<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/" xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title>मेडिकल स्टोर से नकली दवा तो नहीं खरीद रहे? ऐसे करें पहचान</title><atom:link href="https://www.abplive.com/health/feed" rel="self" type="application/rss+xml"/><link>https://www.abplive.com/</link><description/><lastBuildDate>Mon, 24 Aug 2026 15:24:21 +0530</lastBuildDate><language>en-US</language><sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod><sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency><generator>https://www.abplive.com</generator><item><title><![CDATA[Swine Flu Cases: दिल्ली-कर्नाटक में स्वाइन फ्लू का कहर! जानें क्या करें और क्या नहीं?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-cases-delhi-karnataka-health-advisory-swine-flu-precautions-3179350</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-cases-delhi-karnataka-health-advisory-swine-flu-precautions-3179350#respond</comments><pubDate>Mon, 24 Aug 2026 14:00:04 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-cases-delhi-karnataka-health-advisory-swine-flu-precautions-3179350</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Swine Flu H1N1 Cases Surge In Delhi And Karnataka:&lt;/strong&gt; देशभर के कई राज्यों में स्वाइन फ्लू के मामले निकल कर सामने आ रहे हैं. राजधानी दिल्ली में H1N1 इन्फ्लुएंजा के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखने को मिल रही है. नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़ों के मुताबिक, 20 अगस्त 2026 तक दिल्ली में H1N1 के 1,777 मामले सामने आ चुके हैं. पिछले साल इसी समय में यह संख्या 229 थी. रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में इस साल 2 हजार केस का आंकड़ा पार हो चुका है. मामलों में बढ़ोतरी को देखते हुए राजधानी के अस्पतालों ने इन्फ्लुएंजा और उससे जुड़ी संभावित दिक्कतों वाले मरीजों के लिए अपनी तैयारियां मजबूत कर दी हैं. वहीं, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में भी हाल के दिनों में मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिली है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने साफ किया है कि H1N1 के मामलों में यह बढ़ोतरी किसी नए स्ट्रेन की वजह से नहीं है. ऐसे में लोगों को घबराने के बजाय जरूरी सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है. इसी बीच देशभर में स्वाइन फ्लू के बढ़ते मामलों को देखते हुए कर्नाटक सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने भी हेल्थ एडवाइजरी जारी की है. एडवाइजरी में मौसमी इन्फ्लुएंजा के प्रसार को कम करने के लिए लोगों से कुछ जरूरी सावधानियां बरतने की अपील की गई है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कर्नाटक स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को सलाह दी है कि छींकते और खांसते समय नाक और मुंह को अच्छी तरह ढकें. इसके अलावा साबुन और पानी से नियमित रूप से हाथ धोते रहें. शरीर में पानी की कमी न हो, इसके लिए भरपूर मात्रा में तरल पदार्थ पीने की सलाह दी गई है. जिन लोगों में स्वाइन फ्लू के लक्षण दिखाई दे रहे हैं, उन्हें अलग यानी आइसोलेट रखने की सलाह दी गई है, ताकि इंफेक्शन के फैलाव को कम किया जा सके.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/331d5594d2ba2b29a6933635947a90bc17875573549711257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या न करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एडवाइजरी में लोगों से अपनी आंखों, नाक और मुंह को बार-बार छूने से बचने को कहा गया है. बिना डॉक्टर की सलाह के कोई दवा न लेने की सलाह भी दी गई है. अगर किसी व्यक्ति में फ्लू के लक्षण हैं, तो उसे हाथ मिलाने से बचना चाहिए. ऐसे लोगों को भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाने से भी बचने की सलाह दी गई है. इसके अलावा इस्तेमाल किए गए रुमाल या नेपकिन का दोबारा इस्तेमाल न करने को कहा गया है. कर्नाटक सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे घबराएं नहीं और इन्फ्लुएंजा से बचाव के लिए बताए गए एहतियाती उपायों का सख्ती से पालन करें.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;कर्नाटक में कितने मामले आए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राज्य में मौजूदा इन्फ्लुएंजा की स्थिति के बारे में स्वास्थ्य विभाग ने बताया कि इंटीग्रेटेड हेल्थ इंफॉर्मेशन प्लेटफॉर्म (IHIP) के जरिए रिपोर्ट किए गए निगरानी आंकड़ों के अनुसार, 22 अगस्त 2026 तक कर्नाटक के 32 जिलों में लैब से पुष्टि किए गए 4,212 इन्फ्लुएंजा-पॉजिटिव मामले दर्ज किए गए हैं. आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में कर्नाटक में ऐसे मामलों की संख्या 4,583 थी, जबकि 2024 में 3,903 मामले दर्ज किए गए थे. स्वास्थ्य विभाग मौजूदा स्थिति पर निगरानी बनाए हुए है. वहीं, अगर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता की बात करें, तो 22 जुलाई तक 20 मामले दर्ज किए गए थे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/e07b9d8146ff195454b0422b45c63e4a17875573783771257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;अस्पतालों को जरूरी सामान तैयार रखने की सलाह&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;स्वाइन फ्लू से प्रभावी तरीके से निपटने के लिए कर्नाटक सरकार ने राज्यभर की स्वास्थ्य सुविधाओं को जरूरी सामान की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने की सलाह दी है. इनमें PPE, N95 मास्क और ओसेल्टामिविर &amp;nbsp;जैसी आवश्यक चीजें शामिल हैं. स्वास्थ्य विभाग ने स्वास्थ्यकर्मियों को ILI यानी इन्फ्लुएंजा जैसी बीमारी और SARI यानी गंभीर सांस संबंधी इंफेक्शन की शुरुआती पहचान, जोखिम का आकलन और मरीजों के प्रबंधन के बारे में जागरूक किया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/smoking-side-effects-how-soon-does-smoking-affect-the-body-3173486&quot;&gt;Smoking Side Effects: क्या पहली ही सिगरेट से खराब होने लगते हैं फेफड़े? जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;निजी अस्पतालों को भी दिए गए निर्देश&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;राज्य के निजी स्वास्थ्य संस्थानों को H1N1 के मामलों की जांच, टेस्टिंग और इलाज को लेकर राज्य सरकार की ओर से जारी मानक प्रोटोकॉल का पालन करने की सलाह दी गई है. इसके साथ ही IHIP प्लेटफॉर्म के जरिए निगरानी अधिकारियों को सभी मामलों की अनिवार्य रूप से रिपोर्ट करने को कहा गया है. फिलहाल दिल्ली समेत कुछ शहरों में H1N1 और &lt;a title=&quot;मौसम&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/weather&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;मौसम&lt;/a&gt;ी इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है. हालांकि, ICMR के मुताबिक, यह बढ़ोतरी किसी नए H1N1 स्ट्रेन की वजह से नहीं है. ऐसे में स्वास्थ्य विभाग लोगों से घबराने के बजाय साफ-सफाई, इंफेक्शन से बचाव और जरूरी सावधानियों का पालन करने की अपील कर रहे हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ें- &lt;a title=&quot;H1N1 Cases In Delhi: H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं...ICMR बोला- घबराने की जरूरत नहीं&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-new-strain-icmr-says-no-need-to-panic-delhi-cases-3179256&quot; target=&quot;_self&quot;&gt;H1N1 