सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार को चिकित्सा रपटों के आधार पर 24 सप्ताह की गर्भवती महिला के गर्भपात को मंजूरी दे दी. चिकित्सा रपटों में कहा गया है कि भ्रूण में गंभीर विसंगतियां हैं और यह उसकी मां के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जोखिमभरा है. न्यायाधीश न्यायमूर्ति जगदीश सिंह खेहर तथा न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की पीठ ने केईएम अस्पताल, मुंबई के चिकित्सा बोर्ड की रपट का अध्ययन करने के बाद कहा, "हम गर्भवती महिला को कानून के अनुसार, गर्भपात कराने की स्वतंत्रता का निर्देश प्रदान करते हैं." सात चिकित्सकों के एक दल द्वारा तैयार की गई रपट न्यायालय के शुक्रवार के उस आदेश के बाद आई है, जिसमें न्यायालय ने गर्भवती महिला की जांच करने और उसकी उस याचिका पर अपनी राय व्यक्त करने के लिए कहा था, जिसमें उसने 24 सप्ताह के गर्भ का गर्भपात करने के लिए निर्देश देने की मांग की थी. 22-24 सप्ताह के भ्रूण में गंभीर जन्मजात विकृतियों की ओर इशारा करते हुए चिकित्सा बोर्ड की रपट में कहा गया है कि भ्रूण में खोपड़ी नहीं है और साथ ही पेट का ऊपरी हिस्सा भी नहीं है, जिससे लीवर, आंत व पेट तैर रहे हैं. इसके अलावा, भ्रूण में कई गंभीर जन्मजात विकृतियां हैं, जिसके कारण 24 सप्ताह के गर्भ के गर्भपात को मंजूरी दी गई और यह उस रपट का हिस्सा बना, जिसके मुताबिक भ्रूण में गंभीर विसंगतियों के कारण यह मां के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जोखिमभरा है. उन्होंने कहा कि 20 सप्ताह तथा 24 सप्ताह तक के गर्भ को तभी गिराया जा सकता है, जब उससे मां की जान को खतरा हो. 20 सप्ताह से ऊपर के गर्भ के गर्भपात पर रोक है, क्योंकि चिकित्सा शास्त्र के मुताबिक, 22 से 24 सप्ताह में जीवन अस्तित्व में आता है. चिकित्सा रपट का हवाला देते हुए महान्यायवादी ने कहा कि न्यायालय में मामले को अधिनियम की धारा 54 के तहत कवर किया गया था.