<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?</title><atom:link href="https://www.abplive.com/health/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Sun, 30 Aug 2026 15:50:27 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[हमेशा अकेले खाना खाते हैं? जानें कैसे मेंटल हेल्थ बिगाड़ती है ये आदत]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/eating-alone-mental-health-depression-side-effects-brain-health-impact-3181835</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/eating-alone-mental-health-depression-side-effects-brain-health-impact-3181835#respond</comments><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 12:12:06 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ दीनदयाल पाटीदार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/eating-alone-mental-health-depression-side-effects-brain-health-impact-3181835</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बहुत से लोग अकेले खाना खाते हैं. ऑफिस में लंच ब्रेक हो या घर पर डिनर टाइम, कई लोग फोन या लैपटॉप के सामने अकेले बैठकर खाना खा लेते हैं. शुरुआत में यह आदत बहुत मामूली लगती है, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि लगातार अकेले खाना खाने की आदत मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डाल सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्यों बढ़ रही है अकेले खाना खाने की आदत&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वर्क फ्रॉम होम, बिजी शेड्यूल और सोशल मीडिया पर बढ़ता समय आजकल लोगों को परिवार और दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने से दूर कर रहा है. कई लोग जल्दी में खाना निपटा लेते हैं, तो कुछ लोग अकेले रहने की वजह से भी अकेले खाना खाते हैं. यह आदत धीरे-धीरे इतनी सामान्य हो गई है कि लोग इसके असर को नोटिस भी नहीं कर पाते.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अकेले खाना खाने से मेंटल हेल्थ पर क्या असर पड़ता है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक्सपर्ट्स के मुताबिक, साथ बैठकर खाना खाना सिर्फ पेट भरने का काम नहीं करता, बल्कि यह इमोशनल कनेक्शन भी बनाता है. जब हम परिवार या दोस्तों के साथ खाना खाते हैं तो बातचीत होती है, हंसी-मजाक होता है और दिन भर का स्ट्रेस हल्का हो जाता है. हालांकि, अकेले खाना खाने पर यह मौका नहीं मिलता, जिससे धीरे-धीरे अकेलापन महसूस होने लगता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लगातार अकेले खाना खाने से इंसान खुद को दूसरों से कटा हुआ महसूस कर सकता है. इससे स्ट्रेस और एंग्जायटी बढ़ने का खतरा रहता है. कुछ स्टडीज में यह भी सामने आया है कि जो लोग अक्सर अकेले खाना खाते हैं, उनमें उदासी और लो मूड की शिकायत ज्यादा देखी जाती है. साथ ही, अकेले खाना खाते समय फोन या टीवी देखने की आदत से माइंडफुल ईटिंग यानी ध्यान से खाना खाने की आदत भी छूट जाती है, जिससे ओवरईटिंग या गलत खानपान की समस्या भी हो सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/swine-flu-h1n1-cases-state-wise-data-delhi-karnataka-maharashtra-rajasthan-3181569&quot;&gt;&lt;strong&gt;Swine Flu: स्वाइन फ्लू का कहर: किस राज्य में कितने मरीज? देखें पूरी लिस्ट&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस आदत को कैसे बदलें?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि हफ्ते में कम से कम कुछ दिन परिवार या दोस्तों के साथ बैठकर खाना खाने की कोशिश करनी चाहिए. ऑफिस में साथ काम करने वाले साथियों के साथ लंच करना भी एक अच्छा विकल्प है. खाना खाते समय फोन या लैपटॉप से दूरी बनाना भी जरूरी है, ताकि खाने पर पूरा ध्यान दिया जा सके. अगर अकेले खाना खाना मजबूरी है, तो भी परिवार या दोस्तों से वीडियो कॉल पर बात करते हुए खाना खाया जा सकता है, ताकि जुड़ाव महसूस हो. छोटी-छोटी आदतों में बदलाव लाकर अकेले खाना खाने की वजह से होने वाले मेंटल हेल्थ के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें:&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/binghamton-university-research-study-how-taking-screenshots-and-photos-affects-human-memory-loss-3181028&quot;&gt;&lt;strong&gt;स्क्रीनशॉट लेने की आदत से घट रही है आपकी याददाश्त, नई रिसर्च में खुलासा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/30/07f2342a0952c41c94e5977dd010ef8017880643266061474_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[How To Prevent Chafing: जांघे छिलने से हैं परेशान? इन तरीकों से जिंदगी भर के लिए मिल जाएगा आराम]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/thigh-chafing-causes-treatment-prevention-long-lasting-relief-3181577</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/thigh-chafing-causes-treatment-prevention-long-lasting-relief-3181577#respond</comments><pubDate>Sun, 30 Aug 2026 09:21:42 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/thigh-chafing-causes-treatment-prevention-long-lasting-relief-3181577</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;How To Prevent Thigh Chafing In Summer:&lt;/strong&gt; गर्मियों या उमस भरे मौसम में कई लोगों को जांघों के बीच त्वचा छिलने की परेशानी होने लगती है. चलने, दौड़ने या ज्यादा देर तक एक्टिव रहने पर यह समस्या और बढ़ सकती है. कई बार कपड़ों की रगड़, पसीना और त्वचा के आपस में घर्षण की वजह से जांघों के बीच लालिमा, जलन और खुजली होने लगती है. अगर समय रहते इसका ध्यान न रखा जाए तो त्वचा पर छोटे-छोटे दाने, छाले या घाव भी हो सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस समस्या को मेडिकल भाषा में चफिंग कहा जाता है. यह सिर्फ जांघों तक सीमित नहीं है. बगल, कमर, नितंब, छाती और पैरों में भी त्वचा के रगड़ खाने से चफिंग हो सकती है. हालांकि, सही देखभाल और कुछ आसान सावधानियों की मदद से इससे बचा जा सकता है और बार-बार होने वाली परेशानी को काफी हद तक रोका जा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;आखिर जांघों की त्वचा क्यों छिलती है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हेल्थ के बारे में जानकारी देने वाली संस्था clevelandclinic के अनुसार, जांघों के छिलने की सबसे बड़ी वजह त्वचा का लगातार आपस में रगड़ना है. जब चलने या किसी दूसरी एक्टिविटी के दौरान दोनों जांघों की त्वचा बार-बार एक-दूसरे से टकराती है तो वहां घर्षण बढ़ जाता है. कपड़ों की रगड़ भी इस समस्या को बढ़ा सकती है. पसीना और नमी इस परेशानी को और गंभीर बना देते हैं. नम त्वचा ज्यादा आसानी से क्षतिग्रस्त होती है और लगातार रगड़ लगने पर जलन और लालिमा बढ़ सकती है. यही वजह है कि गर्म और उमस वाले &lt;a title=&quot;मौसम&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/weather&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;मौसम&lt;/a&gt; में जांघों के छिलने की शिकायत ज्यादा देखने को मिलती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जो लोग ज्यादा एक्सरसाइज करते हैं, लंबे समय तक चलते हैं या ऐसी गतिविधियां करते हैं जिनमें लगातार शरीर की मूवमेंट होती है, उनमें भी चफिंग का खतरा बढ़ सकता है. बहुत टाइट कपड़े या ऐसे कपड़े जिनमें नमी ज्यादा देर तक बनी रहती है, वे भी परेशानी की वजह बन सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/90257135b2f81db01cb059c9a5eeb11d17879914117131257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;जांघें छिलने पर कैसे पहचानें समस्या?