Cases In Delhi: H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं...ICMR बोला- घबराने की जरूरत नहीं&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/926e294b101e92f1848d8796f9a0a36417875575821251257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[H1N1 Cases In Delhi: H1N1 का कोई नया स्ट्रेन नहीं...ICMR बोला- घबराने की जरूरत नहीं]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-new-strain-icmr-says-no-need-to-panic-delhi-cases-3179256</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-new-strain-icmr-says-no-need-to-panic-delhi-cases-3179256#respond</comments><pubDate>Mon, 24 Aug 2026 11:39:16 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-new-strain-icmr-says-no-need-to-panic-delhi-cases-3179256</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;ICMR Statement On H1N1 Swine Flu Strain:&lt;/strong&gt; दिल्ली में मौसमी फ्लू के मामलों में बढ़ोतरी के बीच H1N1 को लेकर लोगों की चिंता बढ़ रही है. इसी बीच इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के सीनियर साइंटिस्ट ने साफ किया है कि देश में H1N1 वायरस का कोई नया स्ट्रेन सामने नहीं आया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है. भारत में जो वायरस फैल रहे हैं, वे मौसमी स्ट्रेन हैं और 2025 से ही सर्कुलेशन में हैं. ये उत्तरी गोलार्ध के लिए सुझाई गई वैक्सीन में शामिल स्ट्रेन से भी अच्छी तरह मेल खाते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ICMR के वैज्ञानिकों के अनुसार, भारत में इस समय फैल रहे Influenza A (H1N1)pdm09 वायरस A/Missouri/11/2025 (H1N1)pdm09-like वायरस स्ट्रेन से संबंधित हैं. ये वायरस clade 6B.1A.5a2a और subclade D.3.1.1 के अंतर्गत आते हैं. वैज्ञानिकों ने बताया कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और नियमित सर्विलांस के जरिए वायरस के प्रसार की निगरानी की जा रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दिल्ली में H1N1 के मामले बढ़े&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ICMR की यह जानकारी ऐसे समय में सामने आई है जब दिल्ली में मौसमी इन्फ्लुएंजा के मामलों में बढ़ोतरी देखी जा रही है. 20 अगस्त तक दिल्ली में H1N1 के 1,777 मामले सामने आए थे. वहीं, Influenza A के कुल 2,392 मामले दर्ज किए गए थे. इस तरह इस साल रिपोर्ट किए गए Influenza A के मामलों में H1N1 प्रमुख सब-टाइप बना हुआ है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मेडांटा अस्पताल में इंटरनल मेडिसिन और रेस्पिरेटरी एंड स्लीप मेडिसिन के चेयरमैन डॉ. रणदीप गुलेरिया ने भी मामलों में बढ़ोतरी की बात कही. उन्होंने बताया कि हर साल मानसून के दौरान H1N1 के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिलती है, लेकिन इस बार मामलों की संख्या तुलनात्मक रूप से ज्यादा दिखाई दे रही है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या हैं H1N1 के सामान्य लक्षण?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. गुलेरिया के मुताबिक, ज्यादातर मरीजों में बुखार, खांसी, गले में खराश और शरीर में दर्द जैसे लक्षण देखने को मिल रहे हैं. कई मरीजों में सूखी खांसी भी हो रही है. ये लक्षण मौसमी इन्फ्लुएंजा के दौरान आम तौर पर देखे जा सकते हैं. हालांकि, हर मरीज में बीमारी का असर एक जैसा नहीं होता. खासकर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और पहले से किसी दूसरी बीमारी से जूझ रहे लोगों में इंफेक्शन गंभीर रूप ले सकता है. ऐसे लोगों में सीने में जकड़न, सांस लेने में परेशानी और वायरल निमोनिया जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/41eac284cf2719d40d295ed688ef186b17875482646511257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;AIIMS के मेडिसिन विभाग के प्रोफेसर डॉ. नीरज निश्चल ने बताया कि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिनके दिखाई देने पर मरीज को तुरंत मेडिकल मदद लेनी चाहिए. सांस लेने में परेशानी, सीने में दर्द, ऑक्सीजन का स्तर कम होना, लगातार या बढ़ता हुआ बुखार, भ्रम की स्थिति, बहुत ज्यादा कमजोरी या शरीर में पानी की कमी इसके संकेत हो सकते हैं. उन्होंने एक खास स्थिति को भी महत्वपूर्ण बताया है. अगर मरीज की तबीयत कुछ समय तक ठीक होने लगे और इसके बाद अचानक फिर से बिगड़ जाए, तो इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. &amp;nbsp;ठीक होने के बाद अचानक हालत खराब होना किसी दूसरी दिक्कत का संकेत हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-hypertension-delhi-ncr-study-high-blood-pressure-risk-after-40-3175428&quot;&gt;Delhi NCR Health Study: दिल्ली-NCR में हर 20 में से 1 को 2 गंभीर बीमारियां! स्टडी में बड़ा खुलासा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/cc5a7547fb25dd326748d82c588b550517875482856331257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;नया स्ट्रेन सामने नहीं आया&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;H1N1 के बढ़ते मामलों के बीच सबसे बड़ी चिंता यही थी कि कहीं देश में वायरस का कोई नया स्ट्रेन तो नहीं फैल रहा. ICMR वैज्ञानिकों ने इस चिंता को दूर करते हुए कहा है कि फिलहाल किसी नए स्ट्रेन का पता नहीं चला है. मौजूदा वायरस &lt;a title=&quot;मौसम&quot; href=&quot;https://www.abplive.com/weather&quot; data-type=&quot;interlinkingkeywords&quot;&gt;मौसम&lt;/a&gt;ी स्ट्रेन हैं, जो 2025 से ही सर्कुलेशन में हैं. इसका मतलब यह है कि मामलों में बढ़ोतरी को सीधे किसी नए या ज्यादा खतरनाक वायरस के सामने आने से जोड़ना सही नहीं होगा. वैज्ञानिक नियमित सर्विलांस के जरिए स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, ताकि वायरस में किसी तरह के बदलाव का समय रहते पता लगाया जा सके.&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/smoking-side-effects-how-soon-does-smoking-affect-the-body-3173486&quot;&gt;Smoking Side Effects: क्या पहली ही सिगरेट से खराब होने लगते हैं फेफड़े? जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/24/5bc02c84a9620cb38dc1acf8baefb6bd17875485832261257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[पेन किलर को कैसे पता चलता है कि शरीर में कहां हो रहा दर्द? जानें सच]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-does-a-painkiller-know-where-the-pain-is-in-the-body-3178830</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-does-a-painkiller-know-where-the-pain-is-in-the-body-3178830#respond</comments><pubDate>Mon, 24 Aug 2026 10:01:33 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ निर्जला गौड़ ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/how-does-a-painkiller-know-where-the-pain-is-in-the-body-3178830</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;How Painkillers Work&lt;/strong&gt; : जब शरीर के किसी हिस्से में चोट लगती है, सूजन होती है या कोई और परेशानी होती है, तो वहां मौजूद नसें दर्द से जुड़े सिग्नल दिमाग तक भेजती हैं. दिमाग इन सिग्नल को समझता है और तभी हमें दर्द महसूस होता है. ऐसे में अक्सर मन में सवाल आता है कि जब हम पेन किलर की गोली खाते हैं, तो उसे कैसे पता चलता है कि दर्द सिर में है, पेट में है या पैर में. सच यह है कि पेन किलर को यह बिल्कुल पता नही होता कि दर्द ठीक किस जगह हो रहा है, फिर भी वह राहत पहुंचा देती है?