India Iran Relations: ऐसे समय में जब ईरान में अयातुल्ला अली खामेनेई के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध चल रहा है और अमेरिका तेहरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर नए आर्थिक प्रतिबंध के चेतावनी दे रहा है भारत ने एक ऐसे प्रोजेक्ट पर राजनयिक जुड़ाव बढ़ा दिया है जिसे वह रणनीतिक रूप से गैर समझौता योग्य मानता है. यह प्रोजेक्ट है चाबहार बंदरगाह. इस मामले में भारत कूटनीतिक सक्रियता दिख रहा है. भारत अमेरिका से छूट को लेकर बात कर रहा है और साथ ही दूसरे विकल्पों पर भी विचार विमर्श कर रहा है. आइए जानते हैं कि भारत के लिए ईरान का चाबहार पोर्ट इतना जरूरी क्यों है और अब तक इस पर कितना खर्च हो चुका है.
एक ऐसा रास्ता जो पाकिस्तान को पूरी तरह से बाईपास करता है
भारत के लिए यह बंदरगाह इसलिए जरूरी है क्योंकि यह पाकिस्तान को पूरी तरह से समीकरण से बाहर कर देता है. क्योंकि पाकिस्तान ने लगातार भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक जमीनी रास्ता देने से इनकार किया है इस वजह से यह बंदरगाह भारत को ईरान के रास्ते से इन क्षेत्रों तक सीधा समुद्री और जमीनी रास्ता देता है. चाबहार पोर्ट से भारतीय सामान अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक बिना किसी परेशानी के पहुंच सकता है.
यूरोप और रूस तक तेज और सस्ता रास्ता
चाबहार पोर्ट अंतरराष्ट्रीय उत्तर दक्षिण परिवहन गलियारे का एक बड़ा रास्ता है जो भारत को ईरान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप से जोड़ता है. इस रास्ते से यूरोप तक कार्गो यात्रा का समय लगभग 15 दिन कम किया जा सकता है. इसी के साथ लॉजिस्टिक्स लागत भी 30% तक कम हो सकती है. इतना ही नहीं बल्कि भारतीय एक्सपोर्ट और इंपोर्ट के लिए यह वैश्विक व्यापार में कॉम्पटीशन में भी काफी सुधार करता है.
अफगानिस्तान के लिए जीवन रेखा
भारत पहले इस पोर्ट का इस्तेमाल मानवीय गलियारे के रूप में कर चुका है. अफगानिस्तान भेजे गए खाने के सामान, दवाएं और राहत सामग्री इसी रास्ते से गुजरी हैं. ऐसा तालिबान के कब्जे के बाद किया गया था जब पारंपरिक आपूर्ति मार्ग बंद हो गए थे. इससे भारत तालिबान सरकार को औपचारिक राजनीतिक मान्यता दिए बिना भी लोगों से लोगों के संबंध और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने में कामयाब रहा.
भारत ने अब तक इस पोर्ट पर कितना खर्च किया
इस पोर्ट के लिए भारत की वित्तीय प्रतिबद्धता काफी ज्यादा बड़ी और लंबे समय की है. भारत की कुल प्रतिबद्धता लगभग 500 मिलियन डॉलर है. इसमें पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर, उपकरण और ऑपरेशनल डेवलपमेंट शामिल हैं. भारत ने अपना 120 मिलियन डॉलर का मुख्य निवेश पूरी तरह से चुका दिया है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से मोबाइल हार्बर क्रेन, कार्गो हैंडलिंग उपकरण लगाने और पोर्ट के आधुनिकीकरण के लिए किया गया. इसी के साथ 2024 में भारत और ईरान ने 10 साल का लंबा ऑपरेशन समझौता किया. इस समझौते के तहत भारत आने वाले सालों में क्षमता बढ़ाने और बिना किसी रूकावट के संचालन सुनिश्चित करने के लिए 370 मिलियन डॉलर का निवेश करने की योजना बना रहा है.
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