदत होती है, लेकिन क्या हम उन्हें सही तरीके से धोते हैं? सिर्फ हाथों पर साबुन लगाकर कुछ सेकंड पानी से धो लेना ही पर्याप्त नहीं है. सही तरीके से हाथ धोने के लिए हाथों के हर हिस्से को अच्छी तरह साफ करना और कम से कम 20 सेकंड तक रगड़ना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;15 अक्टूबर को वर्ल्ड हैंड वाशिंग डे मनाया जाता है. इस मौके पर यह समझना जरूरी है कि हाथ धोने का सही तरीका क्या है और दिन में किन-किन मौकों पर हाथ साफ करना जरूरी होता है. हाथों की सफाई सिर्फ खुद को बीमारियों से बचाने के लिए नहीं, बल्कि संक्रमण को दूसरों तक फैलने से रोकने के लिए भी महत्वपूर्ण है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हाथ धोना क्यों जरूरी है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमारे हाथ दिनभर अलग-अलग सतहों और चीजों के संपर्क में आते हैं. इस दौरान कई तरह के कीटाणु हाथों पर चिपक सकते हैं. इसके बाद जब हम आंख, नाक या मुंह को छूते हैं, तो ये कीटाणु शरीर में प्रवेश कर सकते हैं और बीमारी का कारण बन सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/886f19ee521003e76c733d6de271ff7917920455765161257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सही तरीके से हाथ धोने पर इन कीटाणुओं का एक बड़ा हिस्सा हाथों से निकल जाता है. रिसर्च के मुताबिक, हाथों की अच्छी सफाई डायरिया से होने वाली करीब एक तिहाई बीमारियों और सांस से जुड़ी करीब एक-पांचवीं बीमारियों को रोकने में मदद कर सकती है. अगर कोई व्यक्ति पहले से बीमार है, तब भी हाथ धोने की आदत संक्रमण को दूसरे लोगों तक पहुंचने से रोकने में मदद करती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हाथ कितनी देर तक धोने चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाथ धोने के लिए साबुन और बहते हुए पानी का इस्तेमाल करें और कम से कम 20 सेकंड तक हाथों को रगड़ें. जल्दी-जल्दी हाथ धोने से सफाई पूरी तरह नहीं हो पाती. 20 सेकंड का समय याद रखने के लिए आप मन ही मन 'Happy Birthday' गाना दो बार गुनगुना सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/565894ed2632bb643c846d34db5a74e817920456095991257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हाथ धोने का सही तरीका क्या है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सबसे पहले साफ बहते पानी से हाथों को गीला करें. पानी गर्म या ठंडा, दोनों हो सकता है. इसके बाद साबुन लगाकर हाथों में झाग बनाएं और कम से कम 20 सेकंड तक अच्छी तरह रगड़ें. इस दौरान सिर्फ हथेलियों पर ध्यान न दें. हाथों की पीठ, उंगलियों के बीच, नाखूनों के नीचे और कलाई को भी अच्छी तरह साफ करें. इसके बाद बहते पानी के नीचे हाथों को तब तक धोएं, जब तक साबुन पूरी तरह निकल न जाए. अच्छी तरह हाथ धोने से गंदगी, कीटाणु और दूसरे हानिकारक पदार्थ हटाने में मदद मिलती है. हाथ धोने के बाद उन्हें साफ पेपर टॉवल या साफ तौलिए से सुखाएं. गीले हाथों पर कीटाणु ज्यादा आसानी से फैल सकते हैं. अगर संभव हो तो नल बंद करने के लिए पेपर टॉवल का इस्तेमाल करें. सार्वजनिक शौचालय से निकलते समय दरवाजा खोलने के लिए भी पेपर टॉवल का इस्तेमाल किया जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दिन में कब-कब हाथ धोना चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हेल्थ के बारे में जानकारी Clevelandclinic के अनुसार, हाथ धोने की जरूरत सिर्फ खाना खाने से पहले नहीं होती. खाना बनाने से पहले और बाद में भी हाथ साफ करना जरूरी है. कच्चा मांस छूने के तुरंत बाद हाथ धोएं. कचरा या कंपोस्ट छूने और किचन की सतहों की सफाई के बाद भी हाथ जरूर धोने चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पालतू जानवरों को छूने, उनका खाना या ट्रीट संभालने और जानवरों के रहने की जगह साफ करने के बाद भी हाथ धोना जरूरी है. अगर आप किसी बीमार व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, डायपर बदलते हैं या किसी को टॉयलेट इस्तेमाल करने में मदद करते हैं, तो उसके बाद भी हाथ साफ करें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;टॉयलेट इस्तेमाल करने, खांसने या छींकने, नाक साफ करने और उल्टी या दस्त की सफाई के बाद हाथ धोना बेहद जरूरी है. घाव को साफ करने या पट्टी करने से पहले और बाद में भी हाथ साफ करें. सार्वजनिक जगहों से घर लौटने के बाद, दरवाजे के हैंडल, लिफ्ट के बटन और रेलिंग जैसी ज्यादा लोगों के संपर्क में आने वाली सतहों को छूने के बाद भी हाथ धोना चाहिए. कॉन्टैक्ट लेंस लगाने से पहले भी साबुन और पानी से हाथ साफ करना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या एंटीबैक्टीरियल साबुन जरूरी है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नहीं. सामान्य साबुन और पानी हाथों से कीटाणु हटाने के लिए पर्याप्त हैं. ज्यादातर लोगों के लिए एंटीबैक्टीरियल साबुन सामान्य साबुन और पानी की तुलना में बीमारी रोकने में ज्यादा प्रभावी नहीं होता. हालांकि, हेल्थकेयर वर्कर्स के लिए स्थिति के हिसाब से अलग दिशानिर्देश हो सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हैंड सैनिटाइजर कब इस्तेमाल करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जब साबुन और बहता पानी उपलब्ध न हो, तब हैंड सैनिटाइजर उपयोगी हो सकता है. लेकिन जहां संभव हो, साबुन और पानी को प्राथमिकता दें. सैनिटाइजर कुछ कीटाणुओं को खत्म करता है, जबकि साबुन और पानी कीटाणुओं के साथ गंदगी और कुछ हानिकारक पदार्थों को भी हाथों से हटाने में मदद करते हैं. हैंड सैनिटाइजर चुनते समय उसमें कम से कम 60 प्रतिशत एथिल अल्कोहल या 70 प्रतिशत आइसोप्रोपाइल अल्कोहल होना चाहिए. बच्चों को सैनिटाइजर इस्तेमाल करते समय किसी बड़े की निगरानी में रखना चाहिए और इसे उनकी पहुंच से दूर रखना चाहिए, क्योंकि निगलने पर यह नुकसानदायक हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433&quot;&gt;&lt;strong&gt;केवल 6 महीने में कैंसर को कैसे दें मात? आज से ही फॉलो करें ये टिप्स&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बहुत ज्यादा हाथ धोना भी ठीक नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हाथ धोना जरूरी है, लेकिन जरूरत से ज्यादा हाथ धोने से त्वचा की प्राकृतिक नमी और तेल कम हो सकते हैं. इससे त्वचा सूखी, फटने या छिलने लग सकती है. कुछ लोगों में इससे एक्जिमा या इरिटेंट कॉन्टैक्ट डर्मेटाइटिस की समस्या भी बढ़ सकती है. अगर बार-बार हाथ धोने पड़ते हैं, तो मॉइस्चराइजर का इस्तेमाल त्वचा को सुरक्षित रखने में मदद कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540&quot;&gt;मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/d251097c71d1c499d8e1acb1debd741e17920459616251257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Pope Leo XIV Cancer: किस कैंसर से जूझ रहे पोप लियो, एक लंग के बिना कितनी होंगी दिक्कतें?