&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;दवा कैसे काम करती है?&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चोट या सूजन होने पर शरीर में कुछ केमिकल निकलते हैं, जिनमें प्रोस्टाग्लैंडिन मुख्य मानना जाता है&amp;nbsp; है. ये पदार्थ नसों को ज्यादा संवेदनशील बना देते हैं, जिससे दर्द का सिग्नल तेजी से दिमाग तक पहुंचता है और हमें दर्द महसूस होता है. दरअसल यह पूरी प्रोसेस&amp;nbsp; शरीर की एक तरह की सुरक्षा प्रणाली है जिससे दर्द के जरिए शरीर हमें बताता है&amp;nbsp; कि कहीं कुछ गड़बड़ है, ताकि हम उस हिस्से का ध्यान रखें या उसे और नुकसान से बचाएं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;दरअसल, दवा खाने के बाद उसका सक्रिय तत्व पेट और आंतों से अवशोषित होकर खून में मिल जाता है और खून इसे शरीर के हर हिस्से तक पहुंचाता है. यही वजह है कि दवा को दर्द की सही जगह ढूंढने की कोई जरूरत नहीं होती, वह अपने आप ही पूरे शरीर में फैल जाती है. ज्यादातर आम पेन किलर प्रोस्टाग्लैंडिन बनने की प्रक्रिया को कम या धीमा कर देती हैं, जिससे दर्द और सूजन दोनों घटने लगते हैं. आमतौर पर दवा असर दिखाना 20 से 30 मिनट के भीतर शुरू कर देती है, क्योंकि इतने समय में सक्रिय तत्व खून में अच्छी मात्रा में पहुंच जाता है और अपना काम शुरू कर देता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः&lt;/strong&gt; &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/india-diabetes-blood-sugar-obesity-bp-nfhs-report-3178501#google_vignette&quot;&gt;भारत में बढ़े डायबिटीज और मोटापे के मामले, बीपी में मामूली राहत &lt;/a&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;सिर्फ दर्द वाली जगह पर क्यों करती है काम दवाइयां?&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जगह पर दवाओं के काम करने की वजह यह है कि चोट या सूजन वाले हिस्से में केमिकल एक्टिविटी बाकी शरीर से ज्यादा होती है और पेन किलर वहीं की गतिविधि को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है. इसी वजह से राहत उसी हिस्से में महसूस होती है, भले ही दवा पूरे शरीर में घूम रही हो. कुछ दवाएं प्रोस्टाग्लैंडिन को कम करती हैं तो कुछ सीधे नसों और दिमाग पर असर डालती हैं. इसलिए अलग-अलग तरह के दर्द के लिए अलग दवा दी जाती है. हर दर्द के लिए एक ही पेन किलर सही नही मानी जाती.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;क्या पेन किलर लेना हमेशा सुरक्षित?&lt;/strong&gt;&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किसी भी पेन किलर को बार-बार या जरूरत से ज्यादा मात्रा में लेना सही नहीं माना जाता, क्योंकि कुछ दवाएं पेट, किडनी और लिवर जैसे अंगों पर बुरा असर डाल सकती हैं. यह खून के जरिए पूरे शरीर में पहुंचती है और दर्द पैदा करने वाले केमिकल सिग्नल या नसों-दिमाग के दर्द संकेत को प्रभावित करती है. इसी वजह से हमें दर्द वाली जगह पर राहत महसूस होती है. दवा की सही मात्रा और इस्तेमाल हमेशा डॉक्टर या फार्मासिस्ट की सलाह के अनुसार ही करना चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/ahmedabad-fake-heart-medicine-news-how-to-identify-fake-nicardia-retard-heart-medicine-and-where-to-report-3178455&quot;&gt;मेडिकल स्टोर से नकली दवा तो नहीं खरीद रहे? ऐसे करें पहचान &lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/23/d02d58fd5a6f791dfcd84d3ea99fb55a17874609474631472_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[किन सब्जियों को साथ खाने से हो जाती है पथरी? दूर कर लीजिए सारे शक]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/which-vegetables-are-sources-of-stone-3179094</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/which-vegetables-are-sources-of-stone-3179094#respond</comments><pubDate>Mon, 24 Aug 2026 08:17:51 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ बाबर हुसैन ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/which-vegetables-are-sources-of-stone-3179094</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सब्जियों को लेकर अक्सर ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं कि दो खास सब्जियों को साथ खाने से किडनी में पथरी बन जाती है. लेकिन हर ऐसी बात सच नहीं होती, पथरी बनने का मामला सिर्फ दो सब्जियों को एक साथ खाने से तय नहीं होता है. इसमें पानी की कमी, खाने की आदतें, शरीर में कैल्शियम और ऑक्सलेट का संतुलन, ज्यादा नमक और कुछ दूसरी चीजें भी अहम रोल अदा करते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;क्या सब्जियां खाने से पथरी बनती है?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आम तौर पर किसी खास सब्जियों को साथ खाने से पथरी बनने का सीधा वैज्ञानिक सबूत नहीं है. किडनी स्टोन कई वजहों से बन सकती है, और इसका सबसे आम किस्म का कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन है. ऑक्सलेट कुछ खान पान में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है.इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि जैसे ही दो खास सब्जियां एक साथ खाई जाई, पथरी बन जाएगी. किसी व्यक्ति के लिए जोखिम उसकी पूरी डाइट और शरीर की स्थिति पर निर्भर कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें:&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/sugar-price-hike-how-much-sugar-does-diabetic-patient-need-for-home-in-a-month-3179048&quot;&gt;शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में कितनी चाहिए चीनी? नोट कर लें हिसाब किताब&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इस सब्जियों में होता है ऑक्सलेट&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पालक में ऑक्सलेट की मात्रा ज्यादा होती है. जिन लोगों को कैल्शियम ऑक्सलेट स्टोन बनने की समस्या रहती है, उन्हें बहुत ज्यादा ऑक्सलेट वाली चीजों का खान पान कम करने की सलाह दी जाती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर कोई पालक खाना बंद ही कर दे. कुछ दूसरी सब्जियों और खानों में भी ऑक्सलेट पाया जाता है. यहां मात्रा और एक शख्स की हालत ज्यादा अहम होता है. अगर पहले पथरी हो चुकी है, तो डॉक्टर या डाइटिशियन से अपनी डाइट के बारे में सलाह लेना बेहतर रहता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पथरी से बचने के लिए क्या है जरूरी?