India at 2047 Conclave: विकसित भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती, आयात पर निर्भरता करनी होगी कम
ABP India at 2047 Conclave: India@2047 Conclave में डॉ. अरुणाभा घोष ने कहा कि विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अगले दो दशकों में देश की ऊर्जा और बिजली की मांग कई गुना बढ़ेगी.

- आर्थिक विकास पर्याप्त ऊर्जा उपलब्धता पर निर्भर करता है.
- 2047 तक ऊर्जा मांग कई गुना बढ़ेगी, आयात चुनौती.
- ऊर्जा सुरक्षा हेतु इलेक्ट्रिफिकेशन और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर.
एबीपी नेटवर्क के विशेष कार्यक्रम 'India @ 2047 Conclave' में देश की अर्थव्यवस्था, उद्योग, सिनेमा और प्रशासन से जुड़ी कई प्रमुख हस्तियों ने हिस्सा लिया. कार्यक्रम की थीम 'बिल्डिंग भारत @ 2047' रही, जिसके तहत भारत को आजादी के 100 वर्ष पूरे होने तक एक विकसित राष्ट्र बनाने के रोडमैप और उससे जुड़ी चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई.
कॉन्क्लेव के दौरान 'द ग्लोबल एनर्जी क्राइसिस: नेगोशिएटिंग द चेंज' पर बोलते हुए जलवायु विशेषज्ञ और काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. अरुणाभा घोष ने कहा कि किसी भी देश का आर्थिक विकास पर्याप्त ऊर्जा उपलब्धता के बिना संभव नहीं है. उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जहां ऊर्जा की मजबूत व्यवस्था के बिना कोई देश विकसित अर्थव्यवस्था बना हो.
कितनी बढ़ सकती है जरूरत
डॉ. घोष ने कहा कि भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल करना चाहता है, तो आने वाले वर्षों में ऊर्जा की मांग में बड़ी वृद्धि देखने को मिलेगी. उनके अनुसार देश की कुल ऊर्जा जरूरतें कम से कम दो से तीन गुना तक बढ़ सकती हैं, जबकि बिजली की मांग अगले दो दशकों में तीन से चार गुना तक बढ़ने की संभावना है.
उन्होंने कहा कि बढ़ती मांग को देखते हुए भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करना होगा. इसके लिए देश को अपने ऊर्जा भंडार (रिजर्व) बढ़ाने की जरूरत है. वर्तमान में भारत के पास लगभग 60 दिनों की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने लायक रणनीतिक भंडार मौजूद है, लेकिन भविष्य की आवश्यकताओं को देखते हुए इसे और मजबूत करना होगा.
ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता है चुनौती
डॉ. घोष ने हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयुक्त अरब अमीरात (UAE) यात्रा का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे समझौते देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता है. वर्तमान में देश अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) और लगभग 47 प्रतिशत प्राकृतिक गैस विदेशों से आयात करता है. इनमें से बड़ी मात्रा पश्चिम एशिया से और खासतौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत पहुंचती है. ऐसे में किसी भी भू-राजनीतिक तनाव या आपूर्ति बाधा का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
ये भी पढ़ें- CBSE री-वैल्यूएशन 2026 के लिए 40 हजार छात्रों ने किया आवेदन, बोर्ड ने जारी किया बड़ा अपडेट
इस चुनौती से निपटने के लिए डॉ. घोष ने देश की अर्थव्यवस्था के तेजी से इलेक्ट्रिफिकेशन पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि यदि भारत का परिवहन क्षेत्र बड़े पैमाने पर इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ता है, तो देश अपने भीतर उत्पादित ऊर्जा का बेहतर उपयोग कर सकेगा. सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा जैसे स्रोतों के माध्यम से बिजली उत्पादन बढ़ाकर आयातित ईंधन पर निर्भरता कम की जा सकती है.
उन्होंने कहा कि केवल परिवहन ही नहीं, बल्कि घरेलू ऊर्जा उपयोग के क्षेत्र में भी बदलाव की जरूरत है. विशेष रूप से खाना पकाने के ईंधन के क्षेत्र में स्वच्छ और टिकाऊ विकल्पों को बढ़ावा देना होगा. डॉ. घोष ने बताया कि करीब एक दशक पहले देश के केवल 50 प्रतिशत लोगों के पास एलपीजी कनेक्शन था, जबकि आज यह आंकड़ा 80 प्रतिशत से अधिक हो चुका है. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि एलपीजी की बढ़ती पहुंच एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन भारत इसकी बड़ी मात्रा भी विदेशों से आयात करता है.
यह भी पढ़ें - India at 2047 Conclave: विकसित भारत के लिए ऊर्जा सबसे अहम, 2047 तक इतने गीगावाट क्षमता का लक्ष्य जरूरी- शिशिर प्रियदर्शी


