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/pope-leo-xiv-lung-cancer-surgery-one-lung-recovery-3202329</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/pope-leo-xiv-lung-cancer-surgery-one-lung-recovery-3202329#respond</comments><pubDate>Thu, 15 Oct 2026 11:49:07 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/pope-leo-xiv-lung-cancer-surgery-one-lung-recovery-3202329</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Pope Leo Lung Cancer Surgery Health:&lt;/strong&gt; पोप लियो XIV इन दिनों लंग कैंसर से जूझ रहे हैं. मंगलवार को उनकी राइट लंग की एक लोब को सर्जरी के जरिए निकाल दिया गया. इसके बाद बुधवार को उनकी सेहत को लेकर वेटिकन की ओर से जानकारी दी गई कि उनकी रिकवरी सामान्य तरीके से हो रही है. सर्जरी के बाद किए गए ब्लड टेस्ट और चेस्ट एक्स-रे में भी स्थिति सामान्य पोस्ट-ऑपरेटिव कोर्स के मुताबिक पाई गई. वेटिकन के मुताबिक, जांच में सामने आए मानक इस तरह की सर्जरी के बाद दायरे में हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पोप लियो के राइट लंग में एक नोड्यूलर लीजन मिली थी. डॉक्टरों के मुताबिक, इस तरह के कुछ लीज़न को सर्जरी के जरिए निकालकर ठीक किया जा सकता है. हालांकि, अभी वेटिकन ने यह जानकारी नहीं दी है कि पोप का कैंसर किस स्टेज पर है या शरीर के किसी दूसरे हिस्से में फैला है या नहीं. यही जानकारी आगे के इलाज और बीमारी के संभावित परिणाम को समझने में अहम होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पोप लियो को कौन सा कैंसर है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉक्टरों के मुताबिक, पोप लियो को लंग एडेनोकार्सिनोमा है. यह नॉन-स्मॉल सेल लंग कैंसर का एक सामान्य प्रकार है. नॉर्थवेस्टर्न मेडिसिन कैनिंग थोरैसिक इंस्टीट्यूट के थोरैसिक सर्जन डॉ. कैल्विन लुंग ने बताया कि जब इस तरह के कैंसर का पता शुरुआती चरण में चल जाता है, तो इसका प्रोग्नोसिस आमतौर पर अच्छा होता है. पोप की जिस तरह की सर्जरी हुई है, वह भी लंग कैंसर के इलाज में आम तौर पर की जाती है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस तरह की सर्जरी के बाद मरीज तेजी से रिकवर कर सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/5503cb131f244571ebde36c30d45b31e17920442288001257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कैंसर किस स्टेज पर है, अभी साफ नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पोप लियो के कैंसर की स्टेज के बारे में वेटिकन ने अभी कोई जानकारी नहीं दी है. डॉक्टरों का कहना है कि संभव है कि डॉक्टरों को भी अभी कैंसर की पूरी स्टेज का पता न हो. हालांकि, अब तक जो जानकारी सामने आई है, उससे संकेत मिलता है कि बीमारी का पता शुरुआती चरण में चला हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉक्टरों के मुताबिक, अगर कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल गया होता, तो सर्जरी से पहले कीमोथेरेपी या इम्यूनोलॉजिकल थेरेपी जैसे इलाज की जरूरत पड़ सकती थी. लेकिन पोप की सीधे सर्जरी की गई और गांठ को निकाल दिया गया. इससे यह संकेत मिल सकता है कि डॉक्टरों को लगा कि बीमारी स्थानीय स्तर पर ही है और सर्जरी से इसे हटाया जा सकता है. अगर कैंसर सिर्फ उसी जगह तक सीमित है और सर्जरी के जरिए पूरी तरह निकाल दिया गया है, तो डॉक्टरों के मुताबिक आगे किसी और इलाज की जरूरत नहीं भी पड़ सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/40c6648f46cd61bf3a087929bf735da517920442489521257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लिम्फ नोड में कैंसर पहुंचा है या नहीं, यह क्यों जरूरी है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आगे की स्थिति समझने में लिम्फ नोड की जांच भी अहम होगी. अगर कैंसर लिम्फ नोड तक पहुंच चुका है, तो इससे बीमारी का प्रोग्नोसिस और आगे का इलाज बदल सकता है. डॉक्टरों ने बताया कि कई बार शुरुआती जांच में कैंसर सिर्फ राइट लंग तक सीमित दिखाई देता है, लेकिन बाद की जांच में लिम्फ नोड में भी कैंसर की मौजूदगी सामने आ सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके लिए सर्जरी के बाद कई तरह की जांच की जाती हैं. इनमें कैंसर की जेनेटिक बनावट और ऐसे खास मार्कर्स की जांच भी शामिल हो सकती है, जो यह बताते हैं कि कैंसर किन कारणों से बढ़ रहा है. इन्हीं जांचों के आधार पर आगे के इलाज का फैसला किया जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;एक लंग की लोब निकलने के बाद कितनी दिक्कतें होंगी?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पोप लियो के मामले में राइट लंग का पूरा हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी एक लोब को सर्जरी के जरिए हटाया गया है. डॉक्टरों के मुताबिक, इस तरह की सर्जरी के बाद रिकवरी में आमतौर पर कुछ हफ्ते लग सकते हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि मरीज के पास सिर्फ एक ही लंग रह गया है, बल्कि राइट लंग का एक हिस्सा हटाया गया है. सर्जरी के बाद शुरुआती दिनों में दर्द या असहजता हो सकती है. डॉ. कैल्विन लुंग के मुताबिक, यह दर्द पहले कुछ दिनों से लेकर शुरुआती एक-दो हफ्तों तक रह सकता है. हालांकि, डॉक्टरों का मानना है कि पोप लगभग तीन से चार हफ्तों में अपनी सामान्य एक्टिविटी की ओर लौट सकते हैं. इसमें थोड़ा ज्यादा समय भी लग सकता है, लेकिन उनके ठीक होने की उम्मीद जताई गई है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433&quot;&gt;&lt;strong&gt;केवल 6 महीने में कैंसर को कैसे दें मात? आज से ही फॉलो करें ये टिप्स&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पोप की रिकवरी कैसी चल रही है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वेटिकन के मुताबिक, पोप लियो की रिकवरी उम्मीद के मुताबिक आगे बढ़ रही है. उन्होंने रेस्पिरेटरी फिजियोथेरेपी शुरू कर दी है और अपने कमरे में चलना भी शुरू कर दिया है. उन्होंने सामान्य डाइट लेना भी शुरू कर दिया है और नाश्ता व दोपहर का खाना खाया है. वेटिकन के अनुसार, पोप को अस्पताल में करीब एक सप्ताह रहने की उम्मीद है. डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की सर्जरी के बाद पूरी तरह सामान्य गतिविधियों में लौटने में कुछ सप्ताह लग सकते हैं. मेमोरियल स्लोन केटरिंग कैंसर सेंटर के थोरैसिक सर्जरी प्रमुख डॉ. डेविड जोन्स ने भी अनुमान जताया कि पोप करीब तीन से चार सप्ताह में अपनी सामान्य गतिविधियों में लौट सकते हैं, हालांकि शुरुआत में उनकी रफ्तार थोड़ी धीमी हो सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540&quot;&gt;मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/c18798cabf463190f6282a24aa955fbd17920447589801257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[कितनी आवाज सह सकते हैं हमारे कान, कितने डेसीबल पर हो सकती है मौत?