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;किडनी स्टोन से बचने के लिए सिर्फ यह देखना काफी नहीं है कि कौन सी सब्जी किसके साथ खाई जा रही है. डॉक्टर के मुताबिक पीना सबसे जरूरी बातों में शामिल है. पानी कम पीने से पेशाब ज्यादा गाढ़ा हो सकता है, और उसमें मौजूद कुछ पदार्थ क्रिस्टल बनाकर पथरी हो सकता है. इसके अलावा ज्यादा नमक खाना भी किडनी स्टोन का खतरा को बढ़ा सकता है. इसलिए खाने में नमक की मात्रा पर ध्यान देना और पानी पीना&amp;nbsp; बेहद जरूरी है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हर व्यक्ति के लिए हर चीज नहीं होती&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर किसी व्यक्ति को पहले किडनी स्टोन हो चुका है तो उसकी डाइट इस बात पर भी निर्भर कर सकती है कि पथरी किस तरह की पथरी थी. इसलिए इंटरनेट पर मिलने वाली ये सब्जियां कभी साथ न खाएं जैसी बातों पर आंख बंद करके भरोसा करना समझदारी नहीं है. वैसे सब्जियां आम तौर पर हेल्थी डाइइट का हिस्सा हैं. बिना वजह कई सब्जियां बंद करने के बजाय अपनी परेशानी और पुराने टेस्ट के हिसाब से डॉक्टर से सही सलाह लेना ज्यादा बेहतर है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/holding-urine-causes-uti-symptomps-uti-causes-health-tips-3178441&quot;&gt;देर तक रोककर रखते हैं टॉयलेट, शरीर में ये हो सकती हैं दिक्कतें&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/23/fcf0c503c6b211b398ab8ae03e8ae76517874999036571470_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में कितनी चाहिए चीनी? नोट कर लें हिसाब किताब]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/sugar-price-hike-how-much-sugar-does-diabetic-patient-need-for-home-in-a-month-3179048</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/sugar-price-hike-how-much-sugar-does-diabetic-patient-need-for-home-in-a-month-3179048#respond</comments><pubDate>Sun, 23 Aug 2026 19:04:05 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ मानसी उपाध्याय ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/sugar-price-hike-how-much-sugar-does-diabetic-patient-need-for-home-in-a-month-3179048</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;चीनी के बढ़ते दामों ने इन दिनों लोगों की चिंता बढ़ा दी है. देशभर में चीनी की कीमतें लगातार ऊपर जा रही हैं और इसका असर आम लोगों की जेब पर भी पड़ रहा है. इन दिनों कई शहरों में चीनी के दाम 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक साल में चीनी की कीमतों में 20 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. चीनी की कीमतें बढ़ने के साथ-साथ घर के महीने भर के राशन में इसकी मात्रा को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं. खासकर डायबिटीज से जूझ रहे लोगों के लिए यह समझना जरूरी है कि रोजाना कितनी अतिरिक्त चीनी ली जा रही है. आमतौर पर डायबिटीज को चीनी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक शरीर में कार्बोहाइड्रेट भी टूटकर ग्लूकोज में बदलते हैं और ब्लड शुगर को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं कि शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में चीनी कितनी चाहिए.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;शुगर पेशेंट घर के लिए एक महीने में चीनी कितनी चाहिए?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डायबिटीज वाले व्यक्ति के लिए घर में एक महीने के लिए चीनी की कोई एक तय मात्रा नहीं होती है. हर व्यक्ति की जरूरत अलग होती है. यह उसकी सेहत, वजन, एक्टिविटी लेवल, डायबिटीज के प्रकार, दवाओं और पूरी डाइट पर निर्भर करती है. आमतौर पर डायबिटीज वाले लोगों को अतिरिक्त चीनी सीमित रखने की सलाह दी जाती है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, रोजाना मिलने वाली कुल कैलोरी में अतिरिक्त चीनी की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से कम होनी चाहिए. वहीं, अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन (AHA) महिलाओं के लिए करीब 25 ग्राम और पुरुषों के लिए करीब 36 ग्राम अतिरिक्त चीनी रोजाना लेने की सीमा बताता है.&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;डायबिटीज में चीनी पूरी तरह बंद करनी जरूरी है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डायबिटीज में व्यक्ति को चीनी पूरी तरह बंद करनी जरूरी नहीं है. डायबिटीज वाले लोग चीनी युक्त चीजें खा सकते हैं, लेकिन मात्रा पर कंट्रोल रखना जरूरी है. चीनी के साथ-साथ कार्बोहाइड्रेट पर भी ध्यान देना जरूरी है. शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है और इससे ब्लड शुगर प्रभावित हो सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें -&lt;/strong&gt; &lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/holding-urine-causes-uti-symptomps-uti-causes-health-tips-3178441&quot;&gt;देर तक रोककर रखते हैं टॉयलेट, शरीर में ये हो सकती हैं दिक्कतें &lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;डायबिटीज में ज्यादा चीनी खाने के नुकसान&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डायबिटीज में ज्यादा चीनी का सेवन करने से ब्लड शुगर बढ़ सकता है, जिससे इसे कंट्रोल करना मुश्किल हो सकता है. लगातार ज्यादा ब्लड शुगर रहने पर समय के साथ हार्ट, ब्लड वेसेल्स, आंखों, नसों और किडनी से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है. हालांकि चीनी खाना सीधे तौर पर डायबिटीज का कारण नहीं बनता है. डायबिटीज में चीनी की मात्रा के साथ-साथ कुल कार्बोहाइड्रेट और पूरी डाइट पर ध्यान देना जरूरी है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें -&lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-obesity-raising-concerns-in-india-compare-to-china-3178504&quot;&gt; डायबिटीज-मोटापा बढ़ा रहे भारत की चिंता, चीन की तुलना में कैसी है हमारी स्थिति?&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/23/9f70f64991b233d3c202da152651d37217874895894121120_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[डायबिटीज-मोटापा बढ़ा रहे भारत की चिंता, चीन की तुलना में कैसी है हमारी स्थिति?]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-obesity-raising-concerns-in-india-compare-to-china-3178504</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-obesity-raising-concerns-in-india-compare-to-china-3178504#respond</comments><pubDate>Sun, 23 Aug 2026 09:11:48 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ मनस्वी चौहान ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-obesity-raising-concerns-in-india-compare-to-china-3178504</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत में स्वास्थ्य सेवाओं का दायरा बढ़ा है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक लोगों की पहुंच बेहतर हुई है और स्वास्थ्य बीमा का कवरेज भी बढ़ा है. इसके बावजूद मधुमेह, मोटापा और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां हमारे देश में लगातार चिंता का विषय बनी हुई हैं. सामने आए आंकड़े बताते हैं कि बीमारी का समय रहते पता लगाना और रोकथाम पर जोर देना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मधुमेह बना चिंता का विषय&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;आंकड़ों के मुताबिक, भारत में मधुमेह का प्रसार पुरुषों और महिलाओं दोनों में बढ़ा है. 2015-16 के मुकाबले 2019-21 से 2022-24 के बीच पुरुषों में यह आंकड़ा करीब 15.6 प्रतिशत से बढ़कर 20.9 प्रतिशत हो गया. वहीं महिलाओं में भी मधुमेह का प्रसार 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत तक पहुंचा है. यह बढ़ोतरी केवल एक स्वास्थ्य आंकड़ा नहीं है, बल्कि बदलती जीवनशैली की ओर भी संकेत करती है. कम शारीरिक गतिविधि, खानपान में बदलाव, बढ़ता वजन और शहरी जीवनशैली मधुमेह के जोखिम को बढ़ाने वाले प्रमुख कारणों में शामिल हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मधुमेह के साथ मोटापा भी बढ़ रहा&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;मधुमेह के साथ बढ़ता वजन और मोटापा भी भारत के लिए गंभीर चुनौती बन रहा है. उपलब्ध आंकड़ों में महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे का स्तर 24 प्रतिशत से बढ़कर 30.7 प्रतिशत और पुरुषों में 22.9 प्रतिशत से बढ़कर 27.3 प्रतिशत बताया गया है. एक सर्वे के अनुसार, वयस्क मोटापे का स्तर चीन में भारत से अधिक है. चीन में यह करीब 8.3 प्रतिशत, जबकि भारत में 7.3 प्रतिशत बताया गया है. यानी मोटापे के मामले में चीन की स्थिति कुछ हालातों में भारत से खराब दिखाई देती है, लेकिन भारत में बढ़ता मोटापा भी चिंता का विषय है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार अधिक वजन और मोटापा गैर-संचारी रोगों के महत्वपूर्ण जोखिम कारणों में शामिल हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/gad-7-anxiety-levels-global-india-anxiety-statistics-3177012&quot;&gt;&lt;strong&gt;Global Anxiety Statistics: एंग्जायटी लेवल 3 क्या है, भारत-पाकिस्तान समेत दुनिया में कितने लोग परेशान?