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शुरुआत में प्रभावित जगह पर लालिमा और हल्की जलन महसूस हो सकती है. इसके साथ त्वचा में खुजली, रूखापन या छूने पर गर्माहट महसूस हो सकती है. कई लोगों को चलने या कपड़ा लगने पर चुभन और दर्द भी होता है. अगर रगड़ ज्यादा बढ़ जाए तो त्वचा पर छोटे-छोटे उभरे हुए दाने, छाले या घाव हो सकते हैं. गंभीर स्थिति में त्वचा फट सकती है और खून भी आ सकता है. इसलिए लगातार होने वाली जलन को सिर्फ सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सबसे पहले रगड़ को रोकना जरूरी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर जांघों की त्वचा छिल गई है तो सबसे पहले उस गतिविधि से कुछ समय के लिए ब्रेक लें, जिसकी वजह से रगड़ हो रही है. त्वचा को ठीक होने का समय देना जरूरी है. इस दौरान साफ और आरामदायक कपड़े पहनें, जो त्वचा से ज्यादा न रगड़ें. बहुत टाइट कपड़ों से बचना भी फायदेमंद हो सकता है. ऐसे कपड़े चुनें जो शरीर के लिए आरामदायक हों और पसीने को त्वचा पर लंबे समय तक जमा न रहने दें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/17616aa616c240e035b2f948f074892c17879914418291257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नमी को कंट्रोल करें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जांघों के बीच पसीना और नमी चफिंग को बढ़ा सकते हैं. इसलिए इस हिस्से को साफ और सूखा रखना जरूरी है. नमी सोखने वाले फैब्रिक के कपड़े पहने जा सकते हैं. जरूरत पड़ने पर कॉर्नस्टार्च का इस्तेमाल अतिरिक्त नमी सोखने के लिए किया जा सकता है. हालांकि, अगर त्वचा पहले से फट गई है या घाव बन गया है तो किसी भी घरेलू चीज को लगाने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना बेहतर है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;त्वचा को दें राहत&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;प्रभावित हिस्से को हल्के साबुन और पानी से साफ करें और धीरे से सुखाएं. इसके बाद एलोवेरा जेल या पेट्रोलियम जेली की बहुत पतली परत लगाई जा सकती है. ये त्वचा को शांत करने और आगे होने वाली रगड़ को कम करने में मदद कर सकते हैं. पेट्रोलियम जेली जैसी चीजें त्वचा और कपड़े के बीच घर्षण कम करने में भी मदद कर सकती हैं. लेकिन अगर दर्द, सूजन या घाव बढ़ रहा हो तो खुद से इलाज करते रहने के बजाय डॉक्टर से संपर्क करें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621&quot;&gt;&lt;strong&gt;3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दोबारा जांघें न छिलें, इसके लिए क्या करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बार-बार चफिंग से बचने के लिए सबसे जरूरी है कि कपड़े सही फिटिंग के हों. बहुत टाइट कपड़े जांघों में रगड़ बढ़ा सकते हैं. कपड़े के फैब्रिक का चुनाव भी महत्वपूर्ण है. नमी सोखने वाले फैब्रिक बेहतर हो सकते हैं, जबकि कॉटन पसीना सोखने के बाद देर तक गीला रह सकता है. अगर आप रनिंग, साइकिलिंग या कोई दूसरी एक्सरसाइज करते हैं तो एक्टिविटी शुरू करने से पहले एंटी-चफिंग प्रोडक्ट का इस्तेमाल किया जा सकता है. जरूरत के मुताबिक पैडिंग या टेप भी रगड़ वाली जगह पर सुरक्षा दे सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कब डॉक्टर को दिखाना चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हल्की चफिंग आमतौर पर कुछ दिनों में ठीक हो जाती है. लेकिन अगर समस्या लगातार बनी रहे, लक्षण बढ़ते जाएं या त्वचा पर छाले, घाव, ज्यादा सूजन या खून आने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. लगातार नमी और त्वचा के खराब होने से बैक्टीरियल या फंगल इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ सकता है. जांघों के बीच होने वाली हर जलन चफिंग ही हो, यह जरूरी नहीं है. उदाहरण के लिए जॉक इच एक फंगल इंफेक्शन है, जबकि चफिंग मुख्य रूप से रगड़ की वजह से होती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/f8dd27be15578cded0c1a533ed9f897117879916120311257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Swine Flu: स्वाइन फ्लू का कहर: किस राज्य में कितने मरीज? देखें पूरी लिस्ट]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/swine-flu-h1n1-cases-state-wise-data-delhi-karnataka-maharashtra-rajasthan-3181569</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/swine-flu-h1n1-cases-state-wise-data-delhi-karnataka-maharashtra-rajasthan-3181569#respond</comments><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:50:38 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/swine-flu-h1n1-cases-state-wise-data-delhi-karnataka-maharashtra-rajasthan-3181569</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Swine Flu H1N1 Cases In India:&lt;/strong&gt; देश के कई हिस्सों में स्वाइन फ्लू यानी H1N1 के मामले बढ़ रहे हैं. खासकर मानसून के दौरान इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. दिल्ली, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और चंडीगढ़ समेत कई जगहों से नए मामले सामने आए हैं. हेल्थ विभागों के आंकड़ों के मुताबिक, कुछ राज्यों में इस साल अब तक सामने आए मामले पिछले साल के मुकाबले ज्यादा हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली में 2,729 H1N1 केस&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्वाइन फ्लू का इंफेक्शन लगातार बढ़ रहा है. स्वास्थ्य विभाग के 27 अगस्त तक के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली में H1N1 के कुल 2,729 मामले सामने आ चुके हैं. अकेले 27 अगस्त को 125 नए मरीज मिले. इन्फ्लुएंजा ए और बी को मिलाकर दिल्ली में कुल मामलों की संख्या 3,736 हो गई है. इनमें करीब तीन-चौथाई मामले H1N1 के हैं. पिछले साल की तुलना में इस साल दिल्ली में इंफेक्शन के मामले काफी ज्यादा दर्ज किए गए हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कर्नाटक में 4,428 मरीज&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कर्नाटक में भी H1N1 और इन्फ्लुएंजा के मामले बड़ी संख्या में सामने आए हैं. 24 अगस्त तक राज्य में 4,428 लैब से पुष्टि किए गए H1N1/इन्फ्लुएंजा के मामले दर्ज किए गए. कर्नाटक में इन्फ्लुएंजा का असर आमतौर पर साल में दो बार ज्यादा देखने को मिलता है. पहला दौर जनवरी से मार्च के बीच और दूसरा जुलाई से सितंबर के बीच आता है. कर्नाटक में हेल्थ विभाग ने इसको लेकर एडवाइजरी भी जारी किया है और लोगों से सतर्क रहने की अपील की है, हालांकि अधिकारियों का कहना है कि घबराने की जरूरत नहीं है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/53e77984b95c296625aa37adde4516af17879902033671257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;महाराष्ट्र में पिछले साल से ज्यादा मामले&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;महाराष्ट्र में भी इस साल H1N1 के मामले तेजी से बढ़े हैं. 