पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद एक बार फिर हिंसा और आगजनी का दौर शुरू हो गया है. लेनिन की मूर्तियों को ढहाने से लेकर दफ्तरों पर कब्जे और कार्यकर्ताओं की हत्या तक, राज्य के कोने-कोने से खौफनाक तस्वीरें सामने आ रही हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर इस वक्त बंगाल में शासन किसका है? एक तरफ निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया है, तो दूसरी तरफ 207 सीटों के साथ बीजेपी की नई सरकार बनने की तैयारी में है. कानून की पेचीदगियों के बीच आम जनता असमंजस में है कि इस वक्त पुलिस और प्रशासन को सख्त आदेश देने की असली ताकत किसके पास है.

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चुनाव आयोग का सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकार

जब तक चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह संपन्न होकर नई सरकार शपथ नहीं ले लेती, तब तक राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की कमान काफी हद तक भारत के चुनाव आयोग (ECI) के हाथों में होती है. वर्तमान हिंसक परिस्थितियों को देखते हुए चुनाव आयोग ने साफ कर दिया है कि वह केंद्रीय सुरक्षा बलों के माध्यम से कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सीधे आदेश दे सकता है. आयोग ने प्रशासन को सख्त हिदायत दी है कि किसी भी प्रकार की गुंडागर्दी बर्दाश्त न की जाए. इस वक्त में नौकरशाही और पुलिस सीधे तौर पर चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन करने के लिए जवाबदेह होती है.

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ममता बनर्जी और कार्यवाहक सरकार की भूमिका

संवैधानिक मर्यादाओं के अनुसार, जब तक नया मुख्यमंत्री पद की शपथ नहीं लेता, तब तक मौजूदा प्रशासनिक तंत्र कार्यवाहक मुख्यमंत्री के अंतर्गत ही रहता है. ममता बनर्जी ने फिलहाल पद छोड़ने से मना किया है, लेकिन उनकी शक्तियां अब सीमित हो चुकी हैं. वे तकनीकी रूप से मुख्यमंत्री जरूर हैं, लेकिन इस वक्त उनके पास स्वतंत्र फैसले लेने के बजाय चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों पर चलने की संवैधानिक मजबूरी है. प्रशासन इस समय निवर्तमान सरकार के बजाय आयोग और कानून के प्रति अधिक जवाबदेह होता है, ताकि निष्पक्षता बनी रहे.

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राज्यपाल के पास मौजूद विशेष शक्तियां

बंगाल जैसे संवेदनशील राज्य में जब संवैधानिक संकट की स्थिति पैदा होती है, तब राज्यपाल की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है. यदि निवर्तमान मुख्यमंत्री और नई बनने वाली सरकार के बीच टकराव से कानून व्यवस्था बिगड़ती है, तो राज्यपाल सीधे प्रशासन को निर्देश दे सकते हैं. वे पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव को तलब कर हिंसा रोकने के लिए जवाबदेही तय कर सकते हैं. राज्यपाल केंद्र को रिपोर्ट भेजकर राज्य की बिगड़ती स्थिति से अवगत कराने और जरूरत पड़ने पर कड़े कदम उठाने की शक्ति रखते हैं.

नवनिर्वाचित बीजेपी विधायकों का कानूनी दावा

चूंकि 2026 के इन चुनावों में बीजेपी ने 207 सीटों के साथ भारी बहुमत हासिल किया है, इसलिए संवैधानिक रूप से नई सरकार बनाने का अधिकार उनके पास है. बीजेपी के नवनिर्वाचित विधायक जल्द ही अपना नेता चुनकर सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे. कानून की नजर में, जिस क्षण नया मुख्यमंत्री शपथ ग्रहण करेगा, हिंसा को रोकने और प्रशासन को संचालित करने की पूरी जिम्मेदारी और कानूनी अधिकार उस नए मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट के पास चले जाएंगे. तब तक वे केवल राजनीतिक दबाव बना सकते हैं, प्रशासनिक आदेश नहीं दे सकते हैं.

गृह मंत्रालय भी कर रहा निगरानी

राज्य में मचे इस तांडव को देखते हुए केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती को बढ़ाने का फैसला चुनाव आयोग ही ले सकता है. लेनिन की मूर्ति तोड़ने और टीएमसी-कांग्रेस दफ्तरों पर कब्जे जैसी घटनाओं ने प्रशासन की विफलता को उजागर किया है. ऐसे में केंद्रीय गृह मंत्रालय भी चुनाव आयोग के साथ मिलकर स्थिति की निगरानी कर रहा है. जब तक सत्ता का हस्तांतरण सुचारू रूप से नहीं होता, तब तक सुरक्षा बलों को दंगाइयों पर बल प्रयोग करने और गिरफ्तारियां करने का आदेश सीधे दिल्ली और चुनाव आयोग के समन्वय से ही मिलेगा.

संवैधानिक संकट और अंतिम समाधान

इस वक्त बंगाल की इस हिंसा को रोकने के लिए वर्तमान में दोहरी जवाबदेही काम कर रही है. जमीनी स्तर पर चुनाव आयोग आदेश दे रहा है, जबकि संवैधानिक रूप से राज्यपाल स्थिति पर नजर रखे हुए हैं. ममता बनर्जी अब केवल नाममात्र की मुख्यमंत्री रह गई हैं, क्योंकि जनादेश उनके खिलाफ है. वास्तविक सत्ता उस वक्त प्रभावी होगी जब नई सरकार शपथ लेगी. तब तक, कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की जिम्मेदारी पूरी तरह से चुनाव आयोग और उसके अधीन काम कर रहे केंद्रीय बलों की है.

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