भारत की न्याय प्रणाली में मुकदमों के बढ़ते बोझ और मुकदमों के निपटारे में होने वाली देरी को लेकर बेहद चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं. केंद्र सरकार द्वारा राज्यसभा में पेश की गई ताजा रिपोर्ट के अनुसार, देश की अदालतों में लंबित मामलों की संख्या का आंकड़ा लगभग 5.7 करोड़ के पार पहुंच चुका है. इसमें सुप्रीम कोर्ट 25 हाईकोर्ट और देश भर की जिला एवं निचली अदालतें शामिल हैं. न्यायिक देरी के इस संकट में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश टॉप पर है. अदालतों में मुकदमों का यह बैकलॉग कितना गंभीर रूप ले चुका है.

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राज्यों की सूची में उत्तर प्रदेश सबसे आगे

देश में सबसे ज्यादा लंबित मुकदमों के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है. राज्य की निचली अदालतों और इलाहाबाद हाईकोर्ट को मिलाकर यहां 1.3 करोड़ से भी अधिक मुकदमे पेंडिंग हैं. यह आंकड़ा पूरे देश की कुल पेंडेंसी का लगभग 24 प्रतिशत हिस्सा है. इसके बाद दूसरे स्थान पर महाराष्ट्र आता है, जहां लगभग 67 लाख मामले पेंडिंग पड़े हैं. वहीं पश्चिम बंगाल और बिहार जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में भी मुकदमों का भारी बैकलॉग बना हुआ है, जिससे आम जनता को न्याय के लिए वर्षों इंतजार करना पड़ रहा है.

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क्या है मुकदमों के अंबार की वजहें?

अदालतों में मुकदमों का यह विशाल अंबार लगने के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं. सबसे बड़ा कारण अदालतों में जजों के खाली पड़े पद और न्यायिक बुनियादी ढांचे की भारी कमी है. इसके अलावा, मुकदमों की एक बड़ी संख्या में खुद सरकार का पक्षकार (वादी या प्रतिवादी) होना भी मुकदमों की संख्या बढ़ाने में योगदान देता है. समय पर तारीखें न मिलना और लंबी प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण छोटे-छोटे मामलों के निपटारे में भी सालों बीत जाते हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों की पेंडेंसी 

28 जुलाई 2026 तक देश की शीर्ष अदालत में कुल 95,936 मुकदमे लंबित हैं. संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में भी मुकदमों के अंतिम फैसले में दशकों का समय लग रहा है. इस समय सर्वोच्च न्यायालय में मुकदमों का ब्योरा इस प्रकार है-

30 साल से ज्यादा पुराने: 26 केस

20 से 30 साल पुराने: 558 केस

10 साल से ज्यादा पुराने: 10,094 केस

5 साल से ज्यादा पुराने: 24,611 केस

1 साल से ज्यादा पुराने: 49,248 केस

इलाहाबाद हाईकोर्ट सूची में शीर्ष पर

देश भर के 25 उच्च न्यायालयों में कुल 63.76 लाख पेंडिंग मामले दर्ज किए गए हैं. इनमें से 80,634 मामले ऐसे हैं जो 30 साल से भी अधिक समय से न्याय की आस में लटके हैं. इसके अलावा 4.51 लाख से अधिक केस 20 साल से और 16 लाख से ज्यादा केस 10 साल से अधिक समय से पेंडिंग हैं. अलग-अलग हाईकोर्ट की बात करें तो इलाहाबाद हाईकोर्ट 12.28 लाख पेंडिंग मामलों के साथ देश में सबसे ऊपर है. यहां 53,787 मामले 30 साल से, 1.61 लाख मामले 20 साल से और 4.88 लाख मामले एक दशक से ज्यादा समय से लंबित हैं. कलकत्ता हाईकोर्ट इस सूची में दूसरे स्थान पर है, जहां 30 साल से अधिक पुराने 11,417 मुकदमे पेंडिंग हैं.

निचली अदालतों पर सबसे बड़ा दबाव

देश भर की जिला और अन्य निचली अदालतों की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक है, जहां लंबित मामलों का आंकड़ा 4.98 करोड़ के पार पहुंच गया है. आम नागरिक सबसे पहले इन्हीं अदालतों का रुख करता है, लेकिन यहीं पर संसाधनों और जजों की सबसे ज्यादा कमी देखने को मिलती है. नतीजतन, कई पीढ़ियां बदल जाने के बाद भी मुकदमों का अंतिम फैसला नहीं हो पाता है.

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