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/maximum-decibel-human-ear-can-tolerate-sound-level-causes-death-hearing-capacity-3201894</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/maximum-decibel-human-ear-can-tolerate-sound-level-causes-death-hearing-capacity-3201894#respond</comments><pubDate>Thu, 15 Oct 2026 09:34:56 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/maximum-decibel-human-ear-can-tolerate-sound-level-causes-death-hearing-capacity-3201894</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डीजे का तेज संगीत, गाड़ियों का शोर या पटाखों की गूंज- आज की आधुनिक दुनिया में हम हर तरफ से तेज आवाजों से घिरे हुए हैं. अक्सर लोग शादियों या पार्टियों में कान फोड़ू संगीत का आनंद तो लेते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह तेज आवाज हमारे शरीर के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है? विज्ञान के अनुसार, हद से ज्यादा शोर न सिर्फ इंसान को हमेशा के लिए बहरा बना सकता है, बल्कि यह जानलेवा भी साबित हो सकता है. आइए जानते हैं कि हमारे कानों की क्षमता कितनी है और कितने डेसीबल की आवाज इंसान की मौत की वजह बन सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या होता है डेसीबल और कितनी आवाज है सुरक्षित?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आवाज की तीव्रता या उसके सीधे तीखेपन को मापने के लिए डेसीबल यूनिट का इस्तेमाल किया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO और डॉक्टरों के मुताबिक, इंसानी कानों के लिए 70 डेसीबल तक की आवाज पूरी तरह से सामान्य और सुरक्षित मानी जाती है. जब हम आपस में सामान्य बातचीत करते हैं, तो वह आवाज लगभग 60 डेसीबल की होती है. पर्यावरण और स्वास्थ्य मानकों के अनुसार, 85 डेसीबल तक की आवाज को हमारे कान अधिकतम 8 घंटे तक ही बिना किसी बड़े नुकसान के बर्दाश्त कर सकते हैं. इससे ज्यादा तेज आवाज में लगातार रहना कानों की नसों को हमेशा के लिए डैमेज कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कब शुरू होता है कानों में दर्द और बहरेपन का खतरा?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जैसे-जैसे डेसीबल का स्तर बढ़ता है, कानों के लिए खतरा कई गुना बढ़ जाता है. जब आवाज 100 डेसीबल जैसे किसी भारी ट्रैफिक या लाउडस्पीकर के बिल्कुल पास की आवाज तक पहुंचती है, तो मात्र 10 से 15 मिनट में ही इंसानी कान को नुकसान पहुंचना शुरू हो जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके बाद 120 से 130 डेसीबल की आवाज जैसे एम्बुलेंस का सायरन या पास से गुजरता हवाई जहाज इंसानी कानों के लिए दर्द की सीमा मानी जाती है. इस स्तर पर पहुंचते ही कानों में तेज दर्द होने लगता है. यदि कोई व्यक्ति 140 से 150 डेसीबल की आवाज जैसे पास में फटने वाला बड़ा पटाखा या बंदूक की गोली के संपर्क में अचानक आ जाए, तो उसके कान का पर्दा तुरंत फट सकता है और वह हमेशा के लिए बहरा हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433&quot;&gt;&lt;strong&gt;केवल 6 महीने में कैंसर को कैसे दें मात? आज से ही फॉलो करें ये टिप्स&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितने डेसीबल पर हो सकती है इंसान की मृत्यु?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह बात सुनने में थोड़ी हैरान करने वाली लग सकती है, लेकिन बहुत ज्यादा तेज आवाज या ध्वनि तरंगें इंसान के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकती हैं. वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब आवाज का स्तर 175 से 180 डेसीबल तक पहुंचता है, तो अत्यधिक वायु दबाव के कारण कानों के पर्दों को गंभीर नुकसान पहुंचता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यदि ध्वनि का स्तर 200 से 210 डेसीबल से ऊपर चला जाए, तो यह स्थिति इंसान के लिए जानलेवा साबित हो सकती है. दरअसल, इतने ऊंचे स्तर पर आवाज केवल एक सामान्य ध्वनि नहीं रह जाती, बल्कि वह एक तीव्र शॉक वेव में बदल जाती है. यह अत्यधिक दबाव वाली लहर श्वसन प्रणाली और शरीर के आंतरिक अंगों पर बहुत भारी आघात करती है, जिससे गंभीर आंतरिक चोटें आ सकती हैं और यह दिल के काम बंद करने का कारण बन सकती है. यही वजह है कि इसे जानलेवा स्तर माना जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/gk/indian-security-at-kathmandu-airport-how-1999-kandahar-hijacking-changed-nepal-aviation-security-3201674&quot;&gt;&lt;strong&gt;नेपाल एयरपोर्ट पर क्यों होते हैं भारतीय सुरक्षाकर्मी, कब लागू हुई यह व्यवस्था?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/14/2dafaea918c802d46303157291ddfddd17919615487661474_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[IIT जोधपुर में मेडिकल AI की नई पहल, रोबोट करेगा हार्ट स्कैन में मदद]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/iit-jodhpur-medical-ai-robotic-heart-ultrasound-rib-fracture-detection-3202234</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/iit-jodhpur-medical-ai-robotic-heart-ultrasound-rib-fracture-detection-3202234#respond</comments><pubDate>Thu, 15 Oct 2026 07:59:01 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ करनपुरी, जोधपुर ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/iit-jodhpur-medical-ai-robotic-heart-ultrasound-rib-fracture-detection-3202234</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चिकित्सा क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और रोबोटिक्स का इस्तेमाल स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा दे सकता है. इसी दिशा में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) जोधपुर की मेडिकल एआई सिस्टम्स लैब (MAISys Lab) आधुनिक तकनीकों के जरिए चिकित्सा जांच, मेडिकल इमेजिंग और चिकित्सा शिक्षा को अधिक प्रभावी बनाने पर काम कर रही है. कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. दीपक मिश्रा के नेतृत्व में लैब तीन प्रमुख क्षेत्रों में शोध कर रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हृदय की अल्ट्रासाउंड जांच में रोबोट और AI की मदद&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हृदय की अल्ट्रासाउंड जांच यानी इकोकार्डियोग्राफी में सटीक तस्वीरें प्राप्त करने के लिए विशेषज्ञता और अनुभव की आवश्यकता होती है. इस चुनौती को कम करने के लिए IIT जोधपुर के शोधकर्ता AI से नियंत्रित होने वाली रोबोटिक प्रणाली विकसित कर रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस तकनीक में रोबोट अल्ट्रासाउंड प्रोब को पकड़ेगा, जबकि AI उसकी दिशा और स्थिति को नियंत्रित करने में मदद करेगा. शोधकर्ताओं के अनुसार, यह भारत में अपनी तरह का पहला प्रयास है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;तकनीक का सफल विकास और परीक्षण होने पर स्वास्थ्यकर्मियों को हृदय की अल्ट्रासाउंड जांच करने में सहायता मिल सकती है. इससे भविष्य में मेडिकल इमेजिंग सेवाओं की पहुंच बढ़ाने की संभावनाएं भी बन सकती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;AI बताएगा पसलियों में कहां हुआ फ्रैक्चर?