जब हम जमीन पर गाड़ी चलाते हैं, तो रास्ता थोड़ा भटकने पर हम कुछ ही मिनटों में वापस सही राह पर आ जाते हैं. मगर आसमान का गणित इससे बिल्कुल अलग और बेहद क्रूर है. यहां उड़ते हुए एक विशालकाय हवाई जहाज के लिए सटीकता ही सब कुछ होती है. यदि कोई पायलट हवा में विमान को उसके तय रास्ते से सिर्फ 1 डिग्री भी इधर-उधर घुमा देता है, तो यह दिखने वाली छोटी सी मानवीय या तकनीकी भूल पूरी एयरलाइन कंपनी के लिए एक बड़ा फाइनेंशियल लॉस बन जाती है. महज 1 डिग्री का यह मामूली सा फेरबदल लंबी दूरी की उड़ानों में विमान को उसकी मंजिल से सैकड़ों किलोमीटर दूर भटका देता है, जिससे कंपनियों को पल भर में लाखों रुपये की चपत लग जाती है. 

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क्या है 60 में 1 का नियम?

विमानन क्षेत्र के नेविगेशन में इस भटकाव को समझने के लिए 1 in 60 rule का इस्तेमाल किया जाता है. इस गणितीय नियम के अनुसार, यदि कोई विमान अपने रास्ते से सिर्फ 1 डिग्री भटक जाता है और वह उसी दिशा में 60 मील की दूरी तय कर लेता है, तो वह अपने मुख्य मार्ग से पूरे 1 मील दूर जा चुका होता है. लंबी अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में, जहां विमान हजारों मील का सफर तय करते हैं, यह 1 डिग्री की शुरुआती गलती यात्रा के अंत तक विमान को बहुत बड़े अंतर से रास्ते से भटका देती है.

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ईंधन की बेतहाशा बर्बादी

इस भटकाव के कारण कंपनियों को होने वाले नुकसान की सबसे बड़ी वजह अतिरिक्त ईंधन की खपत है. जब विमान 1 डिग्री मुड़कर गलत दिशा में आगे बढ़ जाता है, तो पायलट को बाद में सही रास्ते पर वापस लौटने के लिए विमान को दोबारा मोड़ना पड़ता है. इस सुधार प्रक्रिया में विमान को सैकड़ों किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती है, जिससे टन-के-टन कीमती एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) बिना वजह जल जाता है. महंगा विमान ईंधन सीधे तौर पर कंपनी के परिचालन खर्च को बढ़ा देता है.

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हवाई क्षेत्र का महंगा टैक्स

जब भी कोई अंतरराष्ट्रीय उड़ान हवा में होती है, तो वह कई देशों की सीमाओं के ऊपर से होकर गुजरती है. इसके लिए एयरलाइंस को उन संबंधित देशों को भारी ओवरफ्लाइट फीस या एयर स्पेस फीस चुकाना पड़ता है. यदि रास्ता भटकने के कारण विमान किसी ऐसे देश के हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है जहां का टैक्स बहुत ज्यादा है, या उसे तय दूरी से अधिक समय तक उस देश के ऊपर उड़ना पड़ता है, तो नेविगेशन टैक्स के रूप में कंपनी पर लाखों का अतिरिक्त वित्तीय बोझ आ जाता है.

ट्रैफिक और लेटलतीफी की मार

आसमान में उड़ने वाले हर विमान के लिए एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) द्वारा एक निश्चित समय स्लॉट और एक खास ऊंचाई पहले से ही तय की जाती है. रास्ते में मामूली सा भी बदलाव होने पर विमान अन्य उड़ानों के ट्रैफिक के बीच फंस सकता है. ऐसी स्थिति में एटीसी पायलट को सुरक्षा कारणों से हवा में ही चक्कर काटने का निर्देश दे देता है. इससे उड़ान का समय बढ़ जाता है, जिससे पूरी कनेक्टिंग फ्लाइट्स का शेड्यूल बिगड़ता है और कंपनी को भारी जुर्माना देना पड़ता है.

डाइवर्जन का सबसे बड़ा खर्च

इस भटकाव का सबसे बुरा नतीजा तब सामने आता है जब रास्ते में सुधार करते समय विमान का ईंधन तय सीमा से कम होने लगता है. ऐसी आपातकालीन स्थिति में या खराब मौसम होने पर पायलट को विमान को नजदीकी किसी अन्य हवाई अड्डे पर लैंड कराना पड़ता है. एक बार फ्लाइट डाइवर्ट होने पर एयरलाइन कंपनी को यात्रियों के रहने, खाने-पीने की व्यवस्था करने, उन्हें मुआवजा देने और नए एयरपोर्ट पर लैंडिंग व टेक-ऑफ का लाखों रुपये का अतिरिक्त खर्च अपनी जेब से भरना पड़ता है.

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