21 अगस्त तक राज्य में 1,109 H1N1 मरीज सामने आ चुके थे. यह संख्या पूरे 2025 में दर्ज किए गए 942 मामलों से भी ज्यादा है. राज्य में मुंबई और पुणे H1N1 के प्रमुख केंद्र बने हुए हैं. दोनों शहरों में राज्य के कुल संक्रमण के करीब 65 फीसदी मामले दर्ज किए गए हैं. महाराष्ट्र के राज्य महामारी एक्सपर्ट डॉ. राजू सुले के मुताबिक, मानसून के दौरान इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी सामान्य है, लेकिन इस साल के आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में ज्यादा हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/bf043e294e14ec7cc8a1977de1c5423417879902405771257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, ICMR ने साफ किया है कि फिलहाल किसी नए स्ट्रेन की पहचान नहीं हुई है. देश में फैल रहे Influenza A (H1N1) pdm09 वायरस 2025 से ही मौजूद हैं. ऐसे में लोगों को घबराने के बजाय सावधानी बरतने की सलाह दी गई है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;राजस्थान में अगस्त में सबसे ज्यादा केस&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राजस्थान में भी अगस्त के दौरान H1N1 के मामलों में तेज बढ़ोतरी हुई है. स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, अगस्त में अब तक 55 मरीजों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है. यह इस साल किसी एक महीने में दर्ज किए गए मामलों की सबसे ज्यादा संख्या है. जनवरी से अगस्त 2026 तक राजस्थान में H1N1 के कुल 146 मामले सामने आए हैं. इनमें जनवरी में 2, फरवरी में 3, मार्च में 20, अप्रैल में 22, मई में 25, जून में 14, जुलाई में 5 और अगस्त में 55 मामले दर्ज किए गए. राज्य के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक, फिलहाल H1N1 के किसी नए या ज्यादा खतरनाक स्ट्रेन के फैलने की पुष्टि नहीं हुई है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लखनऊ में नए मरीज मिले&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उत्तर प्रदेश की राजधानी &lt;a title=&quot;लखनऊ&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/topic/lucknow&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;लखनऊ&lt;/a&gt; में भी H1N1 के मामले सामने आ रहे हैं. बलरामपुर अस्पताल में H1N1 से इंफेक्टेड एक महिला की मौत के एक दिन बाद दो और मरीजों की रिपोर्ट पॉजिटिव आई. दोनों मरीजों को अस्पताल के आइसोलेशन वार्ड में भर्ती कराया गया है और उनकी हालत फिलहाल स्थिर बताई जा रही है. अस्पताल के मुताबिक, RT-PCR जांच में दोनों मरीजों में H1N1 संक्रमण की पुष्टि हुई है. उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी 75 जिलों को निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;गुरुग्राम में 12 मामले&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हरियाणा के गुरुग्राम में भी H1N1 के 12 मामले सामने आए हैं. बढ़ते संक्रमण को देखते हुए लोगों को सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है. राज्य सरकार भी संक्रमण की स्थिति पर नजर रख रही है और इससे निपटने की तैयारियां की जा रही हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;चंडीगढ़ में इस साल 14 मरीज&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चंडीगढ़ में भी मानसून के दौरान H1N1 के मामले बढ़े हैं. अगस्त में अब तक 7 मरीज सामने आए हैं. इस साल शहर में संक्रमण के कुल 14 मामले दर्ज किए गए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, अगस्त में सबसे ज्यादा मामले सामने आए. इसके अलावा जून और जुलाई में एक-एक, मई में दो, अप्रैल में एक और मार्च में दो मामले दर्ज किए गए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621&quot;&gt;&lt;strong&gt;3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कोलकाता में भी बढ़े मामले&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;22 जुलाई तक की रिपोर्ट के मुताबिक, कोलकाता में पिछले करीब दो हफ्तों में स्वाइन फ्लू के मामलों में तेजी देखी गई थी. कई मरीजों को गंभीर लक्षणों के कारण अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. मानसून की बारिश तेज होने के साथ संक्रमण के मामले बढ़े. डॉक्टरों के मुताबिक, मरीजों में लगातार तेज बुखार, सांस से जुड़ी समस्या, शरीर में तेज दर्द और डायरिया जैसे लक्षण देखने को मिले. शहर के पीयरलेस अस्पताल में करीब तीन हफ्तों से स्वाइन फ्लू के मरीज लगातार पहुंच रहे थे. 9 मरीजों को एक दिन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि कई अन्य मरीजों का इलाज ओपीडी में किया गया था.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मानसून के दौरान देश के कई हिस्सों में H1N1 का संक्रमण बढ़ रहा है. हालांकि, स्वास्थ्य अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल किसी नए और ज्यादा खतरनाक H1N1 स्ट्रेन के फैलने की पुष्टि नहीं हुई है. ऐसे में लोगों को घबराने के बजाय इंफेक्शन से बचाव के लिए सावधानी बरतने और लक्षण दिखने पर समय पर डॉक्टर से संपर्क करने की सलाह दी जा रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/29/51c93f9f6bac91e21621940d11af000a17879907626001257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[स्क्रीनशॉट लेने की आदत से घट रही है आपकी याददाश्त, नई रिसर्च में खुलासा]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/binghamton-university-research-study-how-taking-screenshots-and-photos-affects-human-memory-loss-3181028</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/binghamton-university-research-study-how-taking-screenshots-and-photos-affects-human-memory-loss-3181028#respond</comments><pubDate>Sat, 29 Aug 2026 08:30:14 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ दीनदयाल पाटीदार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/binghamton-university-research-study-how-taking-screenshots-and-photos-affects-human-memory-loss-3181028</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजकल हम कोई भी जरूरी जानकारी, तस्वीर या मैसेज देखते ही तुरंत उसका स्क्रीनशॉट ले लेते हैं. हमें लगता है कि स्क्रीनशॉट लेने से वह जानकारी हमेशा के लिए हमारे पास सुरक्षित रहेगी और हमें याद भी रहेगी. लेकिन एक नई रिसर्च में इसके बिल्कुल उलट बात सामने आई है. शोध के मुताबिक, बार-बार स्क्रीनशॉट लेने की आदत असल में हमारी याददाश्त को कमजोर बना रही है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अमेरिका की यूनिवर्सिटी में हुआ शोध&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह रिसर्च अमेरिका की बिंघैमटन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने की है. रिसर्चर्स ने पाया कि फोटो या स्क्रीनशॉट लेने की आदत याददाश्त को बेहतर बनाने के बजाय उसे कमजोर करती है. रिसर्चर्स ने इस स्थिति को एक खास नाम दिया है, जिसे फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट कहा गया है. आसान भाषा में समझें तो जो व्यक्ति किसी चीज की फोटो खींचता है, उसे उस चीज के बारे में उतना याद नहीं रहता, जितना उस व्यक्ति को याद रहता है जो सिर्फ ध्यान से उसे देखता है और आगे बढ़ जाता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कैसे किया गया यह प्रयोग?