आप प्लेटफॉर्म पर खड़े हैं और अनाउंसमेंट हो चुकी है, घड़ी समय बता रही है, लेकिन ट्रेन नहीं आ रही. इन्क्वायरी पर पूछने पर जवाब मिलता है कि ट्रेन आउटर पर खड़ी है. तभी नजर जाती है कि स्टेशन पर एक-दो प्लेटफॉर्म खाली भी पड़े हैं, फिर सवाल उठता है कि जब जगह खाली है तो ट्रेन दूसरे प्लेटफॉर्म पर क्यों नहीं लाई जा रही? क्या यह लापरवाही है या इसके पीछे कोई तय नियम काम करता है? आइए समझते हैं.
आउटर सिग्नल क्या होता है?
रेलवे स्टेशन से कुछ दूरी पहले जो सिग्नल लगा होता है, उसे आउटर सिग्नल कहा जाता है. जब ट्रेन को स्टेशन के अंदर आने की अनुमति नहीं मिलती, तो उसे इसी सिग्नल के पास रोका जाता है. यात्रियों को अक्सर यही बताया जाता है कि ट्रेन आउटर पर खड़ी है. यह रोक बिना वजह नहीं होती है. इसके पीछे स्टेशन प्रबंधन, सिग्नलिंग सिस्टम और तय शेड्यूल की अहम भूमिका होती है.
हर ट्रेन का तय प्लेटफॉर्म
भारतीय रेलवे में ज्यादातर ट्रेनों के लिए एक तय प्लेटफॉर्म निर्धारित रहता है. यह फैसला पहले से बने टाइम टेबल, रूट, आगे की लाइन क्लियरेंस और ऑपरेशन प्लान के आधार पर किया जाता है. मान लीजिए किसी स्टेशन पर प्लेटफॉर्म नंबर 3 किसी खास एक्सप्रेस ट्रेन के लिए तय है. अगर उसी समय उस प्लेटफॉर्म पर दूसरी ट्रेन खड़ी है या लेट है, तो अगली ट्रेन को अंदर नहीं लाया जाएगा. भले ही प्लेटफॉर्म नंबर 1 या 2 खाली क्यों न दिख रहे हों.
खाली प्लेटफॉर्म होने पर भी रुकावट क्यों?
यात्रियों को अक्सर लगता है कि जब दूसरा प्लेटफॉर्म खाली है तो ट्रेन को वहीं लगा देना चाहिए, लेकिन रेलवे ऑपरेशन इतना आसान नहीं होता है.
पहला कारण है- लाइन और ट्रैक का कनेक्शन. हर प्लेटफॉर्म हर दिशा से आने वाली ट्रेन के लिए सीधे जुड़ा नहीं होता है. कई बार जिस ट्रैक से ट्रेन आ रही है, वह सिर्फ तय प्लेटफॉर्म से ही जुड़ा होता है.
दूसरा कारण है- सिग्नलिंग और सुरक्षा. सिग्नल तभी हरा होता है जब आगे का रास्ता पूरी तरह क्लियर हो. अगर प्लेटफॉर्म बदला जाए तो नए रूट की सेटिंग, पॉइंट्स बदलना और सिग्नल क्लियर करना पड़ता है, जिसमें समय और सावधानी दोनों लगती हैं.
तीसरा कारण है- पहले से लगी हुईं ट्रेनें. एक प्लेटफॉर्म पर ट्रेन बदल देने से पूरे स्टेशन का टाइम टेबल बिगड़ सकता है. इससे दूसरी ट्रेनों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है.
यात्रियों के लिए असुविधा
रेलवे स्टेशन पर हर मिनट कई गतिविधियां साथ चलती हैं- जैसे- आगमन, प्रस्थान, शंटिंग, मालगाड़ी की मूवमेंट और क्रॉसिंग. स्टेशन मास्टर और कंट्रोल रूम पूरे नेटवर्क को ध्यान में रखकर फैसला लेते हैं. अगर किसी ट्रेन को दूसरे प्लेटफॉर्म पर शिफ्ट किया जाए तो यात्रियों को जानकारी देना, अनाउंसमेंट बदलना और सुरक्षा इंतजाम भी तुरंत करने पड़ते हैं. इसलिए जब तक बहुत जरूरी न हो, तय प्लेटफॉर्म ही इस्तेमाल किया जाता है.
सुरक्षा और सिस्टम
यात्रियों के लिए ट्रेन का आउटर पर रुकना निराशाजनक जरूर होता है. खासकर तब, जब वे खिड़की से खाली प्लेटफॉर्म देखते हैं, लेकिन यह फैसला सुरक्षा और पूरे सिस्टम की सुचारू संचालन को ध्यान में रखकर लिया जाता है. रेलवे का नेटवर्क विशाल है और हर छोटी गलती बड़ी देरी का कारण बन सकती है. इसलिए कई बार दिखने वाली खाली जगह असल में ऑपरेशन के लिहाज से उपलब्ध नहीं होती.
यह भी पढ़ें: सिर्फ 1.89 रुपये बढ़ा RPF जवानों का राशन भत्ता, जानें आजादी के वक्त कितना था यह?