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेडिकल इमेजिंग के क्षेत्र में भी AI महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. सीटी स्कैन, एमआरआई और अल्ट्रासाउंड जैसी जांचों से मिलने वाली बड़ी मात्रा में जानकारी का विश्लेषण करने में विशेषज्ञों को समय और अनुभव की जरूरत होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;IIT जोधपुर की लैब एजेंटिक AI आधारित समाधान विकसित कर रही है, जिसका उद्देश्य पसलियों में होने वाले विभिन्न प्रकार के फ्रैक्चर की पहचान करना और उनका व्यवस्थित विश्लेषण करना है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह तकनीक मेडिकल स्कैन से उपयोगी जानकारी निकालकर उसे एक समग्र रूप में प्रस्तुत करने में मदद कर सकती है. इससे डॉक्टरों को जांच के निष्कर्ष समझने और निर्णय लेने में सहायता मिलेगी. हालांकि, यह प्रणाली चिकित्सकों की विशेषज्ञता का विकल्प नहीं, बल्कि उनके काम में सहयोग करने वाला उपकरण होगी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सिमुलेशन से सीखेंगे चिकित्सा की जटिल प्रक्रियाएं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लैब का तीसरा प्रमुख शोध क्षेत्र चिकित्सा शिक्षा है. इसमें ऐसे इंटरैक्टिव टूल विकसित किए जा रहे हैं, जिनकी मदद से मेडिकल छात्र और स्वास्थ्यकर्मी सिमुलेशन के जरिए जटिल चिकित्सा प्रक्रियाओं को समझ सकेंगे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इन टूल्स में क्लिनिकल स्कैनिंग सिमुलेटर और नेत्र सर्जरी से जुड़े वीडियो शामिल हैं. इनके माध्यम से विद्यार्थी प्रक्रियाओं के विभिन्न चरणों में बदलाव करके उनके प्रभावों को समझ सकते हैं. इससे चिकित्सा प्रशिक्षण को अधिक व्यावहारिक और संवादात्मक बनाने में मदद मिल सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;डॉक्टरों की मदद करना है उद्देश्य&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. दीपक मिश्रा के अनुसार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता स्वास्थ्य सेवाओं में सार्थक बदलाव ला सकती है, लेकिन इसके विकास में डॉक्टरों, मरीजों और चिकित्सा विद्यार्थियों की वास्तविक जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उन्होंने बताया कि मेडिकल एआई सिस्टम्स लैब का उद्देश्य ऐसी तकनीक विकसित करना है, जो स्वास्थ्य विशेषज्ञों के काम में सहायता करे. चिकित्सा प्रक्रियाओं को अधिक प्रभावी बनाए और भविष्य के स्वास्थ्यकर्मियों को बेहतर प्रशिक्षण के अवसर उपलब्ध कराए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;चिकित्सा क्षेत्र में तकनीक के नए अवसर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;IIT जोधपुर का यह शोध कंप्यूटर विज्ञान, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स के जरिए स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों का समाधान खोजने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है. हृदय की अल्ट्रासाउंड जांच में सहायता, मेडिकल स्कैन का विश्लेषण और सिमुलेशन आधारित प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में इन तकनीकों की उपयोगिता की संभावनाएं हैं. हालांकि, इन तकनीकों को नियमित चिकित्सा सेवाओं में इस्तेमाल करने से पहले उनका आगे विकास, परीक्षण और क्लिनिकल सत्यापन आवश्यक होगा.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ये भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540&quot;&gt;मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/15/2ee4875eac2210295948ef130696df2d17920295029141257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[बड़े काम के हैं पान के डंठल, घरेलू नुस्खों में ऐसे करें इस्तेमाल]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/betel-leaf-stem-traditional-home-remedies-3201889</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/betel-leaf-stem-traditional-home-remedies-3201889#respond</comments><pubDate>Wed, 14 Oct 2026 17:59:16 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/betel-leaf-stem-traditional-home-remedies-3201889</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पान का इस्तेमाल आमतौर पर पूजा-पाठ, पान बनाने और कुछ पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता है. पान का पत्ता खाने के बाद अक्सर उसका डंठल फेंक दिया जाता है, लेकिन पारंपरिक तरीकों में इसे भी काम का माना जाता है. कुछ लोग पान के पत्ते और डंठल का इस्तेमाल पेट की परेशानी, मुंह की सफाई और सर्दी-खांसी जैसी दिक्कतों के लिए करते हैं. .&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पाचन और गैस की परेशानी&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पान के पत्तों के साथ इसके डंठल का इस्तेमाल भी कई पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता रहा है. माना जाता है कि पान के डंठल को अजवाइन या सौंफ के साथ पानी में उबालकर तैयार किया गया काढ़ा पाचन से जुड़ी परेशानियों को दूर करता है . खासकर पेट में भारीपन, गैस और अपच जैसी दिक्कतों के लिए लोग इस तरह के घरेलू नुस्खे अपनाते हैं. पर ध्यान रखें , हर व्यक्ति के शरीर पर इनका असर एक जैसा नहीं होता. इसलिए पेट की परेशानी लगातार बनी रहे तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना लें&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दांतों और मसूड़ों परेशानी में कारगर&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पान के पत्तों का इस्तेमाल पारंपरिक रूप से मुंह की सफाई और दांतों-मसूड़ों की देखभाल से जुड़े कुछ घरेलू उपायों में भी किया जाता है. पुराने समय में लोग पान के पत्तों को अलग-अलग तरीकों से इस्तेमाल करते थे. पान के डंठल को पीसकर उसमें थोड़ा नमक या सरसों का तेल मिलाकर दांतों और मसूड़ों की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाता है &amp;nbsp;दांतों और मसूड़ों को स्वस्थ रखने के लिए रोजाना ब्रश करना, दांतों के बीच की सफाई करना और समय-समय पर दंत चिकित्सक से जांच कराना जरूरी है. अगर मसूड़ों से खून आता है, सूजन रहती है या दांत में दर्द होता है, तो घरेलू नुस्खे अपनाने के बजाय सही इलाज कराना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/puja-ghee-vs-edible-ghee-health-risks-difference-fsda-label-ban-not-for-human-consumption-3201419&quot;&gt;पूजा घी और खाने वाले घी में क्या होता है अंतर? कैसे सेहत को पहुंचता है नुकसान &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सर्दी-खांसी और कफ में पारंपरिक इस्तेमाल&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पान के पत्तों का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक घरेलू नुस्खों में गले की परेशानी, खांसी और कफ के लिए भी किया जाता है कुछ लोग पान के पत्ते के रस को शहद के साथ मिलाकर इस्तेमाल करने की परंपरा का जिक्र करते हैं. &amp;nbsp; इससे खांसी या कफ ठीक होने की गारंटी नहीं होती. खांसी लंबे समय तक बनी रहे, सांस लेने में परेशानी हो, तेज बुखार आए या सीने में दर्द हो, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है. खासकर बच्चों को पान के डंठल या उसका रस देने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/foot-pain-reasons-cause&quot;&gt;सुबह उठते ही पैर के तलवे दर्द होते हैं? ये हो सकती है वजह&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer:&lt;/strong&gt; पान के डंठल का इस्तेमाल कुछ पारंपरिक घरेलू नुस्खों में किया जाता है, लेकिन इसके फायदे अभी पूरी तरह साबित नहीं हैं. &amp;nbsp;किसी भी परेशानी या ज्यादा समस्या में सुरक्षित इलाज के लिए डॉक्टर की सलाह लें.