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस शोध के लिए छात्रों को कुछ तस्वीरें दिखाई गईं, जिनमें पेंटिंग और स्केच शामिल थीं. कुछ कलाकृतियों का छात्रों को स्क्रीनशॉट लेने के लिए कहा गया, जबकि बाकी को सिर्फ ध्यान से देखने के लिए कहा गया. इसके बाद सभी छात्रों से उन कलाकृतियों से जुड़े बारीक सवाल पूछे गए. नतीजों में सामने आया कि जिन तस्वीरों का छात्रों ने स्क्रीनशॉट लिया था, उनके बारे में उन्हें कम याद रहा. वहीं जिन तस्वीरों को उन्होंने बिना फोटो लिए सिर्फ देखा था, उनका विवरण उन्हें ज्यादा सटीक तरीके से याद रहा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चौकानें वाली बात आई सामने&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस शोध की सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कई छात्र यह तक भूल गए कि उन्होंने किस तस्वीर का स्क्रीनशॉट लिया था. जबकि उन्हें यह अच्छी तरह याद था कि उन्होंने किस तस्वीर की फोटो नहीं ली थी. इससे साफ पता चलता है कि स्क्रीनशॉट लेने के बाद दिमाग उस जानकारी को याद रखने की कोशिश ही बंद कर देता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्यों खतरनाक है यह आदत?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शोधकर्ताओं के मुताबिक इसके पीछे कुछ खास वजहें हैं. सबसे पहली वजह है ध्यान का बंट जाना. जब हम फोटो या स्क्रीनशॉट लेते हैं, तो हमारा ध्यान बटन दबाने और स्क्रीन सेट करने में चला जाता है, जबकि यही एनर्जी याददाश्त बनाने में लगनी चाहिए थी. दूसरी वजह है कॉग्निटिव ऑफलोडिंग, यानी जब दिमाग को यह भरोसा हो जाता है कि जानकारी फोन में सुरक्षित है, तो वह उसे याद रखने की कोशिश करना बंद कर देता है. यही कारण है कि लोग फोन नंबर याद नहीं रखते, क्योंकि वे फोन में सेव रहते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621&quot;&gt;&lt;strong&gt;3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्क्रीनशॉट की जगह डायरी में लिखने की सलाह&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;वैज्ञानिकों का सुझाव है कि अगर किसी जरूरी बात को लंबे समय तक याद रखना है, तो मोबाइल में स्क्रीनशॉट लेने के बजाय उसे डायरी या कागज पर लिख लेना चाहिए. लिखते समय दिमाग उस जानकारी को ध्यान से समझता और प्रोसेस करता है, जबकि स्क्रीनशॉट लेते वक्त दिमाग का यह काम पूरी तरह छूट जाता है, जिससे हम आसानी से वह बात भूल जाते हैं. रिसर्च में यह भी सामने आया कि करीब 90 फीसदी अमेरिकी लोग अपने फोन का इस्तेमाल करते हैं और एक व्यक्ति रोजाना करीब 20 तस्वीरें लेता है, जबकि उसके फोन में करीब दो हजार फोटो पहले से स्टोर रहती हैं.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/27/6057cd988492ec530173be344757647c17878397313611474_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Shingles Vaccine से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा भी कम, स्टडी में बड़ा दावा]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/shingles-vaccine-reduces-heart-disease-risk-study-3181222</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/shingles-vaccine-reduces-heart-disease-risk-study-3181222#respond</comments><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 16:32:02 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/shingles-vaccine-reduces-heart-disease-risk-study-3181222</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Shingles Vaccine Lowers Heart Disease Risk:&lt;/strong&gt; दाद से बचाने वाली वैक्सीन को लेकर एक नई स्टडी में चौंकाने वाली बात सामने आई है. रिसर्चर के मुताबिक, शिंगल्स की दो अलग-अलग वैक्सीन की तुलना करने पर नई वैक्सीन लेने वाले लोगों में दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम पाया गया. इस ग्रुप में दिल की बीमारी, हार्ट फेल्योर और दिल की धड़कन के अनियमित होने जैसी समस्याएं कम देखी गईं. पुरुषों में इस वैक्सीन के बाद इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा भी करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह स्टडी मशहूर मेडिकल जर्नल नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुई है. शोधकर्ताओं ने अमेरिका के लोगों के बड़े स्वास्थ्य रिकॉर्ड का डेटा खंगाला. इसमें 60 साल या उससे ज्यादा उम्र के लोगों को शामिल किया गया था. रिसर्चर ने उन लोगों की तुलना की, जिन्हें पहले वाली शिंगल्स वैक्सीन लगी थी और उन लोगों की, जिन्हें बाद में इस्तेमाल में आई नई वैक्सीन दी गई थी.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सात साल तक लोगों पर रखी गई नजर&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस स्टडी के लिए अमेरिका के करीब 60 हेल्थ सेंटर से डेटा लिया गया. इस नेटवर्क में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के हेल्थ रिकॉर्ड मौजूद थे. मुख्य स्टडी में 36,460-36,460 लोगों के दो ग्रुप बनाए गए. दोनों ग्रुप के लोगों की उम्र, बीमारियों, दवाओं और हेल्थ से जुड़ी दूसरी चीजों को ध्यान में रखकर उनकी तुलना की गई. इसके बाद करीब सात साल तक देखा गया कि उनमें दिल से जुड़ी बीमारियां कितनी सामने आईं. स्टडी के लिए वह समय चुना गया, जब अमेरिका में पुरानी शिंगल्स वैक्सीन की जगह नई वैक्सीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा था. पहले दौर में करीब 98.6 प्रतिशत लोगों को पुरानी वैक्सीन लगी थी. वहीं, एक साल बाद वाले दौर में करीब 93.5 प्रतिशत लोगों को नई वैक्सीन दी गई.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रिसर्चर ने पाया कि नई वैक्सीन वाले ग्रुप में सात साल के दौरान दिल और नसों से जुड़ी बीमारियों का कुल खतरा करीब 9 प्रतिशत कम था. हालांकि, समय के साथ यह अंतर धीरे-धीरे कम होता गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/28/985e9237a3a6ab531c51db5c223f18e317879021057321257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;हार्ट फेल्योर और दिल की बीमारी में भी कमी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्टडी में दिल की नसों से जुड़ी बीमारी के मामलों में करीब 10 प्रतिशत की कमी देखी गई. वहीं, हार्ट फेल्योर का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. पुरुषों और महिलाओं दोनों में इसके नतीजे लगभग एक जैसे रहे. इसके अलावा, दिल की धड़कन के अनियमित होने की बीमारी यानी एट्रियल फिब्रिलेशन का खतरा भी नई वैक्सीन वाले ग्रुप में करीब 7 प्रतिशत कम पाया गया. हालांकि, हर तरह की दिल और नसों से जुड़ी बीमारी में कमी नहीं मिली. दिल की मांसपेशियों में सूजन, पैरों की नसों की बीमारी, दिमाग में खून बहने और कुछ समय के लिए स्ट्रोक जैसे मामलों में कोई खास अंतर नहीं मिला.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/28/cbde6a741ca6fb1bab7e1d5b18d2559617879021235341257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;स्ट्रोक को लेकर क्या सामने आया?