Health News: आज प्लास्टिक हर जगह मौजूद है. वह बोतल जिसमें आप पानी पीते हैं, वह पैकेट जिसमें आपके बच्चे चिप्स खाते हैं, यहां तक कि दूध की थैली, दवाइयों की पैकिंग और हमारे दैनिक जीवन में काम आने वाली अधिकांश सभी वस्तुओं में. यह प्लास्टिक अब सिर्फ बाहरी जीवन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक के रूप में हमारे शरीर में प्रवेश कर चुका है.
माइक्रोप्लास्टिक वे अत्यंत छोटे प्लास्टिक कण होते हैं जो 5 मिलीमीटर से भी छोटे होते हैं-कई बार तो 10 माइक्रोन से भी कम. एक मिलीमीटर में 1000 माइक्रोन होते हैं और अगर हम इसे आम भाषा में समझें तो ये कण सरसों के दाने से भी छोटे होते हैं. आज माइक्रोप्लास्टिक पृथ्वी के हर कोने में पाया जा रहा है—एवरेस्ट की ऊंचाइयों से लेकर समुद्र की गहराइयों तक.
अब तो यह हमारे शरीर के अंदर भी पहुंच चुका है. वैज्ञानिक शोध में यह सामने आया है कि माइक्रोप्लास्टिक हमारे रक्त, प्लाज्मा, और यहां तक कि गर्भवती महिलाओं के एम्नियोटिक फ्लूइड (गर्भाशय द्रव) में भी पाया गया है. एक अध्ययन के मुताबिक, आज का औसत व्यक्ति हर सप्ताह एक क्रेडिट कार्ड जितना माइक्रोप्लास्टिक अपने शरीर में ले रहा है—या तो सांस के जरिए, भोजन से या जल के माध्यम से.
फेफड़ों पर मार: माइक्रोप्लास्टिक से फाइब्रोसिस तक
माइक्रोप्लास्टिक शरीर में पहुंचकर विभिन्न प्रकार की बीमारियों को जन्म देता है, विशेष रूप से फेफड़ों को प्रभावित करता है. यह कण श्वसन प्रणाली में जाकर फेफड़ों की कार्यक्षमता को प्रभावित करते हैं. इससे फाइब्रोसिस जैसी स्थितियां उत्पन्न होती हैं, जिसमें फेफड़ों की कोशिकाएं कठोर हो जाती हैं और फेफड़े ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर पाते.
श्वसन प्रणाली की संरचना और कार्य
श्वसन प्रणाली के प्रमुख अंग हैं: नाक, मुंह, गला, स्वरयंत्र (वॉइस बॉक्स), श्वास नली और फेफड़े. हम जब सांस लेते हैं, तो हवा नाक और मुंह से होते हुए गले से फेफड़ों में जाती है और सबसे नीचे स्थित एल्वियोलाई तक पहुंचती है. यहीं पर ऑक्सीजन का आदान-प्रदान होता है. आप यह जानकर चकित होंगे कि हमारी श्वसन प्रणाली लगभग 2400 किमी लंबी होती है, जिससे ऑक्सीजन शरीर के हर हिस्से तक पहुंचती है.
पतंजलि अनुसंधान संस्थान का अभिनव प्रयास: ब्रोन्कोम
जब 2022 में प्रकाशित एक प्रतिष्ठित शोधपत्र में यह बात सामने आई कि माइक्रोप्लास्टिक फेफड़ों तक पहुंच चुका है, तब पतंजलि अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने इस विषय पर कार्य करना आरंभ किया. 2023 में इस शोध की शुरुआत की गई और एक साल से अधिक गहन अध्ययन के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि माइक्रोप्लास्टिक के प्रभाव को आयुर्वेद की सहायता से कम किया जा सकता है. ब्रोन्कोम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि है जिसे विशेष रूप से फेफड़ों की सफाई और सशक्तिकरण के लिए विकसित किया गया है.
शोध प्रक्रिया और वैज्ञानिक प्रमाण
इस शोध में लगभग 88 चूहों को माइक्रोप्लास्टिक कणों के संपर्क में लाया गया. इसके बाद इन्हें ब्रोन्कोम औषधि दी गई. उनके श्वसन तंत्र पर इसका क्या असर पड़ा, यह जानने के लिए Flexivent System नामक एक मशीन का प्रयोग किया गया, जो श्वसन तंत्र की कार्यक्षमता मापने में सक्षम है.
शोध के दौरान यह पाया गया कि ब्रोन्कोम ने चूहों के फेफड़ों की कार्यक्षमता को डोज़ डिपेंडेंट तरीके से पुनः स्थापित किया. इसका मतलब है कि जितनी अधिक मात्रा में ब्रोन्कोम दिया गया, उतना ही अधिक सुधार देखा गया.
क्या कहती है सूक्ष्म-कोशिकीय जांच?
श्वसन तंत्र की सूजन को समझने के लिए BALF (Bronchoalveolar Lavage Fluid) नामक तकनीक द्वारा चूहों के फेफड़ों से तरल पदार्थ एकत्र कर उसकी जांच की गई. इसमें पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक के कारण ल्यूकोसाइट्स, न्यूट्रोफिल्स और लिम्फोसाइट्स जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं का स्तर बढ़ गया था. लेकिन ब्रोन्कोम के प्रयोग से इन सभी कोशिकाओं का स्तर डोज़ डिपेंडेंट तरीके से कम हुआ. इतना ही नहीं, सूजन से जुड़े जीन जैसे IL-6, IL-8 और TNF-alpha का स्तर भी ब्रोन्कोम के सेवन से घटा.
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हिस्टोपैथोलॉजी में भी स्पष्ट अंतर
फेफड़ों की ऊतकों की जांच (हिस्टोपैथोलॉजी) में भी यह सिद्ध हुआ कि माइक्रोप्लास्टिक से क्षतिग्रस्त वायु मार्ग ब्रोन्कोम के प्रयोग से पहले जैसे हो गए. फेफड़ों की इलास्टिसिटी, हवा छोड़ते समय लगने वाला दबाव और हवा के बहाव की गति जैसे पैरामीटर्स में भी सुधार देखा गया. THP-1 सेल्स (मानव आधारित सेल लाइन) पर किए गए प्रयोगों में भी ब्रोन्कोम ने सकारात्मक परिणाम दिए और डोज़ डिपेंडेंट प्रभाव दिखाया.
निष्कर्ष: आयुर्वेद के माध्यम से आधुनिक संकट का समाधान
आज जब माइक्रोप्लास्टिक से हम चारों ओर से घिरे हुए हैं और जब यह हमारे शरीर के अंदर पहुंचकर बीमारियों को जन्म दे रहा है, ऐसे समय में ब्रोन्कोम जैसी आयुर्वेदिक औषधि एक आशा की किरण बनकर सामने आई है.
यह शोध न केवल आयुर्वेद की वैज्ञानिकता को पुष्ट करता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि अगर समर्पण और अनुसंधान के साथ प्रयास किया जाए, तो प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां आधुनिक समस्याओं का समाधान बन सकती हैं.
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