TMC Crisis: भारत के चुनाव आयोग द्वारा 17-18 सितंबर 2026 को पार्टी का नाम और उसके चुनाव चिह्न को फ्रीज करने का अंतरिम आदेश जारी करने के बाद तृणमूल कांग्रेस एक बड़े आंतरिक संकट का सामना कर रही है. रिपोर्ट्स के मुताबिक ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 टीएमसी विधायकों ने बगावत कर दी है जिससे पार्टी और उसके चुनाव चिह्न पर कंट्रोल को लेकर लड़ाई शुरू हो गई है. इस स्थिति की तुलना महाराष्ट्र में पहले शिवसेना और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी में हुए राजनीतिक संकटों से की जा रही है. दोनों ही मामलों में विरोधी गुटों के बीच इस बात को लेकर लड़ाई हुई कि कौन सा गुट असली पार्टी का प्रतिनिधित्व करता है.

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शिवसेना मामले में क्या हुआ था? 

शिवसेना संकट जून 2022 में शुरू हुआ जब वरिष्ठ नेता एकनाथ शिंदे ने 40 से ज्यादा विधायकों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी. इस बगावत की वजह से महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई. इसके बाद शिंदे ने भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाई और मुख्यमंत्री बने. 

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यह विवाद आखिरकार चुनाव आयोग तक पहुंचा. फरवरी 2023 में आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना के रूप में मान्यता दी. इसमें उस गुट का समर्थन करने वाले विधायकों के बहुमत को मुख्य आधार बनाया गया. पारंपरिक धनुष-बाण चिह्न और शिवसेना का नाम शिंदे गुट को सौंप दिया गया. 

किसी के साथ उद्धव ठाकरे के गुट को एक नया नाम शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और जलती हुई मशाल चिह्न दिया गया. 

एनसीपी में विभाजन कैसे हुआ?

एनसीपी को भी जुलाई 2023 में इसी तरह के संकट का सामना करना पड़ा था. अजीत पवार ने अपने चाचा और पार्टी के संस्थापक शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी थी और पार्टी के ज्यादातर विधायकों को अपने साथ ले गए थे. अजीत पवार और उनका समर्थन करने वाले विधायक शिंदे भाजपा सरकार में शामिल हो गए और अजीत पवार उपमुख्यमंत्री बने.

फरवरी 2024 में चुनाव आयोग ने इस विवाद में भी उसी तरह का तरीका अपनाया. क्योंकि ज्यादातर विधायकों ने अजित पवार का समर्थन किया इस वजह से उनके गुट को असली एनसीपी के रूप में मान्यता दी गई.

टीएमसी के मामले में स्थिति कैसे मिलती-जुलती है? 

टीएमसी के मौजूदा विवाद में भी कुछ ऐसी ही बात है. पार्टी के संगठन, नेतृत्व और पारंपरिक चुनाव चिह्न पर अधिकार को लेकर पार्टी के अंदर ही एक बड़ा झटका या फिर बगावत हो गई है. 

इस वजह से मुख्य मुद्दा सिर्फ यह नहीं है कि बगावत हुई है या नहीं. बल्कि यह है कि कौन सा गुट लागू चुनाव नियम और पार्टी के संविधान के तहत अपना दावा साबित कर सकता है. महाराष्ट्र के मामले से पता चलता है कि पार्टी के अंदर बंटवारे के कारण असली पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न एक गुट को मिल सकता है. इसी के साथ दूसरे गुट को किसी दूसरे नाम और चुनाव चिह्न के साथ काम करना पड़ सकता है. 

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ममता बनर्जी के पास क्या विकल्प हैं?

सबसे पहला विकल्प यह है कि अंतरिम फैसले को अदालत में चुनौती दी जाए. इसमें कानूनी रास्ते के आधार पर हाईकोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट शामिल हो सकते हैं. एक संभावित तर्क टीएमसी के संविधान और उसके पदाधिकारियों के कार्यकाल से जुड़ा हो सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पार्टी के संविधान में कहा गया है कि उनका कार्यकाल 2027 तक मान्य है. 

इसी के साथ एक और संभावना यह है कि पार्टी के नए अंतरिम नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल करके चुनाव लड़ा जाए. यह उद्धव ठाकरे और शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट द्वारा अपनाए गए रास्ते जैसा ही होगा.

मौजूदा राजनीतिक चर्चा में एक तीसरा तरीका कांग्रेस के साथ मजबूत रिश्ता बनाना है. इसमें चुनावी गठबंधन से लेकर संभावित विलय तक शामिल हो सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक अगर टीएमसी कार्यकर्ता कांग्रेस की तरफ आकर्षित हो जाते हैं तो यह मजबूत गठबंधन टीएमसी लीडरशिप को संगठनात्मक विवाद से निपटते हुए अपने राजनीतिक आधार का कुछ हिस्सा बचाए रखने में मदद कर सकता है.

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