India Accounts For Maternal Deaths Globally: दुनियाभर में हर साल लाखों महिलाएं गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी वजहों से जान गंवा रही हैं, और इन आंकड़ों में भारत की हिस्सेदारी अब भी बड़ी बनी हुई है. हाल ही में द लैंसेट ऑब्स्टेट्रिक्स, गायनेकोलॉजी, और महिला स्वास्थ्य में प्रकाशित एक स्टडी  ने इस चिंता को फिर सामने ला दिया है. चलिए आपको बताते हैं कि इस रिपोर्ट में क्या निकला है और भारत के लिए चिंता क्यों जाहिर की गई है. 

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क्या निकला रिपोर्ट में?

रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2023 में दुनिया भर में करीब 2.4 लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी दिक्कतों के कारण हुई. इनमें से लगभग 24,700 मौतें भारत में दर्ज की गईं. यानी वैश्विक स्तर पर हर 10 मातृ मौतों में से लगभग एक भारत से जुड़ी है, जो स्थिति की गंभीरता को दिखाती है. हालांकि, तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है. बीते तीन दशकों में भारत ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की है. 1990 में जहां मातृ मृत्यु का आंकड़ा करीब 1.19 लाख था, वह 2015 तक घटकर 36,900 और 2023 में 24,700 तक पहुंच गया. इसी तरह, मातृ मृत्यु दर  1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति एक लाख जीवित जन्म हो गई है.

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह सुधार अभी अधूरा है. डॉ. आभा मजूमदार ने TOI को बताया कि देश में मातृ मृत्यु दर में गिरावट जरूर आई है, लेकिन यह सभी राज्यों में समान नहीं है. केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य वर्ल्ड मानकों के करीब पहुंच चुके हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अब भी हालात चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं. स्टडी में यह भी सामने आया कि मातृ मृत्यु के प्रमुख कारण अब भी वही हैं, जिन्हें काफी हद तक रोका जा सकता है. इनमें प्रसव के दौरान अत्यधिक ब्लड फ्लो, हाई ब्लड प्रेशर से जुड़ी दिक्कतों, और इंफेक्शन पहले से मौजूद बीमारियों के कारण होने वाली दिक्कतें शामिल हैं.

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कोविड का भी रोल

इसके अलावा, समय पर इलाज न मिल पाना, स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर और ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों के बीच असमानता भी बड़ी वजह बन रही है. यही कारण है कि सुधार की रफ्तार 2015 के बाद धीमी पड़ गई है, जबकि इससे पहले 2000 से 2015 के बीच तेज गिरावट दर्ज की गई थी. वर्ल्ड लेवल पर भी स्थिति पूरी तरह संतोषजनक नहीं है. 2023 में दुनिया का औसत मातृ मृत्यु दर 190 प्रति एक लाख जीवित जन्म रहा, जो संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स के 70 के लक्ष्य से काफी ज्यादा है. एक्सपर्ट का कहना है कि कोविड-19 महामारी ने भी इस समस्या को बढ़ाया, क्योंकि उस दौरान मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं.

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Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.