Hindu Demands Pooja In Qutub Minar: दिल्ली की कुतुब मीनार में पूजा करने की अनुमति क्यों मांग रहे हिंदू? जानें इसका इतिहास
Hindu Demands Pooja In Qutub Minar: दिल्ली की कुतुब मीनार में पूजा की मांग तेज हो गई है. हिंदुओं का दावा है कि परिसर में स्थित लौह स्तंभ को 27 मंदिरों को तोड़कर बनाया गया था. आइए इसका इतिहास जानें.

- लौह स्तंभ राजा अनंगपाल के विष्णु मंदिर का हिस्सा था.
Hindu Demands Pooja In Qutub Minar: देश की राजधानी दिल्ली में स्थित ऐतिहासिक कुतुब मीनार एक बार फिर कानूनी और धार्मिक विवादों के केंद्र में आ गई है. मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक भोजशाला में पूजा-अर्चना की कानूनी अनुमति मिलने के बाद से हिंदू संगठनों का हौसला बढ़ गया है. अब इसी तर्ज पर कुतुब मीनार परिसर के भीतर भी पूजा करने के अधिकार को लेकर एक नई कानूनी लड़ाई की जमीन तैयार की जा रही है. हिंदू समाज का दावा है कि इस पूरे परिसर का इतिहास और इसकी एक-एक दीवार प्राचीन भारतीय संस्कृति और मंदिरों के ध्वंस की गवाही दे रही है. आइए जानते हैं कि आखिर क्यों इस ऐतिहासिक इमारत में पूजा की मांग की जा रही है.
क्या कहता है कुतुब मीनार का इतिहास?
कुतुब मीनार परिसर का विवाद बहुत पुराना है और इससे पहले दिल्ली की साकेत कोर्ट इस परिसर में पूजा करने की अनुमति देने से इनकार कर चुकी है. लेकिन हिंदू संगठनों का तर्क है कि इस पूरे परिसर में आज भी प्राचीन हिंदू देवी-देवताओं की सैकड़ों खंडित मूर्तियां साफ देखी जा सकती हैं. इतिहासकारों और जानकारों के मुताबिक, कुतुब मीनार परिसर में जो प्रसिद्ध लौह स्तंभ खड़ा है, वह असल में राजा अनंगपाल द्वारा बनवाए गए एक विशाल विष्णु मंदिर का मुख्य हिस्सा था. इसी वजह से हिंदू समाज द्वारा सदियों से इसे मूल रूप से विष्णु स्तंभ माना जाता रहा है.
सत्ताईस मंदिरों को तोड़ने का सच
लौह स्तंभ के ठीक बगल में एक ऐसा विवादित ढांचा खड़ा है, जिसे इतिहास में 'कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद' का नाम दिया गया था. हिंदू संगठनों का आरोप है कि इस ढांचे का निर्माण 27 भव्य हिंदू और जैन मंदिरों को पूरी तरह से तहस-नहस करके किया गया था. इस दावे को मजबूती कुतुब मीनार परिसर के मुख्य प्रवेश द्वार पर लगा वह प्राचीन शिलालेख देता है, जिस पर साफ तौर पर लिखा है कि इस मस्जिद को बनाने के लिए 27 जैन और हिंदू मंदिरों को तोड़ा गया था. आज भी इस इमारत के खंभों पर मंदिर स्थापत्य की कलाकृतियां दिखाई देती हैं.
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पर्यटकों की आहत होती भावनाएं
इस विवादित ढांचे की दीवारों और स्तंभों में आज भी कई जगहों पर हिंदू देवी-देवताओं की प्राचीन मूर्तियां लगी हुई हैं. परिसर के भीतर कहीं भगवान विष्णु की सुंदर प्रतिमा दिखाई देती है, तो कहीं माता पार्वती अपनी गोद में बाल गणेश को लिए हुए नजर आती हैं. सबसे ज्यादा विवाद इस बात पर है कि ढांचे के पिछले हिस्से में भगवान गणेश की एक मूर्ति को कथित तौर पर अनादर करने की नीयत से दीवार के बिल्कुल निचले भाग में लगाया गया है. हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने इसे सुरक्षित रखने के लिए कांच के बॉक्स से ढक दिया है, लेकिन इसकी सफाई न होने से पर्यटकों की भावनाएं आहत होती हैं.
चौथी शताब्दी का ऐतिहासिक लौह स्तंभ
कुतुब मीनार परिसर में खड़ा लौह स्तंभ प्राचीन भारतीय विज्ञान और इतिहास का एक बेजोड़ और जीवंत सबूत है. इस स्तंभ पर प्राचीन लिपि में जो बातें लिखी हैं, उन्हें साल 1903 में पूरी तरह से पढ़ा और समझा गया था. दर्ज ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, यह विशाल लौह स्तंभ चौथी शताब्दी का है, जिसे महान राजा चंद्र यानी चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल के समय का माना जाता है. इस स्तंभ के सबसे ऊपरी हिस्से पर एक विशेष छेद बना हुआ है, जिससे विशेषज्ञ यह अंदाजा लगाते हैं कि कभी इसके ऊपर भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ देव की विशाल मूर्ति स्थापित रही होगी.
राजा अनंगपाल लेकर आए थे लौह स्तंभ
इतिहास की कड़ियों को जोड़ें तो यह लौह स्तंभ राजा अनंगपाल द्वारा इस वर्तमान स्थान पर लाया गया था, हालांकि वह इसे मूल रूप से किस जगह से लेकर आए थे, इसके पुख्ता दस्तावेज मौजूद नहीं हैं. लेकिन यह पूरी तरह से साफ है कि उन्होंने यहां जो विष्णु मंदिर बनवाया था, यह स्तंभ उसी के गर्भगृह के सामने स्थापित था. स्तंभ की प्राचीन लिखावट को पढ़ने के बाद सरकार ने 1 जनवरी 1903 को आम जनता की सहूलियत के लिए संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू, इन चार अलग-अलग भाषाओं में इसके अनुवाद वाले शिलालेख परिसर में लगवाए थे जो आज भी वहां मौजूद हैं.
ढाई सौ साल पहले बदल दिया गया था इसका नाम
इस पूरे ऐतिहासिक परिसर के ढांचे को लेकर दावा किया जाता है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने भारतीय मंदिरों को तोड़कर सबसे पहले इसे एक जामा मस्जिद के रूप में तैयार करवाया था. इसके बाद, अब से करीब ढाई सौ साल पहले इसका नाम बदलकर अचानक 'कुतुब-उल-इस्लाम' मस्जिद कर दिया गया था. हिंदू पक्ष का कहना है कि जिस तरह मध्य प्रदेश की भोजशाला में मंदिर होने के अकाट्य प्रमाण मिले हैं, ठीक वैसी ही स्थिति कुतुब मीनार परिसर की भी है. पूरे ढांचे के निचले खंभों और दीवारों पर आज भी खंडित मूर्तियां और गुंबद पर मंदिर शैली की नक्काशी इसके मूल इतिहास को बयां करती हैं.
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