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उच्च रक्तचाप में भी चीन आगे&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत में पुरुषों में इसका स्तर करीब 21.3 प्रतिशत से बढ़कर 22.1 प्रतिशत हुआ, जबकि महिलाओं में यह 24 प्रतिशत से घटकर 19.4 प्रतिशत रहा. वहीं तुलना में चीन में उच्च रक्तचाप और मोटापे का बोझ कई हालातों पर अधिक दिखाई दता है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत के लिए चुनौती&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत की सबसे बड़ी चुनौती बीमारी के इलाज से पहले उसकी रोकथाम को मजबूत करना है. नियमित स्वास्थ्य जांच, रक्तचाप और रक्त शर्करा की समय पर जांच, वजन पर नियंत्रण, संतुलित आहार और रोजाना शारीरिक गतिविधि को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं का हिस्सा बनाना बहद जरूरी है. डब्ल्यूएचओ के अनुसार 2024 के अंत तक भारत में 1.7 करोड़ से अधिक उच्च रक्तचाप और मधुमेह के मरीज उपचार प्राप्त कर रहे थे, हालांकि देखभाल की निरंतरता और मधुमेह की प्रभावी निगरानी अब भी चुनौती बनी हुई है.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बीमारी को रोकने पर देना होगा ध्यान&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत और चीन दोनों ही गैर-संचारी रोगों के बढ़ते बोझ का सामना कर रहे हैं. फर्क यह है कि भारत में मधुमेह और अधिक वजन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रह हैं, जबकि चीन कई हालातों में पहले से अधिक ऊंचे स्तर पर है. ऐसे में भारत के लिए यह समय चेतावनी को समझने और बीमारी बढ़ने से पहले कदम उठाने का है. स्वास्थ्य व्यवस्था पर महंगा इलाज का बोझ बढ़ने से बेहतर है कि नियमित जांच, बेहतर खानपान और सक्रिय जीवनशैली के जरिए बीमारी को शुरुआती स्तर पर ही रोका जाए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/80-percent-of-india-elderly-people-are-at-risk-face-heat-stress-up-due-to-3-degree-global-warming-study-says-know-reason-3177334&quot;&gt;&lt;strong&gt;Global Warming Risk: 3&amp;deg;C ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से 80 पर्सेंट बुजुर्गों पर मौत का खतरा, जानें वजह&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/2243196cf63464cc0d2bcb3cb310278617873846408431473_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[देर तक रोककर रखते हैं टॉयलेट, शरीर में ये हो सकती हैं दिक्कतें]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/holding-urine-causes-uti-symptomps-uti-causes-health-tips-3178441</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/holding-urine-causes-uti-symptomps-uti-causes-health-tips-3178441#respond</comments><pubDate>Sun, 23 Aug 2026 08:22:57 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ मनस्वी चौहान ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/holding-urine-causes-uti-symptomps-uti-causes-health-tips-3178441</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कई लोग काम की व्यस्तता, सफर, स्कूल-कॉलेज या आसपास साफ टॉयलेट न होने की वजह से पशाब को लंबे समय तक रोककर रखते हैं. कभी-कभार ऐसा होना आम बात है, लेकिन अगर बार-बार लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत बन जाए तो यह यूरिनरी सिस्टम पर गहरा असर डाल सकती है. पेशाब की इच्छा को लगातार नजरअंदाज करने के बजाय शरीर के संकेतों को समझना बेहद जरूरी होता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हमारे शरीर में किडनी खून को फिल्टर करके न काम आने वाले पदार्थ और अतिरिक्त पानी को पेशाब के रूप में बाहर निकालती है. यह पेशाब मूत्राशय में जमा होता है और पर्याप्त मात्रा होने पर पेशाब करने की इच्छा महसूस होती है. सामान्य परिस्थितियों में इस संकेत को लंबे समय तक टालते रहना अच्छी आदत नहीं माना जाता.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का हो सकता है खतरा&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पेशाब को बार-बार रोकने से मूत्राशय में लंबे समय तक पेशाब जमा रह सकता है, जिसकी वजह से कुछ परिस्थितियों में इससे बैक्टीरिया को बढ़ने का मौका मिल सकता है और यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन (UTI) का जोखिम बढ़ जाता है. UTI होने पर पेशाब करते समय जलन, बार-बार पेशाब लगना, पेशाब में दर्द या निचले पेट में असहजता जैसे लक्षण दिखाई देते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;ब्लैडर की कार्यप्रणाली हो सकती है प्रभावित&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत मूत्राशय को जरूरत से ज्यादा खिंचाव की स्थिति में ला सकती है. अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से पेशाब की इच्छा को दबाता रहता है तो समय के साथ ब्लैडर के सामान्य तरीके से खाली होने में परेशानी हो जाती है. हालांकि, इसका असर व्यक्ति की आदत, स्वास्थ्य और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है. ऐसे में पेशाब आने पर हमेशा टॉयलेट जान चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/take-special-care-of-personal-hygiene-dont-ignore-these-important-things-3177594&quot;&gt;&lt;strong&gt;Personal Hygiene Tips: प्राइवेट पार्ट और पर्सनल हाइजीन का रखें खास ख्याल, इन बातों को न करें नजरअंदाज&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पेशाब पूरी तरह खाली न होने की समस्या&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कुछ लोगों में लंबे समय तक पेशाब रोकने की आदत के साथ ब्लैडर को पूरी तरह खाली करने में परेशानी हो सकती है. पेशाब करने के बाद भी ऐसा महसूस हो सकता है कि ब्लैडर पूरी तरह खाली नहीं हुआ और दोबारा टॉयलेट जाने पर पेशाब न आने जैसी समस्या हो सकती है. अगर यह समस्या बार-बार हो रही है, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसके पीछे अन्य स्वास्थ्य कारण भी हो सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सामान्य तौर पर जब पेशाब की इच्छा हो तो सुविधानुसार जल्द टॉयलेट जाना बेहतर होता है. पानी भी जरूरत के अनुसार पीते रहें. कम पानी पीकर पेशाब की जरूरत को कम करने की कोशिश करना सही तरीका नहीं है. अगर पेशाब करते समय तेज जलन या दर्द हो, पेशाब में खून दिखाई दे, पेशाब करने में परेशानी हो या बार-बार UTI हो रहा हो, तो ऐसे में डॉक्टर स सलाह जरूर लेनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/why-do-women-get-uti-repeatedly-know-what-precautions-to-take-3177119&quot;&gt;&lt;strong&gt;UTI in Women: महिलाओं में बार-बार क्यों होता है UTI, जानें किन बातों का रखें ख्याल?