जब डॉलर महंगा होता है या रुपया गिरता है, तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर किसी देश की करेंसी की कीमत तय कौन करता है? क्या सरकार एक आदेश से मुद्रा मजबूत या कमजोर कर सकती है, या फिर यह सब बाजार की चाल है? इस पूरी प्रक्रिया के पीछे कई आर्थिक ताकतें काम करती हैं, जिनमें मांग-आपूर्ति से लेकर ब्याज दर और राजनीतिक हालात तक शामिल हैं, लेकिन असल तस्वीर इससे कहीं ज्यादा दिलचस्प है.

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करेंसी की वैल्यू तय करने का असली सिस्टम क्या?

किसी भी देश की मुद्रा का मूल्य सीधे तौर पर बाजार की मांग और आपूर्ति से तय होता है. जब किसी करेंसी की मांग बढ़ती है, तो उसकी कीमत ऊपर जाती है और जब मांग घटती है, तो उसकी वैल्यू गिरने लगती है. विदेशी व्यापार, निवेश और अंतरराष्ट्रीय लेन-देन इस मांग-आपूर्ति को लगातार प्रभावित करते रहते हैं.

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मांग और आपूर्ति क्यों है सबसे अहम?

अगर कोई देश ज्यादा निर्यात करता है, तो विदेशी कंपनियों को उस देश की मुद्रा चाहिए होती है. इससे उस करेंसी की मांग बढ़ती है और कीमत मजबूत होती है. इसके उलट अगर आयात ज्यादा हो, तो विदेशी मुद्रा की जरूरत बढ़ती है और घरेलू करेंसी कमजोर पड़ती है. यही कारण है कि व्यापार संतुलन मुद्रा के लिए बेहद अहम माना जाता है. 

अर्थव्यवस्था की सेहत का असर

मजबूत अर्थव्यवस्था वाली करेंसी पर निवेशकों का भरोसा ज्यादा होता है. अच्छी GDP ग्रोथ, कम महंगाई और बेहतर रोजगार दर किसी भी मुद्रा को मजबूत बनाती है. वहीं, आर्थिक सुस्ती, ज्यादा कर्ज और ऊंची महंगाई करेंसी को कमजोर कर देती है. 

ब्याज दरें क्यों बदल देती हैं खेल?

जब किसी देश में ब्याज दरें ज्यादा होती हैं, तो विदेशी निवेशक वहां निवेश करना पसंद करते हैं. इससे उस देश की मुद्रा की मांग बढ़ती है. यही वजह है कि केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बदलाव कर मुद्रा को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं.

सरकार और केंद्रीय बैंक की भूमिका

हालांकि बाजार अहम भूमिका निभाता है, लेकिन सरकार और केंद्रीय बैंक पूरी तरह बाहर नहीं रहते हैं. भारत में RBI जरूरत पड़ने पर डॉलर खरीदकर या बेचकर रुपये को स्थिर रखने की कोशिश करता है. इसे बाजार में हस्तक्षेप कहा जाता है, ताकि अचानक बड़ी गिरावट या तेजी न आए. 

राजनीतिक स्थिरता क्यों जरूरी है?

राजनीतिक स्थिरता निवेशकों का भरोसा बढ़ाती है. जहां सरकार स्थिर और नीतियां साफ होती हैं, वहां विदेशी निवेश आता है और मुद्रा मजबूत होती है. राजनीतिक अस्थिरता या बड़े विवाद निवेशकों को डरा देते हैं, जिससे करेंसी पर दबाव आता है.

फ्लोटिंग और फिक्स्ड सिस्टम में फर्क

भारत जैसे देशों में फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम है, जहां मुद्रा की कीमत बाजार तय करता है. वहीं कुछ देश, जैसे सऊदी अरब, फिक्स्ड सिस्टम अपनाते हैं, जहां सरकार अपनी करेंसी को एक तय मूल्य पर बांधकर रखती है. 

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