रोज स्कूल जाने से लेकर 9-to-5 जॉब तक, किसने तय किया यह सिस्टम?
स्कूल, परीक्षा, डिग्री और 9-से-5 की नौकरी का ढांचा ऐतिहासिक बदलावों, प्राचीन चीन की परीक्षा प्रणाली रहा है. यह अब डिजिटल युग में फिर से बदलता हुआ नजर आ रहा है.

- मजदूरों के संघर्ष से 8 घंटे की शिफ्ट आई, अब काम लचीला।
सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना, कक्षाओं में बैठना, परीक्षाएं देकर डिग्री हासिल करना और फिर 9-से-5 की नौकरी में लग जाना आज हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. हमें लगता है कि दुनिया हमेशा से ऐसे ही चलती आ रही थी, लेकिन इतिहास का पन्ना पलटकर देखें तो सच्चाई इसके ठीक उलट नजर आती है. हजारों साल पहले इंसानी समाज में न तो आज जैसे औपचारिक स्कूल थे और न ही दफ्तरों का ऐसा तय समय था. जिस रूटीन को आज हम कुदरती या बेहद सामान्य नियम मान चुके हैं, वह दरअसल इंसान के सामाजिक, आर्थिक और औद्योगिक विकास का नतीजा है. प्राचीन गुरुकुलों और कारीगरी से शुरू हुआ सीखने का सफर कैसे फैक्ट्रियों, नियमों, प्रमाणपत्रों और आधुनिक कॉर्पोरेट जॉब्स की तय सीढ़ी में बदल गया, इसकी कहानी बेहद रोचक और विचारणीय है.
अनौपचारिक शिक्षा और प्राचीन समाज की व्यवस्था
इतिहास के शुरुआती दौर में शिक्षा और हुनर सीखने का तरीका आज की तरह किसी चारदीवारी या निश्चित पाठ्यक्रम में कैद नहीं था. पुराने जमाने में बच्चे मुख्य रूप से अपने परिवार, सामाजिक समूहों, धार्मिक केंद्रों या फिर किसी हुनरमंद गुरु के सानिध्य में रहकर काम सीखते थे. उस समय जीवन से जुड़े व्यावहारिक ज्ञान, जैसे खेती, पशुपालन, दस्तकारी और व्यापारिक कौशल को ही प्राथमिकता दी जाती थी. समाज में पढ़ना-लिखना सिखाने वाले कुछ गिने-चुने केंद्र जरूर मौजूद थे, लेकिन वहां तक पहुंच बेहद सीमित वर्ग की ही होती थी. आम आबादी के लिए जीवन का अनुभव और बड़ों से सीखा गया काम ही उनकी सबसे बड़ी शिक्षा मानी जाती थी.
प्रतियोगी परीक्षा और चीन की शाही परंपरा
आज के समय में किसी अच्छे पद या करियर के लिए प्रतियोगिता परीक्षा देना एक बेहद सामान्य प्रक्रिया लगती है, लेकिन इसकी नींव प्राचीन चीन में रखी गई थी. सुई राजवंश के दौरान योग्य लोगों को सरकारी प्रशासन में शामिल करने के लिए एक विशेष परीक्षा प्रणाली की शुरुआत की गई. आगे चलकर तांग और सोंग राजवंशों ने इस शाही परीक्षा-व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी व मजबूत बनाया. इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य वंशानुगत अधिकार के बजाय योग्यता के आधार पर अधिकारियों का चुनाव करना था. हालांकि, उस दौर में भी सामाजिक विषमताओं के कारण इसका लाभ सीमित लोगों को ही मिला और आखिरकार 1905 में इस पुरानी व्यवस्था को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया गया.
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औद्योगिक क्रांति और संगठित स्कूलों का निर्माण
18वीं और 19वीं सदी में आई औद्योगिक क्रांति ने मानव इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव लाने का काम किया. बड़े पैमाने पर खुली फैक्ट्रियों और मशीनों को चलाने के लिए ऐसे मजदूरों और कर्मचारियों की जरूरत महसूस हुई जो कम से कम पढ़ना-लिखना, गिनती करना और दिए गए निर्देशों का पालन करना जानते हों. इसी जरूरत ने सामूहिक रूप से बच्चों को एक साथ पढ़ाने और अनुशासित करने वाले स्कूल सिस्टम को जन्म दिया. राज्यों ने अपने प्रशासन और अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली का विस्तार किया. इस तरह, नियमित कक्षाएं, समय-सारणी, घंटी बजना और परीक्षाओं का ढांचा औद्योगिक दौर की जरूरतों को पूरा करने के लिए ही विकसित हुआ.
खेती से कारखानों तक और 8 घंटे की नौकरी की जंग
औद्योगिक क्रांति से पहले अधिकतर लोग अपने खेतों या घरों में छोटे पैमाने पर काम करते थे, जहां समय की पाबंदी का ढांचा आज जैसा सख्त नहीं था. लेकिन फैक्ट्रियों के दौर में लोगों को एक निश्चित स्थान पर जाकर तय समय तक मजदूरी करने की व्यवस्था में ढाला गया. शुरुआत में मजदूरों को 12 से 16 घंटे तक कड़ा परिश्रम करना पड़ता था, जिससे उनके स्वास्थ्य और अधिकारों पर बुरा असर पड़ा. लंबे मजदूर आंदोलनों के बाद काम के घंटे तय करने की मांग उठी. वर्ष 1919 में अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने अपनी पहली नीति बनाकर उद्योगों में प्रतिदिन 8 घंटे और हफ्ते में 48 घंटे काम करने के सिद्धांत को मान्यता दी, जो आज 9-से-5 की नौकरी का मानक बन गया है.

डिग्री का दौर और बदलता ट्रेंड
समय के साथ शिक्षा और रोजगार का संबंध बेहद गहरा होता चला गया. स्कूल ने बुनियादी पढ़ाई-लिखाई सिखाई, कॉलेजों ने विशेषज्ञता दी और इन सब के बाद मिलने वाली डिग्री नौकरी और कमाई का जरिया बन गई. लेकिन यह पूरी प्रक्रिया कोई प्राकृतिक नियम न होकर एक बनाई गई सामाजिक सीढ़ी मात्र है. आज तकनीक और इंटरनेट के तेजी से बढ़ते दौर में यह पारंपरिक ढांचा एक बार फिर से बदल रहा है. अब कंपनियां सिर्फ कागजी डिग्रियों के बजाय व्यावहारिक कौशल, अनुभव और नया सीखने की क्षमता को ज्यादा प्राथमिकता दे रही हैं. इसके साथ ही वर्क फ्रॉम होम, पार्ट-टाइम काम और फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स जैसे नए तरीकों ने 9-से-5 के ढर्रे को चुनौती देना शुरू कर दिया है.
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