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस्केमिक स्ट्रोक के मामलों में दोनों ग्रुप के बीच कुल मिलाकर कोई बड़ा अंतर नहीं मिला. लेकिन जब पुरुषों और महिलाओं के आंकड़ों को अलग-अलग देखा गया, तो पुरुषों में इस्केमिक स्ट्रोक का खतरा करीब 12 प्रतिशत कम पाया गया. इसका मतलब यह नहीं है कि शिंगल्स वैक्सीन सभी लोगों में स्ट्रोक का खतरा 12 प्रतिशत कम कर देती है. स्टडी में सिर्फ एक संभावित संबंध सामने आया है. इसे पक्का साबित करने के लिए अभी और रिसर्च की जरूरत है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि कहीं दूसरे कारणों की वजह से तो नतीजे प्रभावित नहीं हुए. इसके लिए उन्होंने कोरोना महामारी के दौर को हटाकर भी डेटा की जांच की. इसके अलावा मौत के आंकड़ों को शामिल करके भी दोबारा एनालिसिस किया गया. इन सभी जांचों के बाद भी मुख्य नतीजों में ज्यादा बदलाव नहीं आया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;वैक्सीन का असर कैसे हो सकता है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शोधकर्ताओं का मानना है कि इसके पीछे शरीर की इम्यूनिटी और नसों की अंदरूनी परत में होने वाले बदलाव की भूमिका हो सकती है. नई शिंगल्स वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाला एक खास घटक शरीर की इम्यूनिटी को लंबे समय तक सक्रिय रख सकता है. इससे शरीर में सूजन पैदा करने वाली कुछ प्रक्रियाएं कम हो सकती हैं. शरीर में ज्यादा सूजन को दिल की बीमारियों के खतरे से जोड़ा जाता है. इसलिए माना जा रहा है कि वैक्सीन और दिल की बेहतर सेहत के बीच कोई संबंध हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448&quot;&gt;क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, शरीर में होने वाले ये बदलाव हमेशा बने रहें, यह जरूरी नहीं है. यही वजह हो सकती है कि स्टडी के शुरुआती सालों में दिल की बीमारियों में कमी ज्यादा दिखाई दी, लेकिन बाद के सालों में इसका असर कम होता गया.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अभी शिंगल्स वैक्सीन को हार्ट अटैक की दवा न समझें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्टडी के नतीजे दिल की सेहत को लेकर उम्मीद जरूर जगाते हैं, लेकिन शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि इससे यह साबित नहीं होता कि शिंगल्स वैक्सीन सीधे तौर पर हार्ट अटैक या स्ट्रोक को रोकती है. यह एक ऐसी स्टडी है जिसमें पहले से मौजूद हेल्थ रिकॉर्ड के आधार पर लोगों की तुलना की गई है. इसमें कुछ ऐसे फैक्टर की पूरी जानकारी नहीं थी, जो दिल की बीमारी के खतरे को प्रभावित कर सकते हैं. इनमें धूम्रपान, खान-पान, शराब, पढ़ाई, नौकरी और कमाई जैसी चीजें शामिल हैं. इसलिए यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि नतीजे सिर्फ वैक्सीन की वजह से ही आए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621&quot;&gt;3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/28/eae8ae860e93031c8e53ec40ce15e44f17879026047431257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[PCSK9 कोलेस्ट्रॉल की आम दवाओं से कैसे अलग, जानें किस तरह करती है काम?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/pcsk9-oral-medicine-how-does-it-work-on-cholesterol-how-it-differs-from-common-cholesterol-medication-3181196</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/pcsk9-oral-medicine-how-does-it-work-on-cholesterol-how-it-differs-from-common-cholesterol-medication-3181196#respond</comments><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 12:04:00 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निधि पाल ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/pcsk9-oral-medicine-how-does-it-work-on-cholesterol-how-it-differs-from-common-cholesterol-medication-3181196</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;शरीर में बढ़ते खराब कोलेस्ट्रॉल (LDL) को नियंत्रित करना दिल की सेहत के लिए सबसे जरूरी माना जाता है. लंबे समय से इसके लिए स्टैटिन दवाओं का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन कई मरीजों में ये दवाएं पूरी तरह कारगर नहीं होतीं. इसी बीच मेडिकल साइंस के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक सफलता मिली है. अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने जुलाई 2026 में Merck कंपनी की बनाई दुनिया की पहली ओरल PCSK9 इनहिबिटर दवा लिपफेंड्रा जेनेरिक नाम- Enlicitide को मंजूरी दे दी है. यह दवा रोजाना एक गोली के रूप में ली जाती है और कोलेस्ट्रॉल घटाने के पारंपरिक तरीकों से बिल्कुल अलग है. चलिए जानें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;पारंपरिक स्टैटिन दवाओं से कितनी अलग है यह तकनीक?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कोलेस्ट्रॉल को कम करने के लिए अब तक दी जाने वाली पारंपरिक दवाएं या स्टैटिन मुख्य रूप से लिवर में कोलेस्ट्रॉल बनने की प्रक्रिया को ही धीमा कर देती हैं. इनसे खराब कोलेस्ट्रॉल में करीब 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी आती है. हालांकि, कई मरीजों में इससे मांसपेशियों में गंभीर दर्द या लिवर एंजाइम बढ़ने जैसी समस्याएं होने लगती हैं. दूसरी ओर, नई ओरल PCSK9 इनहिबिटर दवा लिवर में कोलेस्ट्रॉल का निर्माण रोकने के बजाय, खून में मौजूद पहले से बह रहे खराब कोलेस्ट्रॉल को बाहर निकालने की क्षमता बढ़ा देती है. इससे एलडीएल स्तर में 50 से 60 प्रतिशत तक की भारी गिरावट आती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इंजेक्शन के झंझट से मिली मुक्ति&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;PCSK9 इनहिबिटर तकनीक पहले से मौजूद थी, लेकिन मरीज केवल सुई या इंजेक्शन पर ही निर्भर थे. पुराने PCSK9 इनहिबिटर को हर दो से चार हफ्ते में चमड़ी के नीचे इंजेक्शन के जरिए शरीर में पहुंचाना पड़ता था. इससे कई बार मरीज को इंजेक्शन लगने वाली जगह पर सूजन, लालिमा या दर्द की शिकायत होती थी. मर्क की लिपफेंड्रा टैबलेट के आने से अब मरीजों को बार-बार अस्पताल जाने या सुई चुभाने के डर से आजादी मिल गई है. यह रोजाना खाई जाने वाली एक साधारण गोली है, जिसके साइड इफेक्ट्स भी बहुत कम हैं, जैसे हल्का चक्कर आना या पेट खराब होना.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;शरीर में कैसे काम करती है यह दवा?