Taking Medicines Without Prescription: बुखार या हल्का दर्द होते ही मेडिकल स्टोर से दवा ले लेना भारत में आम बात हो गई है. बिना डॉक्टर की सलाह के लोग पेनकिलर, बुखार की दवा और खांसी की सिरप का इस्तेमाल कर रहे हैं. लेकिन हाल ही में सरकार द्वारा दर्द निवारक दवा निमेसुलाइड के हाईडोज पर रोक लगाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में है कि यह लापरवाही कितनी खतरनाक साबित हो सकती है.
दरअसल, इसको लेकर हेल्थ एक्सपर्ट बताते हैं कि एंटीबायोटिक और एसिड की दवाओं के अलावा भारत में सबसे ज्यादा गलत तरीके से इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं में पेन किलर, खांसी की सिरप और नींद की गोलियां शामिल हैं. इन दवाओं का जरूरत से ज्यादा या गलत तरीके से सेवन शरीर के कई अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है.
क्या होता है नुकसान?
दर्द, सूजन और बुखार में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को नॉनस्टेरॉइडल कहा जाता है. इनमें पैरासिटामोल, आइबुप्रोफेन, डाइक्लोफेनाक और नेप्रोक्सेन जैसी दवाएं शामिल हैं. पैरासिटामोल को आमतौर पर सुरक्षित माना जाता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा लीवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है. खासतौर पर शराब पीने वालों या पहले से लीवर की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह जानलेवा भी हो सकती है. डॉक्टर पीएन वेंकटेश ने संडे गार्जियन में अपने एक लेख में बताया कि पेनकिलर जैसे डाइक्लोफेनाक और केटोरोलैक लंबे समय तक लेने पर पेट में अल्सर, आंतरिक ब्लीडिंग, किडनी खराब होने, हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा बढ़ा देते हैं. इसके बावजूद ये दवाएं कई जगह बिना पर्ची के आसानी से मिल जाती हैं.
लंबे समय से खुलकर हो रहा यूज
एक्सपर्ट बताते हैं कि सरकार द्वारा जिस निमेसुलाइड बैन पर रोक लगाई गई है, उसे लीवर के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है. यह दवा कई देशों में पहले ही प्रतिबंधित है और भारत में 12 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित है. इसके बाद भी लंबे समय तक इसका खुलेआम इस्तेमाल होता रहा. एक्सपर्ट यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि हर बुखार को सामान्य फ्लू मानना भारी भूल हो सकती है. डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड, निमोनिया, टीबी, यूरिन इंफेक्शन और मेनिन्जाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों की शुरुआत भी बुखार से होती है. ऐसे में सिर्फ बुखार की दवा लेने से बीमारी दब जाती है और सही इलाज में देरी हो जाती है, जो जानलेवा साबित हो सकती है.
डॉक्टर से सलाह लेना क्यों जरूरी?
भारत में दवाओं को अलग-अलग शेड्यूल में रखा गया है. कई पेनकिलर शेड्यूल H के तहत आते हैं, यानी इन्हें केवल डॉक्टर की पर्ची पर बेचा जाना चाहिए. लेकिन ये दवाएं बिना पर्ची के भी मिल जाती हैं. इसके अलावा दवाओं के मिलते-जुलते ब्रांड नाम भी एक बड़ा खतरा हैं, जिससे गलत दवा मिलने का जोखिम बना रहता है. स्वास्थ्य जानकारों का कहना है कि खुद से दवा लेने की आदत से पेट में अल्सर, अंदरूनी ब्लीडिंग, लीवर फेलियर, किडनी डैमेज और हार्ट अटैक तक का खतरा बढ़ जाता है। डॉक्टरों सलाह देते हैं कि बुखार या दर्द होने पर खुद से दवा लेने के बजाय डॉक्टर से परामर्श लिया जाए.
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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.