&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/3380163838a28f7a7a4d3511ee93de7117873778395971473_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[Drivers Heart Risk: 45 से कम उम्र के ड्राइवरों पर मंडरा रहा हार्ट अटैक का खतरा! जानें सच]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/auto-cab-drivers-heart-risk-long-sitting-pollution-poor-sleep-3178486</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/auto-cab-drivers-heart-risk-long-sitting-pollution-poor-sleep-3178486#respond</comments><pubDate>Sun, 23 Aug 2026 07:07:43 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ सोनम ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/auto-cab-drivers-heart-risk-long-sitting-pollution-poor-sleep-3178486</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Auto And Cab Drivers Heart Attack Risk:&lt;/strong&gt; ऑटो और कैब चलाने वाले लोगों की दिनचर्या अक्सर लंबे समय तक सड़क पर रहने, घंटों एक ही जगह बैठे रहने और ट्रैफिक के तनाव से भरी होती है. अब स्वास्थ्य एक्सपर्ट ने इस तरह की लाइफस्टाइलसे जुड़े हार्ट संबंधी जोखिमों पर चिंता जताई है. हेल्थ एजुकेटर प्रशांत देसाई ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट के जरिए एक कर्नाटक जिले के अचानक हुई कार्डियक मौत के मामलों का जिक्र करते हुए बताया कि पिछले 20 मामलों में से 6 लोग ऑटो या कैब ड्राइवर थे. उन्होंने यह भी कहा कि जिन 24 अचानक मौत के मामलों की जांच की गई, उनमें 14 लोग 45 साल से कम उम्र के थे.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;देसाई ने अपने पोस्ट में ड्राइवरों की कामकाजी परिस्थितियों को लेकर चिंता जताई. उन्होंने बताया कि ऑटो और कैब ड्राइवरों को अक्सर रोजाना लंबे समय तक गाड़ी चलानी पड़ती है. घंटों बैठे रहना, ट्रैफिक और प्रदूषण का सामना करना, अनियमित नींद और लगातार तनाव उनके स्वास्थ्य पर असर डाल सकते हैं. उनका कहना है कि कई दूसरे पेशों में काम करने वाले लोगों के पास अपने काम और आराम का समय तय करने का विकल्प होता है, लेकिन ड्राइवरों की कमाई अक्सर सड़क पर बिताए गए समय से जुड़ी होती है. ऐसे में पर्याप्त आराम लेना उनके लिए मुश्किल हो सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/7117d6fd7dc7a4378a9e9be12b746fc217873819674411257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;उन्होंने ड्राइवरों के लिए नियमित हेल्थ चेकअप, काम के दौरान जरूरी ब्रेक और पर्याप्त नींद को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई. हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल लंबे समय तक ड्राइविंग को अचानक कार्डियक अरेस्ट की सीधी वजह नहीं माना जा सकता. लेकिन इससे जुड़े कई कारक हृदय रोग के खतरे को बढ़ा सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लंबे समय तक बैठने का दिल पर क्या असर पड़ता है?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;KIMS Hospitals, ठाणे के कार्डियक साइंसेज विभाग के निदेशक और एचओडी डॉ. बी. सी. कलमठ के अनुसार, लंबे समय तक ड्राइविंग करने से हृदय रोग से जुड़े कई स्थापित जोखिम कारकों पर असर पड़ सकता है. रोजाना 10 से 12 घंटे तक गाड़ी की सीट पर बैठे रहने का मतलब है कि काम के दौरान शारीरिक गतिविधि बेहद कम हो जाती है.&lt;/p&gt;
&lt;blockquote class=&quot;instagram-media&quot; style=&quot;background: #FFF; border: 0; border-radius: 3px; box-shadow: 0 0 1px 0 rgba(0,0,0,0.5),0 1px 10px 0 rgba(0,0,0,0.15); margin: 1px; max-width: 540px; min-width: 326px; padding: 0; width: calc(100% - 2px);&quot; data-instgrm-captioned=&quot;&quot; data-instgrm-permalink=&quot;https://www.instagram.com/p/Db-02nPth_x/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading&quot; data-instgrm-version=&quot;14&quot;&gt;
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&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;display: block; height: 50px; margin: 0 auto 12px; width: 50px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;color: #3897f0; font-family: Arial,sans-serif; font-size: 14px; font-style: normal; font-weight: 550; line-height: 18px;&quot;&gt;View this post on Instagram&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;padding: 12.5% 0;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div&gt;
&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;div style=&quot;width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg);&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
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&lt;div style=&quot;background-color: #f4f4f4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;&quot;&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;p style=&quot;color: #c9c8cd; font-family: Arial,sans-serif; font-size: 14px; line-height: 17px; margin-bottom: 0; margin-top: 8px; overflow: hidden; padding: 8px 0 7px; text-align: center; text-overflow: ellipsis; white-space: nowrap;&quot;&gt;&lt;a style=&quot;color: #c9c8cd; font-family: Arial,sans-serif; font-size: 14px; font-style: normal; font-weight: normal; line-height: 17px; text-decoration: none;&quot; href=&quot;https://www.instagram.com/p/Db-02nPth_x/?utm_source=ig_embed&amp;amp;utm_campaign=loading&quot; target=&quot;_blank&quot; rel=&quot;noopener&quot;&gt;A post shared by Prashant Desai (@itsprashantdesai)&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;/div&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p&gt;
&lt;script src=&quot;//www.instagram.com/embed.js&quot; async=&quot;&quot;&gt;&lt;/script&gt;
&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. कलमठ के मुताबिक, लंबे समय तक बैठने और पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने से ब्लड सर्कुलेशन, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल के स्तर पर निगेटिव असर पड़ सकता है. ऑटो और कैब ड्राइवर अक्सर कई घंटों तक एक ही स्थिति में बैठे रहते हैं, जिससे शरीर की सक्रियता कम हो जाती है. लंबे समय तक बनी रहने वाली ऐसी दिनचर्या हार्ट और&amp;nbsp;ब्लड वेसल्स से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके अलावा, ड्राइवरों को लगातार मानसिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है. ट्रैफिक जाम, समय पर पहुंचने का दबाव, यात्रियों की अपेक्षाएं और कमाई को लेकर चिंता कई लोगों को लंबे समय तक तनाव की स्थिति में रख सकती है. एक्सपर्ट के अनुसार, लगातार तनाव कोरोनरी आर्टरी डिजीज समेत अन्य हृदय संबंधी समस्याओं के जोखिम कारकों में योगदान कर सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;br /&gt;&lt;img src=&quot;https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/bd48286c4ae6dbd937e858d6ac2cfbbd17873820385521257_original.jpg&quot; /&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;प्रदूषण से बढ़ सकती है परेशानी&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;सड़क पर लंबे समय तक काम करने वाले ड्राइवरों को वाहनों से निकलने वाले धुएं और हवा में मौजूद प्रदूषकों का भी सामना करना पड़ता है. खासकर भारी ट्रैफिक वाले इलाकों में लंबे समय तक रहने से शरीर पर प्रदूषण का असर बढ़ सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. कलमठ के अनुसार, लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से शरीर में सूजन बढ़ सकती है और रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है. यह