&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/14/b83ec9a1b4249cf5f80170355fdcea2017919614502841472_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Epilepsy Symptoms: मिर्गी के साथ कैसे जिएं सामान्य जिंदगी? एक्सपर्ट से जानें सच]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540#respond</comments><pubDate>Wed, 14 Oct 2026 10:16:18 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/epilepsy-mental-health-workplace-relationships-seizure-anxiety-3201540</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Fear Of Next Seizure Anxiety Management:&lt;/strong&gt; मिर्गी को आमतौर पर दौरे पड़ने और उसके इलाज से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इस बीमारी के साथ जी रहे लोगों के लिए चुनौती सिर्फ दौरे नहीं होते. अगला दौरा कब आएगा, इसकी अनिश्चितता भी मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डाल सकती है. लगातार डर और चिंता के कारण व्यक्ति का आत्मविश्वास कम हो सकता है और वह धीरे-धीरे उन कामों से दूरी बनाने लगता है, जिन्हें वह पहले पसंद करता था. यात्रा करना, अकेले बाहर जाना, किसी कार्यक्रम में शामिल होना या काम से जुड़ी नई जिम्मेदारी लेना भी कई बार चिंता का कारण बन जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;एक्सपर्ट ने बताया, मिर्गी में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सीके बिड़ला अस्पताल, दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. के.के. जिंदल के अनुसार, मिर्गी लंबे समय तक चलने वाली बीमारी है और इसके इलाज को केवल दवाइयों और नियमित जांच तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए. मरीज की भावनात्मक और सामाजिक जिंदगी को समझना भी जरूरी है, ताकि दौरे का डर उसकी पूरी पहचान पर हावी न हो जाए. उन्होंने कहा कि मिर्गी से प्रभावित व्यक्ति के साथ सामान्य और बराबरी का व्यवहार किया जाना चाहिए. खासतौर पर महिलाओं को बीमारी के कारण किसी तरह के सामाजिक भेदभाव या अंधविश्वास का सामना नहीं करना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/966b5b8e7fd69e507f3523441db214d317918853209791257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अगला दौरा कब आएगा, यह डर बढ़ा सकता है चिंता&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगला दौरा कब आएगा, यह पता न होना मिर्गी के साथ जीने की सबसे बड़ी परेशानियों में से एक हो सकता है. यहां तक कि जिन लोगों के दौरे इलाज से काफी हद तक नियंत्रित रहते हैं, उनके मन में भी यह सवाल बना रह सकता है कि अगली बार ऐसा कब होगा. इसी वजह से कई लोग अकेले यात्रा करने, भीड़भाड़ वाली जगह पर जाने, दौड़ने या घर से बहुत दूर जाने से डरने लगते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह चिंता धीरे-धीरे उनके आत्मविश्वास को प्रभावित कर सकती है. कुछ लोग सार्वजनिक जगह पर दौरा पड़ने या ऐसी स्थिति में फंसने के डर से अपनी पसंद की गतिविधियां छोड़ने लगते हैं. इसका असर उनकी सामाजिक जिंदगी पर भी पड़ सकता है. मिर्गी से जूझ रहे कुछ लोग इलाज और सही सपोर्ट के साथ सामान्य जीवन जी लेते हैं, जबकि कुछ लोगों में चिंता, उदासी या लोगों से अलग-थलग रहने की भावना बढ़ सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नौकरी में भी सामने आती हैं कई चुनौतियां&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कामकाजी जीवन में भी मिर्गी कई तरह की चुनौतियां पैदा कर सकती है. किसी व्यक्ति को ऑफिस में दौरा पड़ने, सहकर्मियों की प्रतिक्रिया या नौकरी में अलग नजर से देखे जाने का डर हो सकता है. इसी वजह से कई लोग अपने साथियों या नियोक्ता को अपनी बीमारी के बारे में बताने से बचते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/726c605ca98558d74eff3dcd4892c6b517918854264741257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, कुछ काम ऐसे होते हैं जिनमें मिर्गी के कारण वास्तविक सुरक्षा संबंधी सावधानी जरूरी हो सकती है, खासकर ड्राइविंग, ऊंचाई या भारी मशीनरी से जुड़े काम. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मिर्गी से पीड़ित व्यक्ति सफल करियर नहीं बना सकता. सही चिकित्सकीय सलाह और काम की जगह पर जरूरी सहयोग के साथ कई लोग लंबे समय तक अपना काम अच्छी तरह करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नींद और समय पर दवा लेना भी जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नींद की कमी, तनाव और दवा की खुराक छूटना कुछ लोगों में दौरे का खतरा बढ़ा सकता है. इसलिए लंबे समय तक काम करने वाले लोगों के लिए पर्याप्त नींद, समय पर दवा और बीच-बीच में उचित ब्रेक लेना महत्वपूर्ण हो सकता है. अगर सहकर्मियों को इमरजेंसी की स्थिति में क्या करना है, इसकी जानकारी हो और स्वास्थ्य से जुड़ी बातों पर किसी तरह का भेदभाव न हो, तो मरीज ज्यादा सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ काम कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;रिश्तों पर भी पड़ता है मिर्गी का असर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिर्गी का असर परिवार और रिश्तों पर भी पड़ता है. पार्टनर, माता-पिता और दोस्त अक्सर दौरे के डर से जरूरत से ज्यादा सावधानी बरतने लगते हैं. इससे मरीज को कई बार ऐसा महसूस हो सकता है कि उस पर लगातार नजर रखी जा रही है या उसकी आजादी कम हो रही है. परिवार भी कई बार उसकी परेशानी को गलत समझ सकता है. उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति का लोगों से दूर रहना अरुचि समझ लिया जाता है, जबकि वह वास्तव में सार्वजनिक जगह पर दौरा पड़ने के डर से ऐसा कर रहा हो सकता है. परिवार और दोस्तों के साथ खुलकर बातचीत इस स्थिति को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज न करें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिर्गी की देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. चिंता और डिप्रेशन मिर्गी के साथ दिखाई दे सकते हैं. लगातार उदासी, हर समय चिंता, नींद खराब होना या लोगों से दूरी बनाने जैसी समस्याओं को सामान्य मानकर छोड़ना सही नहीं है. ऐसे लक्षणों के बारे में न्यूरोलॉजिस्ट से बात की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर काउंसलिंग, थेरेपी या मनोचिकित्सकीय जांच की सलाह ली जा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दौरे लंबे समय से न आने पर भी एंटी-सीजर दवाओं को अपनी मर्जी से बंद या कम नहीं करना चाहिए. दवा कम करने या बंद करने का फैसला व्यक्ति की स्थिति, दौरे के नियंत्रण, जोखिम और पूरी सेहत को ध्यान में रखकर डॉक्टर ही करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/infotainment/zydus-the-easiest-exam-breast-cancer-screening-program-awareness-about-symptoms-family-history-doctors-3199515&quot;&gt;&lt;strong&gt;ब्रेस्ट हेल्थ पर डॉक्टरों ने की चर्चा, ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग और समय पर पहचान पर फोकस&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;मिर्गी के साथ सामान्य जिंदगी जीना संभव&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मिर्गी के साथ बेहतर जिंदगी जीने के लिए सावधानी और सामान्य जीवन के बीच संतुलन जरूरी है. समय पर इलाज, डॉक्टर की सलाह का पालन, पर्याप्त नींद, अपनी स्थिति को समझना और कुछ भरोसेमंद लोगों को इमरजेंसी में मदद करने की जानकारी देना जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है. मिर्गी का निदान किसी व्यक्ति की क्षमता, महत्वाकांक्षा या रिश्तों की सीमा तय नहीं करता. सही इलाज, मानसिक सहयोग और बीमारी को लेकर बेहतर समझ के साथ मिर्गी से पीड़ित लोग करियर, रिश्ते और सामाजिक जीवन को आगे बढ़ा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;एक्सपर्ट भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-drugs-non-scheduled-trade-margin-cap-30-percent-mrp-india-3199444&quot;&gt;&lt;strong&gt;कैंसर की ये दवाएं होंगी सस्ती, सरकार ने ट्रेड मार्जिन पर लगाई कैप&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/a36fe62d653003011a9095d4c21b76c017918861013441257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Gender Affirming Surgery: क्या है जेंडर अफर्मिंग सर्जरी, जानें प्रक्रिया और कितना आता है खर्च?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/aiims-bhopal-first-gender-affirming-surgery-transgender-woman-cost-process-3201515</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/aiims-bhopal-first-gender-affirming-surgery-transgender-woman-cost-process-3201515#respond</comments><pubDate>Wed, 14 Oct 2026 08:38:23 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/aiims-bhopal-first-gender-affirming-surgery-transgender-woman-cost-process-3201515</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot; data-pm-slice=&quot;1 1 []&quot;&gt;&lt;strong&gt;AIIMS Bhopal Gender Affirming Surgery:&lt;/strong&gt; एम्स भोपाल में जेंडर अफर्मिंग सर्जरी से जुड़ा एक अहम मामला सामने आया है. अस्पताल की एक्सपर्ट टीम ने एक ट्रांसजेंडर महिला की जटिल सर्जरी सफलतापूर्वक पूरी की. सरकारी अस्पताल में इस तरह की यह पहली सर्जरी बताई जा रही है. डॉक्टरों की टीम को इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने में करीब आठ घंटे का समय लगा. सर्जरी का उद्देश्य मरीज के शरीर को उनकी लैंगिक पहचान के अनुरूप बनाने की प्रक्रिया को पूरा करना था. ऑपरेशन से पहले मरीज की सहमति ली गई और काउंसलिंग के साथ जरूरी मेडिकल जांच भी की गई.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अपनी पहचान के मुताबिक जिंदगी जीना चाहती थीं मरीज&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मरीज ने करीब 14 साल तक पुरुष के रूप में जीवन बिताया. हालांकि, वह खुद को महिला के रूप में पहचानती थीं और इसी पहचान के हिसाब से अपनी जिंदगी आगे बढ़ाना चाहती थीं. इसी उद्देश्य से उन्होंने एम्स भोपाल में मौजूद ट्रांसजेंडर क्लीनिक से संपर्क किया. यहां पहुंचने के बाद विशेषज्ञों ने उनकी स्थिति को समझने के लिए काउंसलिंग की और जरूरी मेडिकल जांच कराई. काउंसलिंग और जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद डॉक्टरों ने सर्जरी को लेकर आगे बढ़ने का फैसला किया. मरीज की इच्छा और सहमति को भी इस प्रक्रिया में अहम आधार बनाया गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/70ffffe97e1d649ec75e6d2abed67f6b17918831493821257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;8 घंटे तक चली&amp;nbsp; सर्जरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एम्स भोपाल के डॉक्टरों के अनुसार, मरीज की सर्जरी चिकित्सकीय रूप से चुनौतीपूर्ण होने के साथ काफी संवेदनशील भी थी. एक्सपर्ट की टीम ने करीब आठ घंटे तक ऑपरेशन किया. सर्जरी पूरी होने के बाद मरीज को डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया. ऑपरेशन के बाद उनकी सेहत में संतोषजनक सुधार देखा गया. स्थिति स्थिर होने के बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. इस पूरी प्रक्रिया में सर्जरी से पहले काउंसलिंग और मेडिकल जांच को भी महत्वपूर्ण हिस्सा रखा गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जेंडर अफर्मिंग सर्जरी क्या होती है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेंडर अफर्मिंग सर्जरी को जेंडर कन्फर्मेशन या सेक्स ट्रांजिशन सर्जरी के नाम से भी जाना जाता है. इसका मकसद शरीर के कुछ हिस्सों को व्यक्ति की लैंगिक पहचान के अनुरूप बनाना होता है. यह कोई एक तरह की सर्जरी नहीं है, बल्कि व्यक्ति की जरूरत के अनुसार अलग-अलग प्रक्रियाओं का इस्तेमाल किया जा सकता है. जन्म के समय पुरुष के रूप में दर्ज व्यक्ति के लिए की जाने वाली सर्जरी में ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन, वैजिनोप्लास्टी और कुछ मामलों में फेशियल फेमिनाइजेशन जैसी प्रक्रियाएं शामिल हो सकती हैं. वहीं जन्म के समय महिला के रूप में दर्ज व्यक्ति के लिए चेस्ट सर्जरी, मास्टेक्टॉमी, फैलोप्लास्टी या मेटोइडियोप्लास्टी जैसी प्रक्रियाएं की जा सकती हैं. हर व्यक्ति के लिए सभी प्रक्रियाएं जरूरी नहीं होतीं. सर्जरी का चुनाव व्यक्ति की जरूरत, उसकी इच्छा और मेडिकल स्थिति के आधार पर किया जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/181405a9752d4a2d66e4885eef5a99e617918831820691257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सर्जरी से पहले क्या होता है प्रोसेस?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जेंडर अफर्मिंग सर्जरी की प्रक्रिया में सिर्फ ऑपरेशन ही शामिल नहीं होता. सबसे पहले मरीज की काउंसलिंग की जाती है और उसकी जरूरतों को समझा जाता है. इसके बाद मेडिकल जांच के जरिए यह देखा जाता है कि मरीज सर्जरी के लिए उपयुक्त है या नहीं. इसके बाद तय किया जाता है कि किस तरह की सर्जरी की जरूरत है. प्रक्रिया कितनी जटिल होगी, यह भी इसी आधार पर तय होता है. सर्जरी के बाद मरीज को रिकवरी और फॉलोअप की जरूरत होती है. कुछ मामलों में दवाइयों, काउंसलिंग या दूसरी सहायक प्रक्रियाओं की भी जरूरत पड़ सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/infotainment/zydus-the-easiest-exam-breast-cancer-screening-program-awareness-about-symptoms-family-history-doctors-3199515&quot;&gt;&lt;strong&gt;ब्रेस्ट हेल्थ पर डॉक्टरों ने की चर्चा, ब्रेस्ट कैंसर स्क्रीनिंग और समय पर पहचान पर फोकस&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;भारत में कितना हो सकता है खर्च?