वाइन और व्हिस्की के शौकीन लोगों ने अक्सर देखा होगा कि महंगी और प्रीमियम शराब को हमेशा लकड़ी के बड़े-बड़े डिब्बों यानी बैरल में भरकर सालों-साल स्टोर किया जाता है. बहुत से लोग सोचते हैं कि यह सिर्फ एक परंपरा है या दिखावे का तरीका है. हालांकि, वाइन और व्हिस्की बनाने की कला में लकड़ी के इन बैरल का बहुत बड़ा वैज्ञानिक महत्व है.
वाइनरी और डिस्टिलरी विशेषज्ञों के अनुसार, लकड़ी के बैरल में शराब रखने से उसकी गुणवत्ता, स्वाद और रंग में भारी बदलाव आता है. आइए जानते हैं कि शराब को कांच या प्लास्टिक के बजाय लकड़ी के बैरल में रखने के पीछे क्या बड़ी वजहें हैं.
लकड़ी में होता है माइक्रो-ऑक्सीजनेशन
कांच की बोतलें या स्टील के टैंक पूरी तरह से एयरटाइट होते हैं, जिससे उनके अंदर हवा बिल्कुल नहीं जा सकती. इसके विपरीत, ओक की लकड़ी से बने बैरल में बहुत ही बारीक और अदृश्य छेद होते हैं. इन सूक्ष्म छेदों के जरिए बेहद सीमित और नियंत्रित मात्रा में ऑक्सीजन बैरल के अंदर पहुंचती रहती है. इसे विज्ञान की भाषा में माइक्रो-ऑक्सीजनेशन कहा जाता है. ऑक्सीजन की यह हल्की सी मात्रा शराब के साथ मिलकर एक रासायनिक प्रक्रिया करती है, जिससे शराब का कड़वापन और तीखा स्वाद कम हो जाता है. यह प्रक्रिया शराब को अधिक मखमली, मुलायम और पीने योग्य बनाती है.
शराब को मिलता है अनोखा स्वाद और महक
लकड़ी का बैरल सिर्फ शराब को रखने का साधन नहीं है, बल्कि यह एक प्राकृतिक स्वाद बढ़ाने वाले तत्व के रूप में काम करता है. ओक की लकड़ी में प्राकृतिक रूप से वैनिलिन और टैनिन जैसे तत्व पाए जाते हैं. जब शराब कई साल तक इन बैरल के संपर्क में रहती है तो लकड़ी के ये गुण धीरे-धीरे शराब में घुल जाते हैं. इसकी वजह से वाइन और व्हिस्की में वैनिला, दालचीनी, कैरेमल, नारियल और हल्की सी धुएं जैसी शानदार महक और स्वाद आ जाता है, जो इसके दाम को बहुत बढ़ा देता है.
बदल जाता है शराब का रंग और गाढ़ापन
शुरुआत में जब व्हिस्की या वाइन को तैयार किया जाता है तो वह बिल्कुल पानी जैसी साफ दिखती है. उसे उसका खूबसूरत सुनहरा या गहरा लाल रंग बैरल के अंदर ही मिलता है. लकड़ी के तंतुओं के साथ लगातार संपर्क में रहने के कारण शराब धीरे-धीरे उस रंग को सोख लेती है. इसके साथ ही, सालों तक बैरल में रहने के दौरान शराब का कुछ हिस्सा वाष्पित होकर बाहर निकल जाता है, जिसे वाइन इंडस्ट्री में एंजल्स शेयर कहा जाता है. पानी और अल्कोहल के इस तरह कम होने से बची हुई शराब काफी गाढ़ी और प्रीमियम हो जाती है.
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अवांछित तत्वों को सोख लेता है चारकोल
बैरल बनाने की प्रक्रिया के दौरान, लकड़ी के डिब्बों को अंदर से आग की लपटों से हल्का सा जलाया जाता है, जिसे टोस्टिंग या चारिंग कहते हैं. ऐसा करने से बैरल के अंदर की परत पर प्राकृतिक चारकोल की एक पतली लेयर बन जाती है. यह चारकोल एक बेहतरीन फिल्टर की तरह काम करता है. शराब में मौजूद कई तरह के अवांछित सल्फर यौगिक और कड़वे तत्व इस चारकोल की परत द्वारा सोख लिए जाते हैं. यही वजह है कि कांच के बड़े बर्तनों के बजाय दुनिया भर के बड़े ब्रांड्स आज भी सदियों पुरानी लकड़ी के बैरल वाली तकनीक पर ही सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं.
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