अंतरिक्ष की गहराइयों की सैर करना जितना रोमांचक है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक है वहां से सुरक्षित तौर से धरती पर लौटकर आना. जब कोई अंतरिक्ष यान धरती के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करता है तो उसकी रफ्तार और तापमान बेहद जानलेवा होते हैं. इस चुनौती से निपटने के लिए दुनिया की दो सबसे बड़ी अंतरिक्ष शक्तियों अमेरिका और रूस ने बिल्कुल अलग रास्ते चुने हैं. जहां नासा के यान हमेशा समंदर पानी में उतरते हैं तो वहीं रूस के कैप्सूल सूखी जमीन पर उतरते हैं. इसके पीछे दोनों देशों का भूगोल और विज्ञान काम करता है.

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भगोल ने तय किया लैंडिंग का रास्ता

दोनों देशों की लैंडिंग में बड़ा अंतर होने की मुख्य वजह उनका अपना भूगोल और संसाधनों की उपलब्धता है. रूस क्षेत्रफल के लिहाज से दुनिया का सबसे बड़ा देश है, जिसके पास साइबेरिया जैसे हजारों किलोमीटर में फैले विशाल और बेहद कम आबादी वाले मैदानी इलाके मौजूद हैं. ऐसे खाली मैदानों में अंतरिक्ष यान को उतारने से किसी भी आबादी वाले क्षेत्र को कोई खतरा नहीं रहता है. वहीं दूसरी ओर अमेरिका के पास रूस की तरह से विशालकाय और पूरी तरह से खाली मैदान नहीं हैं. इसलिए अमेरिका ने अपनी सुरक्षा रणनीति के तहत यान को खुले पानी यानि समंदर में उतारना ज्यादा बेहतर समझा.

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लॉन्च पैड की स्थिति

अंतरिक्ष यानों की लैंडिंग का सीधा कनेक्शन उनके लॉन्च होने की जगह से भी जुड़ा हुआ है. अमेरिका के ज्यादातर स्पेस सेंटर, जैसे कि फ्लोरिडा का केप कैनावेरल, समंदर के ठीक किनारे बने हुए हैं. अब रॉकेट को हमेशा धरती को घूमने की दिशा में यानि कि पूर्व की तरफ लॉन्च किया जाता है. इससे उसे करीब 1000 मील प्रति घंटे की अतिरिक्त रफ्तार प्राकृतिक रूप से मिल जाती है. अमेरिका के पूर्व मे अटलांटिक महासागर है, इसलिए लौटते वक्त यान सीधे पानी में गिरता है. वहीं रूस का मुख्य लॉन्च पैड बैकोनूर कॉस्मोड्रोम कजाकिस्तान के शुष्क मैदानी इलाके में है, जिसके चारों ओर सिर्फ जमीन ही जमीन है.

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कैसे काम करती है स्पलैशडाउन तकनीक?

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने शुरुआती मरकरी, जेमिनी और अपोलो मिशन से ही स्प्लैशडाउन यानि कि समंदर में लैंडिंग की तकनीक को अपनाया है. विज्ञान का नियम कहता है कि जब कोई बहुत भारी चीज बहुत तेजी से नीचे की ओर गिरती है तो पानी उस झटके को अपने अंदर सोख लेता है. इससे यान के अंदर बैठे यात्रियों को जमीन के मुकाबले काफी कम झटका लगता है. हालांकि समंदर में लैंडिंग के बाद अंतरिक्ष यात्रियों और कैप्सूल को सुरक्षित बाहर निकालने का काम नासा को नौसेना के बड़े जहाजों, हेलीकॉप्टरों और गोताखोरों की एक बड़ी टीम तैयार करनी होती है.

रूस जमीन पर कैसे कराता है लैंडिंग?

समंदर के विपरीत, रूस ने शुरुआत से जमीन पर यान उतारने की तकनीक को विकसित किया था. साल 1961 में दुनिया के पहले अंतरिक्ष यात्री यूरी गागरिन ने भी पैराशूट की मदद से रूसी जमीन पर ही लैंडिंग की थी, जबकि उसके कुछ हफ्ते के बाद अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री एलन शेफर्ड समंदर में उतरे थे. रूस के सोयूज कैप्सूल जब नीचे आते हैं, तो बड़े-बड़े पैराशूट उसकी रफ्तार को कम कर देते हैं. जमीन पर छूने से ठीक कुछ सेकेंड्स पहले ही कैप्सूल के निचले हिस्से में लगे छोटे रॉकेट थ्रस्टर्स एक्टिव हो जाते हैं, जो कि नीचे गिरने की रफ्तार को एकदम कम कर देते हैं, ताकि यात्रियों को चोट न लगे.

आधुनिक स्पेसक्राफ्ट में सुरक्षा के इंतजाम

आज के दौर में अंतरिक्ष विज्ञान पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा आधुनिक और सुरक्षित हो चुका है. अब स्पेसक्राफ्ट में एक नहीं, बल्कि कई तरह के बैकअप सिस्टम लगे होते हैं. अगर मेन पैराशूट न खुले, तो इमरजेंसी पैराशूट अपने आप ही खुल जाता है. कंप्यूटर पूरी तरह से ऑटोमैटिक कंट्रोल पर काम करते हैं, जो कि अंतिम समय में भी सुरक्षित लैंडिंग की जगह बदल सकते हैं. चाहे पानी में उतरना हो या फिर सूखी जमीन पर, दोनों ही तकनीकों का एकमात्र मकसद अंतरिक्ष यात्रियों की जान की रक्षा करना होता है.

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