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;Craftsmanclinics की रिपोर्ट के अनुसार, जेंडर अफर्मिंग सर्जरी का खर्च एक तय रकम नहीं होता. यह सर्जरी के प्रकार, उसकी जटिलता, अस्पताल, सर्जन की एक्सपर्ट और मरीज को होने वाली दूसरी प्रक्रियाओं पर निर्भर करता है. उपलब्ध लागत संबंधी जानकारी के अनुसार, भारत में अलग-अलग जेंडर अफर्मिंग सर्जरी की कीमत करीब 2 लाख रुपये से 10 लाख रुपये तक हो सकती है. उदाहरण के लिए, ब्रेस्ट ऑगमेंटेशन की लागत करीब 1.5 से 2.5 लाख रुपये और वैजिनोप्लास्टी की लागत करीब 2.5 से 7 लाख रुपये बताई गई है. फेशियल फेमिनाइजेशन सर्जरी की कीमत करीब 2 से 6 लाख रुपये तक हो सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सिर्फ ऑपरेशन का खर्च नहीं होता शामिल&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सर्जरी की कुल लागत में सिर्फ ऑपरेशन का खर्च ही शामिल नहीं होता. सर्जरी से पहले होने वाली काउंसलिंग, मेडिकल टेस्ट और कुछ मामलों में हार्मोन थेरेपी का खर्च अलग हो सकता है. वहीं सर्जरी के बाद दवाइयां, फॉलोअप और रिकवरी से जुड़ी देखभाल भी कुल खर्च का हिस्सा बन सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-drugs-non-scheduled-trade-margin-cap-30-percent-mrp-india-3199444&quot;&gt;&lt;strong&gt;कैंसर की ये दवाएं होंगी सस्ती, सरकार ने ट्रेड मार्जिन पर लगाई कैप&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/2a01fcd7412c9c64f3f2dcdbaa5d924217918835927271257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[सोते-सोते सुन्न हो जाता है हाथ, हो सकती है गंभीर वजह ]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/hand-numb-while-sleeping-causes-3201474</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/hand-numb-while-sleeping-causes-3201474#respond</comments><pubDate>Wed, 14 Oct 2026 07:50:59 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/hand-numb-while-sleeping-causes-3201474</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या आपके साथ भी ऐसा होता है कि रात में सोते समय अचानक हाथ सुन्न पड़ जाता है और उंगलियों में झनझनाहट होने लगती है? कई बार लोग हाथ को &amp;nbsp;हिलाकर या सोने की पोजीशन बदलकर दोबारा सो जाते हैं. कभी-कभार ऐसा होना आम बात है, लेकिन अगर यह परेशानी बार-बार हो रही है तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. इसके पीछे नसों पर दबाव से लेकर कुछ बड़ी स्वास्थ्य समस्याएं भी हो सकती हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गलत पोजीशन में सोना&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a title=&quot;गाजियाबाद&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/topic/ghaziabad-news&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;गाजियाबाद&lt;/a&gt; स्थित यशोदा अस्पताल के डॉ. एसके अग्रवाल के मुताबिक, हाथ सुन्न होने की सबसे आम वजह गलत तरीके से सोना होती है. अगर आप हाथ के नीचे सिर रखकर सोते हैं या हाथ को शरीर के नीचे दबा लेते हैं, जिससे नसों पर दबाव पड़ता है. लंबे समय तक एक ही पोजीशन में रहने से हाथ में सुन्नपन या झनझनाहट महसूस होने &amp;nbsp;लगती है. ऐसे में सोने की पोजीशन बदलने और हाथ को आराम देने से परेशानी कम होती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;strong&gt;कलाई की नस का रखें ख्याल&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कलाई की नस पर दबाव पड़ने से कार्पल टनल सिंड्रोम नाम की समस्या होती है. इसमें खासकर अंगूठे, तर्जनी और बीच वाली उंगली में सुन्नपन, झनझनाहट या दर्द महसूस होता है. कई बार रात में इसकी परेशानी बढ़ जाती है और नींद खुल जाती है. अगर आपके साथ ऐसा बार-बार हो रहा है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गर्दन की नस पर दबाव पड़ना भी कारण&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;गर्दन की हड्डियों या डिस्क से जुड़ी समस्या के कारण भी हाथ में सुन्नपन होता है. जब गर्दन से निकलने वाली किसी नस पर दबाव पड़ता है, तो दर्द, झनझनाहट या कमजोरी हाथ तक महसूस होती है. अगर हाथ सुन्न होने के साथ गर्दन में दर्द भी रहता है, तो इसकी जांच करवानी चाहिए.साथ ही अगर कोहनी को लंबे समय तक मोड़कर रखने या उस पर शरीर का वजन पड़ने से भी नस दबती है. इससे खासकर छोटी उंगली और उसके पास वाली उंगली में झनझनाहट या सुन्नपन महसूस होने लगता है. सोते समय कोहनी को बहुत ज्यादा मोड़कर रखने से बचें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/morning-heavy-eyes-causes-waking-up-puffy-swollen-tired-dry-eye-3200526&quot;&gt;सुबह उठते ही आंखों में रहता है भारीपन, हो सकती है यह वजह&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;विटामिन की कमी और डायबिटीज&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शरीर में विटामिन बी12 की कमी और डायबिटीज के कारण नसों को नुकसान पहुंचता है. इससे हाथों या पैरों में सुन्नपन, जलन और झनझनाहट महसूस होती है. अगर ऐसे में अगर हाथ बार-बार सुन्न होता है, लंबे समय तक ठीक नहीं होता या हाथ में कमजोरी भी महसूस होती है, तो डॉक्टर से संपर्क करें. अगर अचानक हाथ सुन्न होने के साथ चेहरे में कमजोरी, बोलने में परेशानी या शरीर के एक तरफ कमजोरी हो, तो तुरंत इमरजेंसी सहायता लें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/anandita-bitolia-indian-mom-weight-loss-25-kg-and-include-dark-chocolate-in-diet-plan-3200669&quot;&gt;चॉकलेट खाकर इस भारतीय मां ने घटाया 25 किलो वजन, जानें डाइट प्लान!&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: हाथ सुन्न होने की वजह हर व्यक्ति में अलग हो सकती है. सही कारण जानने के लिए डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/77247aa17ae6a8363f650d44052ee3be17918797066441472_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[केवल 6 महीने में कैंसर को कैसे दें मात? आज से ही फॉलो करें ये टिप्स]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433#respond</comments><pubDate>Tue, 13 Oct 2026 22:56:09 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/cancer-treatment-l-recovery-tips-diet-exercise-follow-up-3201433</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कैंसर का नाम सुनते ही मन में कई तरह के सवाल आने लगते हैं. मरीज और उसके परिवार के लिए यह समय शारीरिक के साथ-साथ मानसिक रूप से भी चुनौतीपूर्ण होता है. ऐसे में सही इलाज, पौष्टिक आहार और डॉक्टर की सलाह का पालन करना बेहद जरूरी है. आप कुछ च3ईजन का विशेष ध्यान रख कर कैंसर से &amp;nbsp;जल्दी रिकवरी कर सकते हैं जाने क्या है वह टिप्स&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सबसे पहले विशेषज्ञ से लें सलाह&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;a title=&quot;गाजियाबाद&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/topic/ghaziabad-news&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;गाजियाबाद&lt;/a&gt; स्थित यशोदा अस्पताल के डॉ. एसके अग्रवाल के मुताबिक, कैंसर के इलाज में सबसे जरूरी कदम सही समय पर विशेषज्ञ से संपर्क करना है. कैंसर के प्रकार और स्टेज के अनुसार डॉक्टर सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, इम्यूनोथेरेपी या दूसरी उपचार की सलाह देते हैं. हर मरीज के लिए