India Oil Imports: भारत अपनी जरूरत के कच्चे तेल का लगभग 85% हिस्सा दूसरे देशों से इंपोर्ट करता है लेकिन इसके बावजूद भी यह पेट्रोलियम उत्पादों का एक बड़ा एक्सपोर्टर है. यह बात काफी अजीब लग सकती है लेकिन इन दोनों गतिविधियों का संबंध तेल उद्योग के अलग-अलग चरणों से हैं. भारत कच्चे तेल का काफी बड़ा उत्पादक नहीं है हालांकि यहां दुनिया की कुछ सबसे बड़ी रिफायनिंग क्षमताएं मौजूद हैं. भारत अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ताओं से कच्चा तेल खरीदता है, उसे अपनी रिफाइनरी में प्रोसेस करता है और फिर पेट्रोल, डीजल और एवियशन फ्यूल जैसे तैयार उत्पादों को विदेशी बाजारों में बेचता है.

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इन दोनों के बीच का अंतर समझना जरूरी है. लगभग 85% इंपोर्ट का संबंध कच्चे तेल की जरूरत से है ना कि तैयार ईंधन से. एक बार जब कच्चा तेल रिफाइनरी में पहुंच जाता है तो उसे प्रोसेस करके घरेलू इस्तेमाल या फिर एक्सपोर्ट के लिए उत्पाद तैयार किया जा सकता है. इस वजह से कच्चे माल का इंपोर्ट करना और तैयार उत्पादों को एक्सपोर्ट करना औद्योगिक गतिविधि के दो हिस्से हैं. 

बड़ी रिफाइनिंग क्षमता एक्सपोर्ट में मददगार 

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भारत के पास दुनिया के सबसे एडवांस्ड और बड़े पैमाने के रिफायनिंग कॉम्प्लेक्स हैं. इनमें गुजरात का जामनगर कॉम्प्लेक्स भी शामिल है. यहां की कुल रिफायनिंग क्षमता, देश की घरेलू खपत से काफी ज्यादा है. रिफाइनरियां न सिर्फ घरेलू ईंधन की जरूरत को पूरा कर सकती हैं बल्कि अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए अतिरिक्त पेट्रोलियम उत्पाद भी बना सकती हैं.

घरेलू मांग पूरी होने के बाद बची हुई क्षमता का इस्तेमाल एक्सपोर्ट के लिए ईंधन बनाने में किया जाता है. हालांकि भारत ज्यादातर कच्चा तेल इंपोर्ट करता है लेकिन वह तेल को रिफाइन करके और उत्पाद बेचकर कमाई करता है. इसी अंतर से पता चलता है कि कैसे कोई देश एक ही समय में कच्चे तेल का बड़ा इंपोर्टर और पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा एक्सपोर्टर हो सकता है. 

आयातित कच्चे माल को मुनाफे वाले उत्पादों में बदलना 

यह प्रक्रिया कुछ वैसे ही है जैसे कच्चा कपास इंपोर्ट करना, उससे कपड़े बनाना और फिर उन तैयार कपड़ों को एक्सपोर्ट करना. भारत खाड़ी देशों, रूस और अमेरिका के आपूर्तिकर्ताओं से कच्चा तेल इंपोर्ट करता है और फिर उसे प्रोसेस करके पेट्रोल, डीजल, नेपथा और एवियशन फ्यूल जैसे उत्पाद तैयार करता है. 

इन रिफाइन किए गए उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उस कच्चे तेल की तुलना में काफी ज्यादा कीमत पर बेचा जा सकता है जिससे यह बनाए गए थे. यह अंतर रिफाइनिंग उद्योग द्वारा की गई प्रोसेसिंग और उसमें जोड़े गए मूल्य को दर्शाता है. इस तरह भारत सिर्फ अपने घरेलू कच्चे तेल के उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय मैन्युफैक्चरिंग के जरिए वैश्विक ऊर्जा व्यापार में हिस्सा ले सकता है. 

रूस से रियायती दरों पर कच्चा तेल और व्यापार मार्जिन 

रूस यूक्रेन संघर्ष के बाद लगाए गए प्रतिबंध के बीच भारत ने रूस से काफी सस्ते दामों पर कच्चा तेल खरीदा है. सस्ते कच्चे तेल को रिफाइन करके और उससे तैयार ईंधन को अमेरिका और यूरोपीय देशों मैं ऊंची कीमतों पर बेचकर भारतीय रिफाइनर अच्छी खासी ट्रेडिंग मार्जिन कमा सकते हैं. यह मार्जिन कच्चे तेल की लागत और रिफाइन किए गए उत्पादों से होने वाली कमाई के बीच का अंतर होता है.

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भारी और ज्यादा सल्फर वाले कच्चे तेल को रिफाइन करने की तकनीक 

भारतीय रिफाइनरी के पास भारी और ज्यादा सल्फर वाले कच्चे तेल को रिफाइन करने की तकनीकी क्षमता भी है. ऐसे कच्चे तेल को कभी-कभी डर्टी क्रूड भी कहा जाता है. किसी रिफाइनरी की जटिलता और अलग-अलग तरह के कच्चे तेल को रिफाइन करके ज्यादा मूल्यवान उत्पाद बनाने की इसकी क्षमता को मापने के लिए नेल्सन कॉम्प्लेक्सिटी इंडेक्स का इस्तेमाल किया जाता है. 

भारतीय रिफाइनरी दुनिया के सबसे भारी, सस्ते और ज्यादा सल्फर वाले कच्चे तेल को खरीद सकती हैं और उसे रिफाइन करके यूरो VI ग्रेट जैसे सांप और हाई क्वालिटी वाले इंधन में बदल सकती हैं. इससे उन्हें कम कीमत वाले कच्चे माल का इस्तेमाल करने का मौका मिलता है जबकि वह ऐसे ईंधन तैयार कर पाती हैं जिसकी अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में भारी मांग है.

यही वजह है कि देश के तेल व्यापार को सिर्फ उसके अपने क्षेत्र से निकाले गए कच्चे तेल की मात्रा के आधार पर नहीं आंका जा सकता. हो सकता है कि किसी देश में कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन सीमित हो लेकिन इसके बावजूद भी वह अपनी रिफाइनरी के जरिए अंतरराष्ट्रीय पेट्रोलियम उत्पाद बाजार में एक मजबूत स्थिति बन सकता है.

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