Women Reservation Bill Rahul Gandhi: मनुस्मृति में महिलाओं-दलितों के बारे में क्या लिखा, जिसे लेकर BJP पर फायर हुए राहुल गांधी?
Women Reservation Bill Rahul Gandhi: संसद में महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने मनुस्मृति का जिक्र कर भाजपा पर हमला बोला है. उनका आरोप है कि बीजेपी मनुवाद पर काम कर रही है.

- राहुल गांधी ने महिला आरक्षण बिल को मनुवाद से जोड़ा.
- मनुस्मृति महिलाओं को पितृसत्ताधीन और अविकसित बताती है.
- दलितों और पिछड़ों के अधिकार और शिक्षा पर प्रतिबंध का जिक्र.
- मनुस्मृति में शूद्रों की सेवा और दंड के कठोर प्रावधान.
Women Reservation Bill Rahul Gandhi: भारतीय लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर यानी संसद में जब महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक बिल पर बहस छिड़ी, तो राजनीति के केंद्र में 'मनुस्मृति' का नाम अचानक गूंजने लगा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भाजपा पर सीधा आरोप लगाया कि उनकी सरकार महिलाओं और पिछड़ों के अधिकारों के खिलाफ 'मनुवाद' का एजेंडा चला रही है. लेकिन आखिर मनुस्मृति में ऐसा क्या लिखा है, जो सदियों बाद भी भारतीय राजनीति में आग सुलगाने का काम करता है? आइए, तथ्यों के आधार पर समझते हैं महिलाओं और दलितों से जुड़ी उन विवादित बातों को और यह भी जानें कि राहुल गांधी ने ऐसा क्यों कहा.
राहुल गांधी का संसद में तीखा प्रहार
लोकसभा में नारी शक्ति वंदन विधेयक पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने सरकार की नीयत पर गंभीर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि यह बिल महिलाओं को अधिकार देने के बजाय दलितों और पिछड़ों के राजनीतिक वजूद को खत्म करने की साजिश है. उन्होंने दावा किया कि सरकार अपनी घटती ताकत से डर रही है और चुनावी नक्शे को बदलने के लिए इस कानून का इस्तेमाल कर रही है. उनके भाषण का सबसे बड़ा हमला भाजपा की वैचारिक जड़ों पर था, जिसे उन्होंने मनुस्मृति की सोच से जोड़ा. आइए जानें कि मनुस्मृति में महिलाओं और दलितों के बारे में क्या लिखा है.
मनुस्मृति में महिलाओं की स्वतंत्रता पर बेड़ियां
राहुल गांधी के आरोपों के केंद्र में मनुस्मृति की वे बातें हैं जो महिलाओं की आजादी पर सवाल उठाती हैं. मनुस्मृति के पांचवें अध्याय के 148वें श्लोक में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि एक महिला को कभी भी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए. बचपन में उसे पिता के, जवानी में पति के और बुढ़ापे में अपने बेटों के संरक्षण या दया पर निर्भर रहना चाहिए. यह प्राचीन ग्रंथ महिलाओं की स्वायत्तता को पूरी तरह खारिज करता है, जो आधुनिक लोकतंत्र और समानता के अधिकारों के बिल्कुल विपरीत है.
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महिलाओं के स्वभाव और चरित्र पर विवादित टिप्पणी
मनुस्मृति में महिलाओं के स्वभाव को लेकर भी अत्यंत आपत्तिजनक बातें लिखी गई हैं. ग्रंथ के 15वें नियम में दावा किया गया है कि महिलाओं का मन चंचल होता है और वे हृदयहीन हो सकती हैं, इसलिए पुरुषों को उन पर कड़ी निगरानी रखनी चाहिए. इसके दूसरे अध्याय में कहा गया है कि पुरुषों को बहकाना महिलाओं का जन्मजात स्वभाव है, इसलिए समझदार पुरुषों को उनके आसपास बहुत सतर्क रहना चाहिए. ये बातें आज के युग में न केवल अपमानजनक हैं, बल्कि महिलाओं के सम्मान को गहरी चोट पहुंचाती हैं.
