India First Chocolate: इससे काफी पहले की अंतरराष्ट्रीय चॉकलेट की बड़ी कंपनियां और आधुनिक कन्फेक्शनरी ब्रांड भारत में आम हो जाएं देश की पहली बड़ी पैमाने पर चॉकलेट और टॉफी बनाने वाली फैक्ट्री बिहार के एक छोटे से शहर में पहले ही काम करना शुरू कर चुकी थी. सारण जिले में स्थित मढ़ौरा में 1929 में स्थापित मशहूर मॉर्टन टॉफी फैक्ट्री ने ब्रिटिश काल के दौरान भारत में संगठित रूप से चॉकलेट और कन्फेक्शनरी का उत्पादन शुरू किया. ऐसे समय में जब चॉकलेट को एक विलासिता की वस्तु माना जाता था इस फैक्ट्री ने भारतीय उपभोक्ताओं को चॉकलेट और टॉफी जैसी मिठाइयों से बड़े पैमाने पर परिचित कराने में मदद की.

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 कैसे हुई थी स्थापना? 

यह फैक्ट्री भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान स्थापित की गई थी. उस समय चॉकलेट और कन्फेक्शनरी उत्पाद ज्यादातर भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा नहीं थे. इंपोर्टेड मिठाइयां महंगी होती थी और आमतौर पर समाज के अमीर वर्ग तक ही सीमित थी. इस फैक्ट्री ने देश के अंदर बड़े पैमाने पर संगठित उत्पादन शुरू करके इस स्थिति को बदल दिया. 

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पूरे भारत में हुआ मशहूर

20वीं सदी की शुरुआत में मढ़ौरा अपनी चीनी मिलों और औद्योगिक गतिविधियों के लिए जाना जाता था. हालांकि इस फैक्ट्री की स्थापना ने इस शहर को एक बिल्कुल नई पहचान दी. जल्द ही इसे पूरे भारत में चॉकलेट, कैंडी और टॉफी उत्पादन के केंद्र के रूप में पहचाने जाने लगा. 

भारत में कोको की शुरुआत 

भारत में चॉकलेट का सफर असल में काफी पहले कोको के पौधों से आने के साथ शुरू हो गया था. ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स के मुताबिक कोको की खेती भारत में पहली बार 1798 में औपनिवेशिक काल के दौरान शुरू की गई थी. यह मुख्य रूप से दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में शुरू की गई थी. 

स्वदेशी चॉकलेट का उत्पादन 

जैसे-जैसे भारत आजादी की तरफ बढ़ रहा था घरेलू चॉकलेट निर्माण का भी विस्तार होने लगा. देश की शुरुआती चॉकलेट कंपनियों में से एक आधिकारिक तौर पर 1946 के आसपास स्थापित की गई. इसका नाम फेंटेसी फाइन चॉकलेट था. 

1948 में कैडबरी के भारत में अपना काम शुरू करने के बाद भारतीय चॉकलेट बाजार में एक बड़ा बदलाव आया. बाद में 1960 के दशक में कंपनी ने केरल के वायानाड जैसे इलाकों में कोको की खेती को बढ़ावा देने में बड़ी भूमिका निभाई.

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