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बड़ा आलीशान बंगला या फिर छोटा सा घर, कहां रहने वाले ज्यादा खुश? क्या कहते हैं एक्सपर्ट

कविता गाडरी   |  02 Feb 2026 04:59 PM (IST)

रिसर्च के अनुसार, ज्यादा स्पेस और सुनसान इलाकों में बने घर लंबे समय तक खुशी नहीं दे पाते. साइंस डायरेक्ट की रिपोर्ट बताती है कि जैसे-जैसे घरों का साइज बढ़ा है, वैसे-वैसे लोगों की खुशी स्थायी नहीं रहती.

बड़ा आलीशान बंगला या फिर छोटा सा घर, कहां रहने वाले ज्यादा खुश? क्या कहते हैं एक्सपर्ट

बड़ा आलीशान बंगला या फिर छोटा सा घर

आज की तेज रफ्तार जिंदगी में सक्सेस को अक्सर बड़े घर, लग्जरी कार और हाई-फाई लाइफस्टाइल से जोड़कर देखा जाता है. लोग दिन-रात मेहनत करते हैं, ताकि किसी पॉश इलाके में आलीशान बंगला या बड़ा अपार्टमेंट खरीद सकें. लेकिन सवाल यह है कि क्या बड़ा घर वाकई ज्यादा खुशी देता है या फिर इन्हीं बड़े घरों के अंदर अकेलापन और उदासी पनप रही है. साइकोलॉजी के जुड़े एक्सपर्ट्स का कहना है कि गेटेड सोसायटियों और बड़े बंगलों के पीछे छिपा सन्नाटा आजकल एक बड़ी मानसिक समस्या बनता जा रहा है. कई लोग बाहरी तौर पर सफल दिखते हैं, लेकिन अंदर से खालीपन और डिप्रेशन से जूझ रहे हैं. क्या कहती है रिसर्च रिसर्च के अनुसार, ज्यादा स्पेस और सुनसान इलाकों में बने घर लंबे समय तक खुशी नहीं दे पाते हैं. साइंस डायरेक्ट की रिपोर्ट बताती है कि जैसे-जैसे घरों का साइज बढ़ा है, वैसे-वैसे लोगों की खुशी स्थायी नहीं रही. अमेरिका में आज प्रति व्यक्ति घर की जगह पहले के मुकाबले काफी ज्यादा है, लेकिन जीवन संतुष्टि में कोई बड़ा सुधार नहीं दिखा. वहीं रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि बड़ा घर खरीदने के बाद लोगों को यह एहसास होता है कि उन्होंने इसके लिए रिश्तों, समय और मानसिक शांति जैसी चीजों से समझौता किया है. हर एक्स्ट्रा कमरा और फ्लोर कई बाद तनाव बढ़ाने का कारण बन जाता है.

बड़ा घर और बढ़ता अकेलापन साइकोलॉजिस्ट के अनुसार, उनके पास ऐसे कई मरीज आते हैं जिनके पास बड़ा घर, अच्छी नौकरी और लग्जरी गाड़िया है. लेकिन वे खुद को बहुत अकेला महसूस करते हैं. उनके अनुसार बड़ा घर और आरामदायक जीवन बाहरी दुनिया से दूरी बढ़ा देता है. छोटे घरों में पड़ोसियों से बातचीत, आसपास की आवाजें और सामाजिक जुड़ाव बना रहता है, जबकि बड़े बंगलों में सन्नाटा इंसान के अंदर खालीपन पैदा कर देता है. साइकोलॉजिस्ट के अनुसार जब इंसान की बुनियादी जरूरतें पूरी हो जाती है तो मानसिक तनाव का रूप बदल जाता है. इसे साइकोलॉजी में सर्वाइवल स्ट्रेस से एक्जिस्टेंशियल स्ट्रेस की ओर बढ़ना कहा जाता है. पैसा और सुरक्षा मिलने के बाद इंसान रिश्तों और जुड़ाव की कमी महसूस करने लगता है, जिससे अकेलापन गहराता है. लोन, ईएमआई और गेटेड सोसायटी का दबाव बड़े घरों के लिए लिया गया लंबा होम लोन भी मानसिक तनाव की एक बड़ी वजह है. 20 से 30 साल की ईएमआई इंसान का लगातार प्रेशर में रखती है. इस  दबाव में लोग ऐसी नौकरियां करने लगते हैं, जिन्हें वे पसंद नहीं करते है. वहीं इसका नतीजा यह होता है कि जिस घर के लिए उन्होंने मेहनत की उसी में सुकून नहीं मिल पाता है. गेटेड सोसायटियों और शहर से दूर बने घरों के कारण पड़ोसियों से रोजाना मिलने-जुलने की आदत भी खत्म होती जा रही है. छोटी कॉलोनियों में जहां लोग साथ बैठते हैं, बातें करते हैं और त्योहार मनाते हैं वहीं  बड़े बंगलों में यह सामाजिक जुड़ाव कमजोर पड़ जाता है. छोटा घर, सुकून ज्यादा? एक्सपर्ट के अनुसार इंसान की खुशी सामाजिक रिश्तों से जुड़ी होती है. ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे हैप्पी हार्मोन आपसी मेल-जोल से ही निकलते हैं. बड़े घरों में अकेले रहने से इन हार्मोन की कमी हो सकती है, जो डिप्रेशन की वजह बनती है. वहीं बड़े घरों में इमोशनल दूरी बढ़ जाती है. हर सदस्य अपने कमरे तक सीमित हो जाता है, जिससे रिश्तों में ठंडापन आ सकता है. उनके अनुसार चार लोगों के परिवार के लिए एक-एक कमरा, एक कॉमन हॉल और किचन पर्याप्त होता है. जरूरत से ज्यादा बड़ा घर कई बार तनाव और पैसों की बर्बादी बन जाता है. इसके अलावा  एक्सपर्ट्स का मानना है कि छोटे घर लोगों को सादा और व्यवस्थित जीवन की ओर ले जाते हैं. कम जगह होने से गैर-जरूरी सामान नहीं जमा होता, जिससे मानसिक बोझ कम रहता है. वहीं बड़े घरों की सफाई और रखरखाव का दबाव खासकर महिलाओं और बुजुर्गों में एंग्जायटी बढ़ा सकता है.

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Published at: 02 Feb 2026 04:59 PM (IST)
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