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मानव शरीर में लिवर की सतह पर छोटे-छोटे रिसेप्टर्स यानी जालीदार सेंसर्स होते हैं. इनका मुख्य काम खून में बह रहे हानिकारक एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को पकड़कर लिवर के अंदर ले जाना और उसे नष्ट करना है. लेकिन हमारे शरीर में PCSK9 नाम का एक प्राकृतिक प्रोटीन मौजूद होता है, जो इन मददगार सेंसर्स को समय से पहले ही खत्म कर देता है. जब ये सेंसर्स कम हो जाते हैं, तो खून में बैड कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने लगती है. जब मरीज लिपफेंड्रा गोली खाता है, तो यह आंतों के जरिए अवशोषित होकर सीधे PCSK9 प्रोटीन को निष्क्रिय कर देती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a title=&quot;पैनक्रिएटिक कैंसर के मरीजों को राहत, इलाज के लिए नई दवा को मंजूरी&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/us-fda-approves-use-of-pancreatic-cancer-drug-3180762&quot; target=&quot;_self&quot;&gt;पैनक्रिएटिक कैंसर के मरीजों को राहत, इलाज के लिए नई दवा को मंजूरी&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कोलेस्ट्रॉल की तेजी से सफाई और बेहतर नतीजे&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जैसे ही PCSK9 प्रोटीन ब्लॉक होता है, लिवर की सतह पर मौजूद रिसेप्टर्स पूरी तरह सुरक्षित हो जाते हैं और उनकी संख्या तेजी से बढ़ने लगती है. ये मजबूत रिसेप्टर्स खून में फैले खराब कोलेस्ट्रॉल को स्पंज की तरह तेजी से सोख लेते हैं. इसके बाद सारा खराब कोलेस्ट्रॉल लिवर में जाकर पच जाता है, जिससे रक्त वाहिकाओं में ब्लॉकेज बनने का खतरा काफी हद तक टल जाता है. यह पूरा सिस्टम शरीर की प्राकृतिक सफाई प्रक्रिया को कई गुना मजबूत बना देता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत तेजी से गिरता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;किन मरीजों के लिए वरदान है दवा?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह नई ओरल दवा दो विशेष प्रकार के मरीजों के लिए गेम-चेंजर साबित होगी. पहले वे मरीज जो स्टैटिन इनटोलरेंट हैं, यानी जिन्हें पारंपरिक गोलियां खाने से मांसपेशियों में असहनीय दर्द होता है. दूसरे वे हाई-रिस्क मरीज, जिन्हें पहले कभी दिल का दौरा पड़ चुका है या जो अनुवांशिक बीमारी (HeFH) के कारण जन्मजात हाई कोलेस्ट्रॉल से जूझ रहे हैं. ऐसे मरीज जब स्टैटिन की सबसे तेज खुराक लेते हैं, तब भी उनका कोलेस्ट्रॉल सुरक्षित स्तर पर नहीं आता है. उनके लिए लिपफेंड्रा एक बेहद सुरक्षित और असरदार विकल्प बनकर उभरी है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a title=&quot;बुखार में गिर सकता है बच्चों का BP, जानें फौरन बचाव के जरूरी तरीके&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/fever-in-children-low-bp-dehydration-symptoms-and-first-aid-3180968&quot; target=&quot;_self&quot;&gt;बुखार में गिर सकता है बच्चों का BP, जानें फौरन बचाव के जरूरी तरीके&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/28/7100eb7c8808e7957ad39a72fecbd14f17878987707991014_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[बुखार में गिर सकता है बच्चों का BP, जानें फौरन बचाव के जरूरी तरीके]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/fever-in-children-low-bp-dehydration-symptoms-and-first-aid-3180968</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/fever-in-children-low-bp-dehydration-symptoms-and-first-aid-3180968#respond</comments><pubDate>Fri, 28 Aug 2026 10:42:37 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ संजना सिंह ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/fever-in-children-low-bp-dehydration-symptoms-and-first-aid-3180968</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बदलते &lt;a title=&quot;मौसम&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/weather&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;मौसम&lt;/a&gt; में बच्चों को बुखार आना एक आम बात है, लेकिन कई बार तेज बुखार के साथ बच्चों का ब्लड प्रेशर यानी BP भी गिरने लगता है, जो माता-पिता के लिए चिंता की बात बन जाती है. असल में तेज बुखार आने पर शरीर से पसीने के जरिए काफी पानी निकल जाता है, जिससे शरीर में पानी की कमी यानी डिहाइड्रेशन हो जाती है. यही डिहाइड्रेशन बच्चों में BP गिरने की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है. इसके अलावा अगर बुखार किसी गंभीर इंफेक्शन की वजह से आया हो, तो भी शरीर में BP कम होने की समस्या देखने को मिल सकती है. ऐसे में कई लोगों को समझ नहीं आता है कि क्या करें. आइए जानते हैं इसके बारे में पूरी जानकारी.&lt;/p&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किन लक्षणों से पहचानें कि BP गिर रहा?&lt;/h2&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बच्चों में BP गिरने के कुछ खास लक्षण होते हैं, जिन्हें पहचानना माता-पिता के लिए जरूरी है. अगर बच्चा सुस्त पड़ने लगे, बार-बार नींद में जाने लगे या ठीक से जवाब न दे पाए, तो यह BP गिरने का संकेत हो सकता है. इसके अलावा बच्चे के हाथ-पैर ठंडे पड़ जाना, त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, सांस तेज या अनियमित होना और चक्कर आने जैसी शिकायत भी इसके लक्षणों में शामिल हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुछ मामलों में बच्चे को उल्टी या दस्त भी हो सकते हैं, जिससे शरीर में पानी की कमी और बढ़ जाती है और पेशाब भी कम आने लगता है. अगर बच्चा बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस कर रहा हो या रोते-रोते अचानक शांत होकर सुस्त पड़ जाए, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, क्योंकि यह गंभीर स्थिति का संकेत हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448&quot;&gt;क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बचाव के लिए तुरंत करें ये जरूरी काम&lt;/h2&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर बुखार के साथ बच्चे का BP गिरने लगे, तो सबसे पहले घबराने की बजाय शांत रहकर सही कदम उठाना जरूरी है. बच्चे को लिटा दें और उसके पैरों को थोड़ा ऊपर उठाकर रखें, इससे दिमाग तक खून का बहाव बेहतर होता है. इसके साथ ही बच्चे को थोड़ी-थोड़ी देर में ORS का घोल, पानी, नारियल पानी या नमक-चीनी का घोल पिलाते रहें, ताकि शरीर में पानी की कमी पूरी हो सके.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बुखार कम करने के लिए बच्चे के माथे और शरीर पर हल्के गुनगुने या सामान्य पानी से भीगा कपड़ा रखें, लेकिन बहुत ठंडे पानी का इस्तेमाल न करें. बच्चे को तंग कपड़ों से आजादी दें और उसे खुली व हवादार जगह पर रखें. इन सबके साथ ही सबसे जरूरी बात यह है कि अगर बच्चा सुस्त पड़ रहा हो, बेहोशी जैसी हालत में जा रहा हो, हाथ-पैर ठंडे पड़ रहे हों या सांस तेज हो रही हो, तो देर न करते हुए तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621&quot;&gt;3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/27/4527e42871f16370917907d2f35b5b6a17878314488631381_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[पैनक्रिएटिक कैंसर के मरीजों को राहत, इलाज के लिए नई दवा को मंजूरी]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/us-fda-approves-use-of-pancreatic-cancer-drug-3180762</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/us-fda-approves-use-of-pancreatic-cancer-drug-3180762#respond</comments><pubDate>Thu, 27 Aug 2026 14:39:42 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ बाबर हुसैन ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/us-fda-approves-use-of-pancreatic-cancer-drug-3180762</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पैनक्रिएटिक कैंसर यानी अग्राशय के कैंसर को दुनिया के सबसे जानलेवा कैंसर माना जाता है, क्योंकि यह शुरुआती स्टेज में पकड़ में ही नहीं आता है. हालांकि, अब मरीजों के लिए एक बड़ी राहत की खबर सामने आई है. अमेरिका की फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने एडवांस्ड पैनक्रिएटिक कैंसर के लिए एक क्रांतिकारी नई दवा का मंजूरी दे दी है, जिसे दशकों से डॉक्टर और वैज्ञानिक तलाश कर रहे थे. आइए जानते हैं यह दवा क्या है, कैसे काम करती है, और मरीजों के लिए यह कितनी असरदार साबित हुई है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कौन सी दवा को मिली मंजूरी?