Oldest Ramayana Manuscript: रामायण की दुनिया की सबसे पुरानी बची हुई पांडुलिपि, जो ताड़ के पत्तों पर लिखी गई है नेपाल की राजधानी काठमांडू के नेशनल आर्काइव्स में सुरक्षित रखी है.  ऐसा कहा जाता है कि यह पांडुलिपि लगभग 1041 साल पुरानी है और 1056 ईस्वी की है. यह मिथिला लिपि में लिखी है जो इस महाकाव्य के प्रसार का एक बड़ा जरूरी ऐतिहासिक प्रमाण है. 

Continues below advertisement

इसी के साथ एक और पांडुलिपि भारत में भी मौजूद है. उत्तर प्रदेश के अयोध्या में स्थित इंटरनेशनल राम कथा म्यूजियम में वाल्मीकि रामायण की एक दुर्लभ हस्तलिखित प्रति सुरक्षित रखी है. यह देवनागरी लिपि में लिखी गई है और रिपोर्ट्स के मुताबिक 233 साल पुरानी है. इन दोनों जगह पर मौजूद पांडुलिपियां, रामायण में रुचि रखने वाले लोगों को अलग-अलग जगह और लिपियों में संरक्षित पांडुलिपियों को देखने का मौका देती हैं.

काठमांडू के नेशनल आर्काइव्स की यात्रा 

Continues below advertisement

भारत से आने वाले यात्री हवाई या फिर सड़क रास्ते से काठमांडू जा सकते हैं. दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे भारत के बड़े शहरों से काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट के लिए सीधी उड़ान मौजूद है. नेशनल आर्काइव्स हवाई अड्डे से लगभग 5 से 6 किलोमीटर दूर है और वहां तक पहुंचने के लिए स्थानीय टैक्सी ली जा सकती है. 

भारत से नेपाल जाने वाली यात्रियों के लिए सड़क रास्ते से यात्रा करना भी एक और विकल्प है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के रास्ते सोनौली बॉर्डर और बिहार में रक्सौल बॉर्डर से जाया जा सकता है. इन दोनों सीमाओं से काठमांडू तक जाने के लिए बस और प्राइवेट टैक्सी मिल जाती है. 

यात्रियों को अपने पहुंचने के स्थान से नेशनल आर्काइव्स तक की आगे की यात्रा की योजना बना लेनी चाहिए. हवाई अड्डे से आर्काइव्स की दूरी काफी कम है और सड़क रास्ते से जाने पर पहले नेपाल बॉर्डर पहुंचना होता है और फिर वहां से बस या फिर टैक्सी के जरिए राजधानी तक जाना पड़ता है. यह रास्ते उन यात्रियों के लिए ऑप्शन देते हैं जो हवाई यात्रा या सड़क रास्ते में से किसी को चुनना चाहते हैं.

अयोध्या के इंटरनेशनल राम कथा म्यूजियम की यात्रा 

जो लोग 233 साल पुरानी वाल्मीकि रामायण की हस्तलिखित प्रति देखने में रुचि रखते हैं उनके लिए अयोध्या का इंटरनेशनल राम कथा म्यूजियम एक सही जगह है. संग्रहालय में देवनागरी लिपि में लिखी गई एक पांडुलिपि सुरक्षित है. यह काठमांडू में मौजूद ताड़ के पत्तों वाली उस पुरानी पांडुलिपि से अलग है जो मिथिला या फिर तिरहुता लिपि में लिखी गई है.

हवाई रास्ते से यात्रा करने वाले लोग अयोध्या के महर्षि वाल्मीकि अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का इस्तेमाल कर सकते हैं. यह हवाई अड्डा संग्रहालय से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है. इसके अलावा यात्री लखनऊ हवाई अड्डे तक उड़ान भर सकते हैं और वहां से सड़क रास्ते के जरिए अयोध्या जा सकते हैं. 

ट्रेन का रास्ता भी एक ऑप्शन है. अयोध्या धाम जंक्शन और अयोध्या कैंट देश के प्रमुख शहरों से जुड़े हुए हैं. इनमें से किसी भी स्टेशन पर पहुंचने के बाद यात्री संग्रहालय तक जाने के लिए स्थानीय ऑटो रिक्शा या फिर ई रिक्शा ले सकते हैं. 

सड़क रास्ते से अयोध्या जाना 

अयोध्या राष्ट्रीय राजमार्ग 27 पर स्थित है जो उत्तर प्रदेश और आसपास के क्षेत्र से आने वाली यात्रियों के लिए सड़क रास्ते देता है. लखनऊ, गोरखपुर, वाराणसी और प्रयागराज से अयोध्या के लिए सरकारी और निजी बस 24 घंटे चलती है. यात्री इन शहरों से बस सेवा को चुन सकते हैं या फिर सड़क रास्ते से यात्रा कर सकते हैं. 

सबसे सही रास्ता इस बात पर निर्भर होता है कि यात्री कहां से आ रहे हैं और वह किस तरह के परिवहन का इस्तेमाल करना चाहते हैं. हवाई यात्रा के लिए अयोध्या या फिर लखनऊ का ऑप्शन है, रेल यात्रा के लिए दो स्टेशन मौजूद है और सड़क रास्ता अयोध्या को कई क्षेत्रीय केंद्रों से जोड़ता है.

यह भी पढ़ें: क्या चुनाव लड़ने के लिए दोषसिद्ध पर लगाई जा सकती है रोक, क्या हैं नियम?

दो पांडुलिपि, दो जरूरी स्थान 

काठमांडू में मौजूद पांडुलिपि को रामायण की सबसे पुरानी पांडुलिपि माना जाता है. यह लगभग 1041 साल पुरानी है और 1056 ईस्वी की है. ताड़ के पत्तों पर लिखी गई पांडुलिपि मिथिला लिपि में है. यह अयोध्या में सुरक्षित वाल्मीकि रामायण की हस्तलिखित प्रति से अलग है. अयोध्या वाली रामायण 233 साल पुरानी है और देवनागरी लिपि में लिखी गई है.

यह भी पढ़ें: लॉरेंस बिश्नोई गैंगस्टर है या डॉन, दोनों में क्या फर्क?