हृदय पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है. धूम्रपान करने वालों में यह जोखिम और बढ़ सकता है. वहीं, अधिक शराब का सेवन हाई ब्लड प्रेशर और दिल की धड़कन की अनियमितता से भी जुड़ा हो सकता है. एक्सपर्ट का कहना है कि जब लंबे समय तक बैठने, तनाव, प्रदूषण, खराब नींद, धूम्रपान और अन्य अस्वस्थ आदतों जैसे कई कारक एक साथ मौजूद हों, तो हार्ट और ब्लड वेसल्स पर दबाव काफी बढ़ सकता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/diabetes-hypertension-delhi-ncr-study-high-blood-pressure-risk-after-40-3175428&quot;&gt;Delhi NCR Health Study: दिल्ली-NCR में हर 20 में से 1 को 2 गंभीर बीमारियां! स्टडी में बड़ा खुलासा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;खराब नींद भी बन सकती है खतरा&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;कमाई बढ़ाने के लिए कई कैब और ऑटो ड्राइवर देर रात तक काम करते हैं या सुबह जल्दी एयरपोर्ट और दूसरी लंबी राइड के लिए निकल जाते हैं. इससे उनकी नींद का समय अनियमित हो सकता है. लगातार पर्याप्त नींद न मिलने पर ब्लड प्रेशर और तनाव से जुड़े हार्मोन बढ़ सकते हैं, जिसका असर शरीर के मेटाबॉलिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है. अनियमित या खराब नींद की वजह से शरीर को पर्याप्त आराम नहीं मिल पाता. विशेषज्ञ नींद को काम के लिए कुर्बान करने के बजाय स्वास्थ्य की प्राथमिकता मानने की सलाह देते हैं. थकान दूर करने के लिए जरूरत से ज्यादा कैफीन, सिगरेट या शराब का सहारा लेना भी स्थिति को बेहतर नहीं बनाता.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;45 साल से कम उम्र होना पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डॉ. कलमठ का कहना है कि कम उम्र को देखकर हार्ट रोग के खतरे को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. 45 साल से कम उम्र के लोगों को भी हार्ट हेल्थ को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है, खासकर अगर उनकी दिनचर्या में लंबे समय तक बैठना, तनाव, खराब नींद या अन्य जोखिम कारक शामिल हैं. ड्राइवरों को सीने में दबाव या बेचैनी, सांस फूलना, असामान्य पसीना आना, चक्कर आना या बेहोशी, दिल की तेज या अनियमित धड़कन, बिना वजह ज्यादा थकान और दर्द का हाथ, कंधे, पीठ या जबड़े तक फैलना जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना चाहिए. अगर ये लक्षण नए हों, गंभीर हों या लगातार बने रहें, तो तुरंत मेडिकल जांच करानी चाहिए. यदि सीने में तकलीफ के साथ सांस फूलना, ज्यादा पसीना आना या बेहोशी जैसे लक्षण हों, तो खुद गाड़ी चलाकर अस्पताल जाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;लंबे घंटे काम करना जरूरी हो तो क्या करें?&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;एक्सपर्ट लंबे समय तक लगातार बैठे रहने से बचने की सलाह देते हैं. अगर संभव हो तो हर एक से दो घंटे के बीच छोटा ब्रेक लेकर कुछ देर चलें, स्ट्रेचिंग करें और पैरों को सक्रिय रखें. काम के अलावा नियमित शारीरिक गतिविधि भी जरूरी है. फिटनेस और स्वास्थ्य की स्थिति के अनुसार तेज चलना या अन्य एरोबिक एक्सरसाइज के साथ स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की जा सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;इसे भी पढ़ेंः&amp;nbsp;&lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/smoking-side-effects-how-soon-does-smoking-affect-the-body-3173486&quot;&gt;Smoking Side Effects: क्या पहली ही सिगरेट से खराब होने लगते हैं फेफड़े? जानें सच&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;Disclaimer: यह जानकारी रिसर्च स्टडीज और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है. इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें. किसी भी नई गतिविधि या व्यायाम को अपनाने से पहले अपने डॉक्टर या संबंधित विशेषज्ञ से सलाह जरूर लें.&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/6681b8b2da9e84391ade0f3c180e04ae17873828268161257_original.jpg" width="220"/></item><item><title><![CDATA[भारत में बढ़े डायबिटीज और मोटापे के मामले, बीपी में मामूली राहत]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/india-diabetes-blood-sugar-obesity-bp-nfhs-report-3178501</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/india-diabetes-blood-sugar-obesity-bp-nfhs-report-3178501#respond</comments><pubDate>Sat, 22 Aug 2026 16:36:27 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ संजना सिंह ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/india-diabetes-blood-sugar-obesity-bp-nfhs-report-3178501</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;भारत ने पिछले कुछ सालों में स्वास्थ्य सेवाओं और बीमा की सुविधाओं में काफी सुधार किया है, जिससे सेहत को लेकर एक नई तस्वीर सामने आई है. नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या तेजी से बढ़ रही है. यह बदलाव सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी बदलती जीवनशैली, खानपान की आदतों और घटती शारीरिक गतिविधि की तरफ भी इशारा करता है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;हालांकि, रिपोर्ट में एक राहत भरी बात यह है कि हाई ब्लड प्रेशर यानी बीपी के मामलों में मामूली गिरावट देखी गई है. यह आंकड़े बताते हैं कि जहां एक तरफ हमें डायबिटीज को लेकर ज्यादा सतर्क होने की जरूरत है, वहीं दूसरी तरफ बीपी को कंट्रोल करने की दिशा में हम सही रास्ते पर हैं.&lt;/p&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;डायबिटीज और शुगर में हुई बढ़ोतरी&lt;/h2&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;रिपोर्ट के अनुसार, भारत में डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या दोनों में साफ बढ़त देखी गई है. पुरुषों में यह आंकड़ा पहले 17.8% था, जो अब बढ़कर 20.9% हो गया है. वहीं महिलाओं में भी यह समस्या 13.5% से बढ़कर 15.6% तक पहुंच गई है. यानी हर पांच में से एक पुरुष और हर सात में से एक महिला अब हाई ब्लड शुगर की चपेट में है. इसके साथ ही मोटापे और ओवरवेट की समस्या भी बढ़ी है, खासकर महिलाओं में यह बदलाव सबसे ज्यादा नजर आया है, जहां यह आंकड़ा 24% से बढ़कर 30.7% हो गया है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;पुरुषों में भी मोटापे की दर 21.3% से बढ़कर 22.9% हुई है. यह आंकड़े साफतौर पर बताते हैं कि हमें अपने खानपान और रोजमर्रा की जीवनशैली पर गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है, क्योंकि डायबिटीज और मोटापा आगे चलकर दिल की बीमारियों और किडनी से जुड़ी दिक्कतों का कारण भी बन सकते हैं.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/period-health-problems-pcos-symptomps-period-health-issues-3178039&quot;&gt;पीरियड की हर परेशानी हार्मोनल नहीं! ये संकेत हो सकते हैं गंभीर बीमारी का इशारा&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h2 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;बीपी के मामलों में मिली थोड़ी राहत&lt;/h2&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जहां डायबिटीज और शुगर को लेकर चिंता बढ़ी है वहीं हाई ब्लड प्रेशर यानी बीपी के मामलों में हल्की गिरावट देखने को मिली है. रिपोर्ट के मुताबिक, बीपी का आंकड़ा 24.3% से घटकर 23.4% के आसपास आ गया है. यह गिरावट भले ही बड़ी न लगे, लेकिन यह इस बात का संकेत है कि लोगों में बीपी को लेकर जागरूकता थोड़ी बढ़ी है और समय पर इलाज व दवाइयां लेने की आदत में सुधार हुआ है. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ बीपी में राहत मिलना काफी नहीं है, क्योंकि डायबिटीज और मोटापा जैसी बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं और अगर समय रहते इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले सालों में यह देश के लिए एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकती हैं. इसलिए जरूरी है कि लोग नियमित रूप से अपनी शुगर और वजन की जांच कराएं, संतुलित खानपान अपनाएं और रोजाना कुछ समय शारीरिक गतिविधि के लिए जरूर निकालें.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ेंः&amp;nbsp; &lt;/strong&gt;&lt;strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/h1n1-cases-rising-in-delhi-oxygen-levels-dropping-in-patients-3178198&quot;&gt;दिल्ली में बढ़ रहे H1N1के केस, मरीजों में गिर रहा ऑक्सीजन लेवल&lt;/a&gt;&lt;/strong&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/ba3d181e860b0308fb775929ac8fa29217873964107701381_original.png" width="220"/></item><item><title><![CDATA[मेडिकल स्टोर से नकली दवा तो नहीं खरीद रहे? ऐसे करें पहचान]]></title><link>https://www.abplive.com/lifestyle/health/ahmedabad-fake-heart-medicine-news-how-to-identify-fake-nicardia-retard-heart-medicine-and-where-to-report-3178455</link><comments>https://www.abplive.com/lifestyle/health/ahmedabad-fake-heart-medicine-news-how-to-identify-fake-nicardia-retard-heart-medicine-and-where-to-report-3178455#respond</comments><pubDate>Sat, 22 Aug 2026 16:09:43 +0530 </pubDate><dc:creator><![CDATA[ दीनदयाल पाटीदार ]]></dc:creator><category><![CDATA[ हेल्थ ]]></category><guid isPermaLink="true">https://www.abplive.com/lifestyle/health/ahmedabad-fake-heart-medicine-news-how-to-identify-fake-nicardia-retard-heart-medicine-and-where-to-report-3178455</guid><description><![CDATA[&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अहमदाबाद से एक बड़ी ही झकझोर देने वाली खबर सामने आई है. यहां&amp;nbsp; दिल की बीमारी में इस्तेमाल होने वाली दवा की भारी मात्रा में नकली टैबलेट पकड़ी गई हैं. जांच एजेंसियों ने Nicardia Retard 10 MG नाम की दवा की करीब 7.20 लाख नकली टैबलेट बरामद की हैं. यह दवा हाई ब्लड प्रेशर और दिल से जुड़ी बीमारियों के मरीजों को दी जाती है, इसलिए इसकी नकली सप्लाई सामने आने से मरीजों की सेहत को लेकर गंभीर चिंता खड़ी हो गई है. इतनी बड़ी तादाद में नकली दवा बाजार में पहुंचना यह दिखाता है कि नकली दवाओं का यह रैकेट कितने बड़े स्तर पर काम कर रहा था.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;फिलहाल इस मामले में आगे की जांच चल रही है और यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि ये नकली टैबलेट कहां-कहां तक सप्लाई हो चुकी थीं. ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि नकली दवा की पहचान कैसे की जाए, इसके क्या नुकसान हो सकते हैं और अगर किसी को नकली दवा मिले तो उसे कहां शिकायत करनी चाहिए.&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नकली दवा की पहचान कैसे करें?&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नकली दवा को पहचानना आसान नहीं होता, लेकिन कुछ बातों का ध्यान रखकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है. सबसे पहले दवा की पैकिंग को ध्यान से देखना चाहिए. असली दवा की पैकिंग पर छपाई एकदम साफ और सही होती है, जबकि नकली दवा में अक्षर धुंधले, स्पेलिंग गलत या रंग हल्का अलग नजर आ सकता है. साथ ही दवा पर बैच नंबर, मैन्युफैक्चरिंग डेट और एक्सपायरी डेट जरूर चेक करनी चाहिए. अगर यह जानकारी मिटी हुई है, गायब है या ठीक से प्रिंट नहीं हुई है, तो यह नकली दवा है सकती है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;इसके अलावा, कई दवा कंपनियां अब पैकेट पर QR कोड या होलोग्राम भी देती हैं, जिन्हें स्कैन करके दवा असली है या नहीं, यह पता किया जा सकता है. साथ ही अगर दवा हमेशा से जानी-पहचानी दुकान के बजाय किसी अनजान या बहुत सस्ते दाम पर बेचने वाली जगह से मिल रही है, तो वहां से दवा खरीदने से पहले सतर्क रहना चाहिए. दवा खाने के बाद अगर असर सामान्य से अलग महसूस हो या कोई नई दिक्कत हो, तो भी यह नकली दवा का संकेत हो सकता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नकली दवा के नुकसान&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नकली दवा के नुकसान बेहद गंभीर हो सकते हैं, खासतौर पर तब जब बात दिल की बीमारी जैसी गंभीर स्थिति की हो. हार्ट पेशेंट्स को दी जाने वाली दवाएं ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने और दिल की धड़कन को सामान्य बनाए रखने का काम करती हैं. अगर मरीज को नकली दवा मिल जाए, तो उससे बीमारी कंट्रोल में नहीं आती और स्थिति और बिगड़ सकती है. साथ ही कई बार नकली दवाओं में गलत या हानिकारक केमिकल भी मिला दिए जाते हैं, जो शरीर के दूसरे अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं. हार्ट पेशेंट्स के लिए यह खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि सही समय पर सही दवा न मिलने से हार्ट अटैक जैसी जानलेवा स्थिति भी बन सकती है.&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/take-special-care-of-personal-hygiene-dont-ignore-these-important-things-3177594&quot;&gt;&lt;strong&gt;प्राइवेट पार्ट और पर्सनल हाइजीन का रखें खास ख्याल, इन बातों को न करें नजरअंदाज&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;
&lt;h3 style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;नकली दवा मिल जाए तो कहां शिकायत करें&lt;/h3&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;अगर किसी को शक हो कि उसे नकली दवा मिली है, तो सबसे पहले उस दवा को इस्तेमाल करना तुरंत बंद कर देना चाहिए और डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. इसके बाद इसकी शिकायत राज्य के फूड एंड ड्रग कंट्रोल एडमिनिस्ट्रेशन यानी FDCA में की जा सकती है. हर राज्य में यह विभाग मौजूद होता है और नकली, मिलावटी या अवैध दवाओं से जुड़ी शिकायतें यहीं दर्ज कराई जाती हैं. इसके अलावा, Central Drugs Standard Control Organisation यानी CDSCO के पास भी शिकायत की जा सकती है, जिसकी आधिकारिक वेबसाइट पर ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने की सुविधा दी गई है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;जिस दुकान या मेडिकल स्टोर से दवा खरीदी गई है, उसका बिल संभालकर रखना भी जरूरी है, क्योंकि शिकायत के समय यह सबूत के तौर पर काम आता है. साथ ही, नजदीकी पुलिस थाने में भी इसकी शिकायत दर्ज कराई जा सकती है, क्योंकि नकली दवा बेचना और बनाना कानूनी तौर पर गंभीर अपराध माना जाता है.&amp;nbsp;&lt;/p&gt;
&lt;p style=&quot;text-align: justify;&quot;&gt;&lt;strong&gt;यह भी पढ़ें: &lt;/strong&gt;&lt;a href=&quot;https://www.abplive.com/lifestyle/health/period-health-problems-pcos-symptomps-period-health-issues-3178039&quot;&gt;&lt;strong&gt;पीरियड की हर परेशानी हार्मोनल नहीं! ये संकेत हो सकते हैं गंभीर बीमारी का इशारा&lt;/strong&gt;&lt;/a&gt;&lt;/p&gt;]]></description><slash:comments>0</slash:comments><media:thumbnail url="https://feeds.abplive.com/onecms/images/uploaded-images/2026/08/22/ccdcc3faef29b2d13fa0585c9677ea8e17873793343851474_original.jpg" width="220"/></item></channel></rss>