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने 'डाराक्सोनरासिब' वैक्सीन को मंजूरी दी है, जिसे रेवोल्यूशन मेडिसिन्स कंपनी रासोंक ब्रांड नाम से बेचेगी. यह अपनी तरह की पहली गोली है, जो एक म्यूटेटेड प्रोटीन को ब्लॉक करती है. यह 90 प्रतिशत से ज्यादा पैनक्रिएटिक कैंसर मामलों में ट्यूमर की ग्रोथ को बढ़ा देता है. फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इसे तय वक्त से छह महीने पहले ही एक्सपेडाइटेड अप्रूवल दे दिया, जो इस दवा की अहमियत को दिखाता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-to-safe-from-h1n1-infected-patient-at-home-3179747&quot;&gt;घर में किसी को H1N1 है तो बाकी लोग कैसे बचें? इन बातों का रखें ध्यान&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या टारगेट करती है यह दवा?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह नई दवा आरएएसजीन फैमिली में होने वाले म्यूटेशन को निशाना बनाती है, जो सेल ग्रोथ को नियंत्रित करता है. इसमें &lt;span dir=&quot;auto&quot;&gt;केआरएएस&lt;/span&gt; म्यूटेशन को पैनक्रिएटिक कैंसर बढ़ाने का सबसे बड़ी वजह माना जाता है. लेकिन इस प्रोटीन की बनावट ऐसी है कि इससे जुड़ने वाली कोई दवा बनाना कई दशक तक नामुमकिन माना जाता था, यही वजह है कि इसे अनड्रगेबल कहा जाता था. रेवोल्यूशन मेडिसिन्स की यह दवा एक तरह के मॉलिक्यूलर ग्लू के जरिए कई &lt;span dir=&quot;auto&quot;&gt;केआरएएस&lt;/span&gt;&amp;nbsp;सबटाइप्स से जुड़ने में कामयाब रहती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मरीजें को क्यों है फायदेमंद?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस स्टडी में 500 मरीज शामिल हुए थे, जिनका मेटास्टैटिक यानी फैल चुका कैंसर पहले के इलाज पर रिस्पॉन्स करना बंद कर चुका था. मरीजों को रैंडमली इस नई दवा या पुराने कीमोथेरेपी ट्रीटमेंट पर रखा गया है. नतीजों में पाया गया कि नई दवा लेने वाले मरीजों की जिंदा रहने का मौका लगभग दोगुनी हो सकती है. साथ ही उनमें खतरनाक साइड इफेक्ट भी कम देखे जा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कितनी है दवा की कीमत&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कंपनी के मुताबिक, इस दवा के एक महीने के कोर्स की कीमत करीब 39,800 डॉलर है, यानी भारतीय रुपयों में करीब 33 लाख रुपये के आसपास आता है. यह रोजाना ली जाने वाली गोली के रूप में आएगी. पैनक्रिएटिक कैंसर का इलाज करने वाले डॉक्टरों को उम्मीद है कि इस दवा की मंजूरी दूसरे कैंसर के लिए भी नए रास्ते खोल सकती है, क्योंकि इसी बुनियाद पर दर्जनों एक्सपेरिमेंटल दवाएं भी डेवलपमेंट स्टेज में हैं. कंपनी अब इसी टेक्नोलॉजी को फेफड़ों के कैंसर के साथ कई और तरह के कैंसर पर भी टेस्ट कर रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अमेरिकन कैंसर सोसाइटी के मुताबिक अकेले अमेरिका में इस साल करीब 67,000 नए पैनक्रिएटिक कैंसर मामले सामने आए हैं, जबकि 52,000 से ज्यादा लोगों की इससे मौत होने का खतरा होता है. इस बीमारी की पांच साल की जिंदा रहने की दर सिर्फ 13 प्रतिशत है, जो इसे सबसे जानलेवा कैंसर में से एक बनाती है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उम्मीद बढ़ा रहा है यह अप्रूवल&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;http://abplive.com/lifestyle/health/swine-flu-vaccine-what-is-correct-time-when-starts-work-all-important-questions-by-experts-doctors-explained-3180051&quot;&gt;Xप्लेन: स्वाइन फ्लू का टीका कब लगवाएं? डॉक्टर्स ने बता दिए 10 जरूरी जवाब&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/27/95451ee6994e5175dd9d17501c864e4817878072264711470_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[3 गुनी ज्यादा शुगर वाली फेंटा कितनी खतरनाक, जानें हेल्थ को कितने गुना नुकसान?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621#respond</comments><pubDate>Thu, 27 Aug 2026 10:19:16 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-dangerous-is-fanta-with-3-times-more-sugar-know-how-much-it-can-harm-your-health-3180621</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;Fanta Drink:&lt;/strong&gt; भारत में मिलने वाली Fanta और ब्रिटेन में बिकने वाली Fanta के पोषण लेबल को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा होती रहती है. दोनों देशों में एक ही ब्रांड का ड्रिंक होने के बावजूद इसकी रेसिपी और शुगर की मात्रा अलग हो सकती है. भारत की Fanta में प्रति 100 ml करीब 13.7 ग्राम शुगर है, जबकि UK की Fanta Orange में करीब 4.5 ग्राम शुगर है. यानी भारतीय वेरिएंट में शुगर करीब तीन गुना है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;भारत और यूके की Fanta में इतना बड़ा अंतर क्यों&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत और यूके में बिकने वाली Fanta को सिर्फ एक ही फॉर्मूले का ड्रिंक मानना सही नहीं होगा. अलग-अलग देशों में कंपनियां स्थानीय बाजार, उपभोक्ताओ की पसंद, स्वाद, टैक्स, नियम और उपलब्ध सामग्री के हिसाब से उत्पाद की रेसिपी तय करती हैं. भारत की Fanta में 100 ml पर 13.7 ग्राम शुगर दर्ज है, जबकि UK Fanta Orange में 4.5 ग्राम शुगर और स्वीटनर्स का इस्तेमाल किया गया है. इसका मतलब यह नहीं है कि UK की Fanta पूरी तरह हेल्दी है. वहां भी यह एक मीठा कार्बोनेटेड ड्रिंक है. फर्क मुख्य रूप से इसमें मौजूद शुगर की मात्रा का है. उदाहरण के लिए, 500 ml भारतीय Fanta में लेबल के हिसाब से करीब 68.5 ग्राम शुगर हो सकती है, जबकि उतनी ही मात्रा की UK Fanta Orange में करीब 22.5 ग्राम शुगर होगी. इसलिए मात्रा के साथ लेबल पढना जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/gk/onion-hoarding-price-hike-know-how-it-increases-onion-prices-3180417&quot;&gt;प्याज महंगा होने में जमाखोरी का कितना बड़ा हाथ, इससे कैसे बढ़ती है कीमत? &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;बाजार की जरूरत और लोगों की पसंद से जुड़ा है फॉर्मूला&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी भी पैकेज्ड ड्रिंक का फॉर्मूला केवल स्वाद के आधार पर तय नही होता. कंपनियों को अलग-अलग बाजारों में उपभोक्ताओं की पसंद, कीमत, रेगुलेशन और प्रतिस्पर्धा को ध्यान में रखना पड़ता है. भारत में मीठे और तेज स्वाद वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स का बड़ा बाजार है, इसलिए स्वाद और उपभोक्ता मांग भी प्रोडक्ट की संरचना को प्रभावित कर सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि अब बाजार में कम और जीरो-शुगर विकल्पों की मांग भी बढ़ रही है. UK में Fanta Orange Zero जैसे विकल्प उपलब्ध हैं, जिनमें सामान्य Fanta की तुलना में शुगर काफी कम है. भारत में भी उपभोक्ताओ के बीच हेल्थ और न्यूट्रिशन को लेकर जागरूकता बढ़ने के साथ कम शुगर वाले विकल्पों की मांग महत्वपूर्ण होती जा रही है. यही वजह है कि किसी एक देश के प्रोडक्ट को दूसरे देश के प्रोडक्ट से तुलना करते समय सिर्फ कीमत या स्वाद नहीं, बल्कि न्यूट्रिशन लेबल और सर्विंग साइज को भी देखना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ज्यादा शुगर शरीर के लिए कितनी नुकसानदायक?