एक ही तरह का इलाज प्रभावी हो, यह जरूरी नहीं है. इसलिए किसी दूसरे मरीज का अनुभव सुनकर अपना इलाज बदलना या घरेलू नुस्खों के भरोसे रहना नुकसानदायक होता है. डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं और उपचार समय पर लेना जरूरी है&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/free-treatment-affordable-medicines-14555-and-104-health-helpline-numbers-3200883#google_vignette&quot;&gt;Health Helpline Number: फ्री इलाज और सस्ती दवा चाहिए? इन 2 नंबरों से तुरंत मिलेगी मदद&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आहार से शरीर को दें ताकत&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कैंसर के इलाज के दौरान शरीर को पर्याप्त पोषण देना जरूरी होता है. फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, दूध, अंडे और प्रोटीन के दूसरे स्रोत जरूरत के अनुसार आहार में शामिल करें. मरीज की पोषण संबंधी जरूरतें इलाज और उसके नुकसान के हिसाब से बदल सकती हैं. कुछ मरीजों को पर्याप्त कैलोरी और प्रोटीन की जरूरत होती है, जबकि कुछ को खाने या निगलने में परेशानी होती है. ऐसे में डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से डाइट बनाएं. बिना सलाह के सप्लीमेंट या बहुत सख्त डाइट शुरू न करें.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हल्की सैर या एक्सरसाइज से रखें ख्याल&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मरीज अपनी क्षमता के अनुसार हल्की सैर या एक्सरसाइज कर सकता है. इससे ऊर्जा, मांसपेशियों की ताकत और डेली लाइफ की एक्टिविटीज बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है. पर्याप्त आराम, तनाव कम करने के तरीके और परिवार का सहयोग भी महत्वपूर्ण हैं. इलाज पूरा होने के बाद भी डॉक्टर के बताए समय पर फॉलो-अप जांच कराना जरूरी है. इन जांचों से स्वास्थ्य पर नजर रखने और किसी समस्या का समय पर पता लगाने में मदद मिलती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: कैंसर को केवल छह महीने में पूरी तरह ठीक करने का कोई सामान्य फॉर्मूला नहीं है. बीमारी का प्रकार, उसकी स्टेज और मरीज की सेहत के आधार पर डॉक्टर द्वारा इलाज की योजना बनाई जाती है. एक बार किसी भी रूटीन को फॉलो करने से पहले डॉक्टर से बात करें.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/long-covid-study-mouth-lung-bacteria-microbiome-respiratory-symptoms-european-respiratory-journal-3201071&quot;&gt;लॉन्ग कोविड का नया खतरा, मुंह और फेफड़ों के बैक्टीरिया में दिखे बड़े बदलाव&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/3880b46e42a4ea9a6dd6bad710b4933e17918757761941472_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[दांतों की झनझनाहट को इन घरेलू तरीकों से करें कम, ऐसे मिलेगा आराम]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/home-remedies-for-sensitive-teeth-3201647</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/home-remedies-for-sensitive-teeth-3201647#respond</comments><pubDate>Tue, 13 Oct 2026 19:21:47 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/home-remedies-for-sensitive-teeth-3201647</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ठंडा पानी पीना हो या गर्म चाय की चुस्की लेना, कई बार दांतों में अचानक झनझनाहट होने लगती है. कुछ लोगों को आइसक्रीम, मिठाई या खट्टा खाने पर भी तेज सनसनाहट महसूस होती है. इस परेशानी की वजह दांतों की ऊपरी परत कमजोर होना, मसूड़ों का पीछे हटना या कैविटी होती है. कई बार गलत तरीके से ब्रश करने पर भी दांत सेंसिटिव हो जाते हैं. ऐसे में कुछ आसान आदतें अपनाकर परेशानी को कम किया जा सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बहुत ठंडा या गर्म खाने से बचें&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर दांतों में झनझनाहट होती है, तो कुछ समय तक बहुत ठंडी और गर्म चीजें खाने-पीने से बचें. ठंडा पानी, आइसक्रीम या बहुत गर्म चाय-कॉफी से परेशानी बढ़ती है. ऐसे में सामान्य तापमान का पानी पिएं और खाना बहुत गर्म होने पर थोड़ा ठंडा करके खाएं. इससे दांतों को अचानक तापमान बदलने से होने वाली परेशानी से बचाने में मदद मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सेंसिटिविटी वाले टूथपेस्ट का इस्तेमाल करें&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दांतों की झनझनाहट कम करने के लिए सेंसिटिव दांतों के लिए बना टूथपेस्ट इस्तेमाल करें. इसमें मौजूद कुछ तत्व दांतों की नसों तक पहुंचने वाले दर्द के संकेतों को कम करने में मदद करते हैं. इसे नियमित रूप से इस्तेमाल करने पर कुछ दिनों या हफ्तों में फर्क महसूस होने लगता है. टूथपेस्ट का इस्तेमाल पैक पर दिए निर्देशों के अनुसार करें.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/winter-skin-care-tips-prevent-dry-skin-3201492&quot;&gt;इन सर्दियों में रूखी न हो स्किन, इसके लिए अभी से करें ये काम &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सॉफ्ट ब्रश से करें दांतों की सफाई&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दांत साफ करते समय ज्यादा जोर लगाने से बचें. सॉफ्ट ब्रिसल वाले टूथब्रश का इस्तेमाल करें और हल्के हाथों से दांतों की सफाई करें. जोर से ब्रश करने से दांतों की ऊपरी परत को नुकसान पहुंचते है और मसूड़े भी पीछे हटते हैं. इससे दांतों में सेंसेटिविटी बढ़ती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;खट्टा खाने के बाद तुरंत ब्रश न करें&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नींबू, संतरा और दूसरे खट्टे खाद्य पदार्थों में एसिड होता है, जो दांतों की ऊपरी परत को कुछ समय के लिए कमजोर कर सकता है. ऐसे में खट्टा खाने के तुरंत बाद ब्रश करने से बचें. इसके बजाय सादे पानी से कुल्ला करें और करीब 30 मिनट बाद ब्रश करें. इससे दांतों की ऊपरी परत को सुरक्षित रखने में मदद मिलती है. साथ ही &amp;nbsp;अलावा, सोडा और दूसरे मीठे या एसिड वाले पेय पदार्थों का ज्यादा सेवन करने से भी बचें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें : &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/persistent-headache-dizziness-grade-4-astrocytoma-brain-tumour-case-3201523&quot;&gt;Brain Tumor Symptoms: क्या सिरदर्द के साथ आते हैं चक्कर? भूलकर भी न करें नजरअंदाज &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer&amp;nbsp; :&lt;/strong&gt; &lt;em&gt;&lt;strong&gt;दांतों की झनझनाहट कम करने के लिए सही टूथपेस्ट, सॉफ्ट ब्रश और खाने-पीने की आदतों में बदलाव मददगार होते हैं. लेकिन अगर दर्द लगातार बना रहे, एक ही दांत में तेज दर्द हो, मसूड़ों में सूजन आए या खाना चबाने में परेशानी हो, तो डेंटिस्ट को जरूर दिखाएं. घरेलू उपाय कैविटी या दांतों की दूसरी समस्याओं का इलाज नहीं हैं.&lt;/strong&gt;&lt;/em&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/10/13/64137b561aa465b6c33a65970429b90317918987213761472_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>