यूरोप में इस बार की भीषण गर्मी ने न सिर्फ आम जनजीवन बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाकर रख दिया है. फ्रांस समेत करीब 23 यूरोपीय देशों में रिकॉर्ड-ब्रेकिंग हीटवेव के चलते कई शहरों का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है, जिससे कि अस्पतालों और बिजली ग्रिड पर भारी दबाव देखा गया है. इस जानलेवा तपिश की वजह से वहां पर बड़ी संख्या में मौतें भी हुई हैं. वहीं दूसरी तरफ भारत में तो हर साल गर्मियों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर चला जाता है, फिर भी लोग काफी हद तक सामान्य रहते हैं, जबकि दुबई जैसी जगहों पर परिस्थितियां दूसरी हैं. चलिए जानें कि तीनों में से किस देश में सबसे ज्यादा गर्मी की तपिश फील होगी.
वैश्विक स्तर पर तापमान का बदलता स्वरूप
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो भले ही भारत, दुबई और फ्रांस में थर्मामीटर पर तापमान एक समान यानी 40 डिग्री दिखाई दे, लेकिन इंसानी शरीर को यह तीनों जगहों पर अलग-अलग ही महसूस होगा. 40 डिग्री की इस गर्मी में सबसे खतरनाक और चिलचिलाता हुआ अहसास फ्रांस में देखने को मिलता है, जहां शरीर को करीब 45 से 48 डिग्री जितनी गर्मी फील होती है. इसके मुकाबले दुबई में यह अहसास 42 से 45 डिग्री के आसपास होता है, जबकि भारत में 40 डिग्री तापमान 40 से 42 डिग्री के बीच ही फील होता है.
फ्रांस में इतनी ज्यादा तपिश क्यों?
फ्रांस में इस सूखी और दमघोटू गर्मी का सबसे बड़ा कारण वहां का आर्किटेक्चर और वातावरण है. यूरोप के ज्यादातर हिस्सों में गर्मियों के दिनों में सूरज का एंगल ऐसा होता है कि दिन की रोशनी करीब 15 से 17 घंटे तक बनी रहती है. इतने लंबे समय तक लगातार धूप रहने की वजह से शहरों की कंक्रीट की सड़कें, फुटपाथ और इमारतें दिनभर थर्मल एनर्जी सोखते हैं, जिससे कि रात में भी मौसम ठंडा नहीं होता है. इसके अलावा फ्रांस में हवा की स्पीड पूरी तरह से थम जाने की वजह से गर्म हवा का एक गुब्बारा जैसा बन जाता है, जो कि पसीना सूखने नहीं देता है और इंसानी शरीर का नेचुरल कूलिंग सिस्टम फेल हो जाता है.
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घरों से गर्मी का बाहर न निकल पाना
यूरोप के एतिहासिक शहरों में सदियों से मकानों का निर्माण कड़ाके की ठंड और लंबी सर्दियों को ध्यान में रखकर किया गया है. इनकी दीवारें मोटी इंसुलेशन वाली होती हैं और खिड़कियां छोटी रखी जाती हैं, ताकि घर के अंदर की गर्मी बाहर न जा सके. सर्दियों का यही वरदान गर्मियों में अभिशाप बन गया है, क्योंकि कंक्रीट के ये घर एक बार गर्म होने के बाद अंदर किसी ओवन या तंदूर की तरीके से तपने लगते हैं. इसके ऊपर वहां के लाइफस्टाइल में एयर कंडीशनर और सीलिंग फैन भी कभी बुनियादी जरूरत नहीं रहे, क्योंकि हमेशा वहां सर्दियां ही रहती हैं, जिसकी वजह से अचानक आई इस गर्मी की वजह से निपटने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार ही नहीं है.
दुबई में कैसा महसूस होगी 40 डिग्री की गर्मी?
इसके विपरीत अगर दुबई की बात करें तो वहां की गर्मी काफी शुष्क और सीधी होती है. रेगिस्तानी इलाका होने की वजह से धूप बहुत तीखी होती है और गर्म हवाएं चलती हैं, जिससे सामान्य से अधिक तापमान महसूस होता है. लेकिन दुबई का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर इस मामले में फ्रांस से बहुत बेहतर है. वहां पर हर छोटी-बड़ी इमारत, सार्वजनिक परिवहन, बस स्टॉप और कारें पूरी तरह एयर-कंडीशनिंग से लैस हैं. लोग सीधे इनडोर वातानुकूलित वातावरण में रहते हैं और वहां पर रेगिस्तान की वजह से हमेशा से ऐसी गर्मी होती है, जिससे लोग इतने तापमान में भी नियंत्रण में रहते हैं.
भारत में 40 डिग्री झेलने का अभ्यस्त शरीर
भारतीय भौगोलिक परिस्थिति देखें तो सबसे पहले यहां 40 डिग्री तापमान बहुत सामान्य माना जाता है, क्योंकि हमारे शरीर का बायोलॉजिकल एडप्टेशन मजबूत होता है. बचपन से ही ऐसा मौसम झेलने की वजह से शरीर इसके लिए पूरी तरह से एकलिमटाइज हो जाता है, जिससे दिल की कार्यक्षमता बेहतर बनी रहती है. इसके अलावा भारतीय शहरों की हवा में मौजूद धूल के करण सूरज की तीखी किरणों को बिखने से रोक देते हैं, जिससे धूप का प्रभाव थोड़ा कम हो जाता है. इसके अलावा भारत में सारे मौसम देखने को मिलते हैं, तो ऐसा नहीं है घरों को सिर्फ सर्दी या फिर गर्मी के लिए ही डिजाइन किया जाता है. यहां पर घर हर मौसम के हिसाब से बनते हैं, जिसमें उनकी छतें ऊंची, बरामदे और क्रॉस वेंटिलेशन भी गर्मी को बाहर निकलने के लिए खास तौर पर तैयार किए जाते हैं.
भारत और फ्रांस का मौसम
यूरोप के अंदरूनी हिस्सों में गर्मी के दौरान एक और खतरनाक स्थिति बनती है, जिसे साइलेंट डिहाइड्रेशन कहते हैं. फ्रांस जैसे देशों में गर्मी बहुत सूखी होती है, जिससे शरीर का पसीना सीधे हवा में उड़ जाता है. इसलिए इंसान को यह अंदाजा ही नहीं मिल पाता है कि उसके शरीर से पानी कितनी तेजी से कम हो रहा है, जो कि अचानक ऑर्गन फेलियर का खतरा बनता है. भारत में गर्मी के साथ-साथ उमस भी होती है, जिससे पसीना बहता है और लोगों को पता चलता रहता है. इसलिए वे लगातार पानी पीते रहते हैं और हाइड्रेट रहते हैं, जिससे गंभीर खतरों से बच सकते हैं.
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