महिला की शादी और शारीरिक बनावट पर भी कड़े नियम
ग्रंथ के तीसरे अध्याय में विवाह को लेकर जो मापदंड तय किए गए हैं, वे भी विवादों का मुख्य कारण हैं. इसमें लिखा है कि पुरुष को ऐसी महिला से शादी नहीं करनी चाहिए जिसकी सेहत खराब रहती हो, जिसके शरीर पर बहुत अधिक या कम बाल हों, या जिसकी आंखें और बाल लाल हों. इसके अलावा, जिन महिलाओं के नाम नदी, पर्वत या सांप जैसे अर्थों पर हों, उन्हें भी विवाह के योग्य नहीं माना गया है. यहां तक कि नीची जाति की महिलाओं के साथ विवाह को लेकर भी कड़े निषेध बताए गए हैं.
भोजन के समय वर्जनाएं
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय के अनुसार, ब्राह्मणों को भोजन ग्रहण करते समय विशेष सावधानी बरतनी चाहिए. नियम कहता है कि भोजन करते वक्त उनकी दृष्टि किसी सूअर, मुर्गे, कुत्ते या किन्नर पर नहीं पड़नी चाहिए. साथ ही, भोजन के दौरान ऐसी महिला को देखना भी वर्जित बताया गया है जो अपने मासिक धर्म (पीरियड्स) के दौर से गुजर रही हो.
विवाह संबंधी निषेध
ग्रंथ के ग्यारहवें श्लोक में बुद्धिमानी से विवाह करने की सलाह देते हुए कहा गया है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसी युवती से विवाह नहीं करना चाहिए जिसका कोई भाई न हो. इसके अलावा, यदि लड़की के पिता की पहचान अज्ञात हो या समाज उन्हें न जानता हो, तो 'पुत्रिका धर्म' (वंश उत्तराधिकार से जुड़े नियम) की जटिलताओं की आशंका के कारण विद्वान पुरुष को ऐसी कन्या से विवाह करने से बचना चाहिए.
मनुस्मृति में शूद्रों और दलितों के प्रति कठोर नजरिया
मनुस्मृति में तत्कालीन शूद्रों (जिन्हें आज दलित और पिछड़ा वर्ग कहा जाता है) के लिए जो नियम लिखे गए हैं, वे मानवता को शर्मसार करने वाले हैं. इसमें कहा गया है कि शूद्र का जन्म केवल ब्राह्मणों और उच्च वर्णों की सेवा के लिए हुआ है. ब्राह्मण को यह अधिकार है कि वह किसी भी शूद्र को गुलामी के लिए मजबूर कर सके, चाहे वह खरीदा गया हो या नहीं. इस ग्रंथ के अनुसार, सेवा करना ही शूद्र का एकमात्र धर्म है और इसे न मानने पर उन्हें कठोर दंड देने का विधान है.
दलितों को शिक्षा और ज्ञान से पूरी तरह वंचित रखना
ज्ञान के अधिकार को लेकर मनुस्मृति का रुख बहुत सख्त है. इसमें शूद्रों को वेदों के अध्ययन या किसी भी प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने से स्पष्ट रूप से रोका गया है. ऐतिहासिक रूप से इस ग्रंथ का हवाला देकर यह कहा जाता रहा है कि यदि कोई शूद्र वेद के मंत्र सुन ले, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल देना चाहिए. शिक्षा पर इस तरह का प्रतिबंध लगाने का उद्देश्य दलित समाज को मानसिक और सामाजिक रूप से हमेशा गुलाम बनाए रखना था.
संपत्ति और सामाजिक बहिष्कार का कानून
आर्थिक अधिकारों के मामले में भी मनुस्मृति दलितों के खिलाफ खड़ी नजर आती है. इसमें प्रावधान है कि शूद्रों के पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होनी चाहिए. एक ब्राह्मण जब चाहे शूद्र के धन पर अधिकार कर सकता है, क्योंकि वह उसका स्वामी माना गया है. सामाजिक स्तर पर भी उन्हें अछूत और तुच्छ दिखाने के लिए उनके नाम अपमानजनक रखने की बात कही गई है. उन्हें उच्च वर्ण के लोगों के साथ बैठने या समान भोजन करने की अनुमति नहीं दी गई है.
अपमान और सजा के बर्बर प्रावधान
यदि कोई शूद्र किसी उच्च वर्ण के व्यक्ति का अपमान करता है, तो मनुस्मृति में उसके लिए अत्यंत क्रूर शारीरिक दंड बताए गए हैं. इसमें जीभ काट लेना, शरीर के अंगों को भंग कर देना या सरेआम प्रताड़ित करना जैसे नियमों का उल्लेख है. यही वो वजह है जिससे आज का आधुनिक भारत और बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान को मानने वाला समाज मनुस्मृति को पूरी तरह नकारता है.
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