&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ज्यादा शुगर वाली ड्रिंक का नियमित और अधिक सेवन शरीर में अतिरिक्त कैलोरी पहुंचा सकता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक फ्री शुगर का सेवन कुल दैनिक ऊर्जा का 10% से कम रखना चाहिए और इसे 5% से नीचे लाने पर अतिरिक्त स्वास्थ्य लाभ मिल सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;WHO के अनुसार ज्यादा फ्री शुगर का सेवन वजन बढ़ने, मोटापे और दांतों में कैविटी के बढ़ते जोखिम से जुड़ा है. ज्यादा मीठे पेय पदार्थों का लगातार सेवन इसलिए चिंता का विषय बन सकता है, खासकर तब जब व्यक्ति दिनभर में चाय, मिठाई, बिस्किट और दूसरे मीठे खाद्य पदार्थों से भी शुगर ले रहा हो.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यह कहना सही नहीं होगा कि भारतीय Fanta पीने से किसी व्यक्ति को &amp;ldquo;तीन गुना ज्यादा बीमारी&amp;rdquo; होगी. तीन गुना का अंतर यहां शुगर की मात्रा में है, बीमारी के जोखिम में नहीं. असली खतरा इस बात पर निर्भर करता है कि कितनी मात्रा में और कितनी बार ऐसी ड्रिंक पी जाती है. कभी-कभार सीमित मात्रा लेने की तुलना में रोजाना ज्यादा मात्रा में सेवन ज्यादा चिंता की बात है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें:&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/gk/sugar-history-in-india-why-it-was-called-white-poison-and-sometimes-sugar-called-sweetener-3180116&quot;&gt;कभी सफेद जहर कहा तो कभी मिठास, भारत में कैसा रहा चीनी का इतिहास? &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/26/942e1638843f42ebacce64a0bf2f411c17877606456891472_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[क्या सफेद चीनी से होती है डायबिटीज, क्या कहती है मेडिकल रिसर्च?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448#respond</comments><pubDate>Wed, 26 Aug 2026 19:17:43 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ भूमिका पंवार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/white-sugar-and-diabetes-know-the-truth-from-medical-research-3180448</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आजकल बहुत से लोग मानते हैं कि सफेद चीनी खाने से डायबिटीज हो जाती है. इसी वजह से कई लोग चाय, मिठाई और दूसरी मीठी चीजों से दूरी बनाने लगते हैं. लेकिन क्या सिर्फ चीनी खाने से किसी व्यक्ति को डायबिटीज हो सकती है? मेडिकल रिसर्च के मुताबिक इसका जवाब इतना सीधा नहीं है. सिर्फ सफेद चीनी खाने से सीधे डायबिटीज नहीं होती, लेकिन लंबे समय तक बहुत ज्यादा मीठा खाना, खासकर मीठे ड्रिंक पीना, डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है. इसके साथ वजन बढ़ना, कम एक्सरसाइज करना और परिवार में डायबिटीज होना भी बीमारी के खतरे को बढ़ा सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या चीनी खाने से सीधे डायबिटीज होती है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सिर्फ सफेद चीनी खाने से किसी व्यक्ति को सीधे डायबिटीज हो जाए, ऐसा नहीं है. डायबिटीज तब होती है, जब शरीर ब्लड शुगर को ठीक से कंट्रोल नहीं कर पाता है. इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं जैसे- ज्यादा वजन, कम शारीरिक मेहनत, गलत खान-पान और परिवार में किसी को डायबिटीज होना इसके खतरे को बढ़ा सकता है. इसलिए सिर्फ चीनी को ही डायबिटीज का कारण मानना सही नहीं होगा.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिर ज्यादा चीनी से खतरा क्यों बढ़ सकता है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर कोई व्यक्ति रोज बहुत ज्यादा मीठा खाता है तो शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी जा सकती है. लंबे समय तक ऐसा होने पर वजन बढ़ सकता है. ज्यादा वजन होने से टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है. यानी चीनी का असर सिर्फ ब्लड शुगर बढ़ने तक सीमित नहीं है. ज्यादा मीठा खाने से वजन और पूरी डाइट खराब होने पर भी इसका असर पड़ सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़े :&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/india-diabetes-blood-sugar-obesity-bp-nfhs-report-3178501&quot;&gt;&lt;strong&gt;भारत में बढ़े डायबिटीज और मोटापे के मामले, बीपी में मामूली राहत&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मीठे ड्रिंक ज्यादा नुकसान कर सकते हैं&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड जूस, एनर्जी ड्रिंक और दूसरे मीठे पेय में काफी मात्रा में शक्कर हो सकती है. इन्हें पीने पर शरीर को कम समय में ज्यादा शक्कर मिल जाती है. कई बार लोग इन ड्रिंक को पानी की तरह पी लेते हैं और उन्हें पता भी नहीं चलता कि वे कितनी अतिरिक्त चीनी ले रहे हैं. इनमें कैलोरी भी ज्यादा हो सकती है, जिससे लंबे समय तक ज्यादा सेवन करने पर वजन बढ़ने का खतरा रहता है. बढ़ा हुआ वजन टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ा सकता है. रिसर्च में भी शुगर वाली ड्रिंक और टाइप-2 डायबिटीज के बीच संबंध पाया गया है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चीनी कम करने से क्या फायदा होगा?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डाइट में ज्यादा चीनी कम करने से शरीर को मिलने वाली अतिरिक्त कैलोरी कम हो सकती है. इससे वजन को कंट्रोल करने में मदद मिल सकती है. चीनी कम करने का मतलब सिर्फ चाय में कम चीनी डालना नहीं है, बल्कि मिठाई, चॉकलेट, मीठे बिस्किट, केक और शुगर वाली ड्रिंक जैसी चीजों का सेवन भी कम करना है. इससे रोजाना ली जाने वाली कुल शक्कर कम हो सकती है. अगर इसके साथ घर का संतुलित खाना और रोज थोड़ी शारीरिक एक्टिविटी रखी जाए तो शरीर को लंबे समय में फायदा मिल सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या चीनी पूरी तरह छोड़ना जरूरी है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर व्यक्ति के लिए चीनी को पूरी तरह बंद करना जरूरी नहीं है. ज्यादा जरूरी है कि रोजाना जरूरत से ज्यादा शक्कर न ली जाए. मिठाई, चॉकलेट, मीठे बिस्किट और शुगर वाली ड्रिंक को कम मात्रा में लेना बेहतर है. अगर किसी व्यक्ति को पहले से डायबिटीज है या ब्लड शुगर बढ़ा हुआ है तो उसे अपनी डाइट डॉक्टर की सलाह के अनुसार रखनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़े :&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/side-effects-drinking-tea-empty-stomach-morning-bed-tea-acidity-dehydration-health-disadvantages-3176793&quot;&gt;&lt;strong&gt;रोज सुबह चाय पीने के होते हैं भयंकर नुकसान, जान लें&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/26/e491ce259351e4f1e7653b2b72c78b4817877383903741471_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>