जीवन की सबसे बुनियादी जरूरत यानी पानी की शुद्धता को लेकर दुनिया भर के देशों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है. जहां एक तरफ फिनलैंड और आइसलैंड जैसे देश अपनी जनता को नल से 100% साफ और प्राकृतिक रूप से शुद्ध पानी दे रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पानी के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में चीन और भारत जैसे एशियाई देश बड़ा दबदबा रखते हैं. बोतलबंद प्राकृतिक जल से लेकर फसलों के माध्यम से पानी के अप्रत्यक्ष व्यापार तक, दुनिया में जल संसाधनों का यह खेल बेहद दिलचस्प है, जिसमें तकनीक, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक वरदान की अहम भूमिका है.

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यूरोप के किन देशों में नल से मिलता है बोतलबंद जल से भी शुद्ध पानी?

यूरोपीय देशों ने अपने कड़े नियमों और प्राकृतिक संसाधनों की बदौलत जल शुद्धता के क्षेत्र में विश्व स्तर पर नया मुकाम हासिल किया है. डेनमार्क में पीने के पानी की सुरक्षा जांच के बेहद सख्त मानक लागू हैं, जिसके कारण वहां का नल का पानी बाजार में बिकने वाली बोतलों से भी ज्यादा सुरक्षित माना जाता है. वहीं आइसलैंड में करीब 95% पानी का स्रोत प्राकृतिक ग्लेशियर और धरातल के नीचे स्थित झरने हैं. यह जल जमीन के नीचे प्राकृतिक रूप से इस कदर छन जाता है कि इसे बिना किसी केमिकल ट्रीटमेंट के सीधे पिया जा सकता है. इसके अलावा स्विट्जरलैंड और नॉर्वे में अल्पाइन झीलों के कारण सार्वजनिक फव्वारों का पानी भी पीने योग्य रहता है.

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वैश्विक सूचकांक में अव्वल और आधुनिक जल प्रबंधन की मिसाल

पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में फिनलैंड और आइसलैंड ने सुरक्षित पेयजल के मामले में पूरे 100 में से 100 अंक हासिल कर पहला स्थान पाया है. इनके ठीक पीछे यूनाइटेड किंगडम और स्विट्जरलैंड का नाम आता है. दूसरी तरफ, सीमित प्राकृतिक स्रोत होने के बाद भी सिंगापुर ने अत्याधुनिक तकनीक की बदौलत पानी के रीसाइकलिंग और डिसैलिनेशन का बेहतरीन ढांचा खड़ा किया है. अगर ताजे पानी के विशाल भंडारों की बात करें तो कनाडा के पास पूरी दुनिया के कुल ताजे जल संसाधनों का लगभग पांचवां हिस्सा मौजूद है, जो उसकी पर्यावरण नीति को मजबूती देता है.

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चीन और भारत के पास वॉटर एक्सपोर्ट की कमान

जब बात जल व्यापार की आती है, तो मुख्यभूमि चीन बोतलबंद पानी, बर्फ और प्राकृतिक जल का दुनिया में सबसे बड़ा निर्यातक देश बनकर उभरता है. वहीं दूसरी ओर वर्चुअल वॉटर यानी अप्रत्यक्ष रूप से पानी के निर्यात के मामले में भारत पूरी दुनिया में सबसे आगे खड़ा है. भारत का यह मुकाम इसलिए है क्योंकि देश से बड़े पैमाने पर ऐसी कृषि फसलों (जैसे चावल और गन्ना) का निर्यात विदेशों में किया जाता है, जिनकी पैदावार में अत्यधिक मात्रा में पानी की खपत होती है.

भारतीय जल संकट और प्राकृतिक सुंदरता का अद्भुत मेल

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल स्वच्छता के मामले में भारत की स्थिति काफी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है. वर्ष 2024 के एनवायरमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत 180 देशों की सूची में 176वें पायदान पर था. इसका मुख्य कारण नदियों का प्रदूषण, सीवेज ट्रीटमेंट की कमी और हर घर तक साफ पानी की सीधी पहुंच न होना है. हालांकि, इन चुनौतियों के बीच भारत में मेघालय के डाउकी में बहने वाली उमनगोट जैसी विश्व प्रसिद्ध नदी भी मौजूद है, जिसका जल इतना पारदर्शी और साफ है कि उस पर तैरती नाव हवा में उड़ती हुई महसूस होती है.

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