ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच मचे युद्ध के घमासान और तकनीकी होड़ के बीच, आज हम एक क्लिक पर अपने स्मार्टफोन में कल के मौसम का हाल जान लेते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब दुनिया के पास न सैटेलाइट थे और न ही कंप्यूटर, तब पहली बार मौसम की रिपोर्ट कैसे तैयार की गई होगी? यह कहानी साहस, विज्ञान और हजारों लोगों की जान बचाने के जज्बे से जुड़ी है. आज से करीब 160 साल पहले एक ब्रिटिश नौसेना अधिकारी ने वह कर दिखाया था जिसे उस दौर में जादू या असंभव माना जाता था. मौसम विज्ञान का यह सफर समंदर की लहरों से शुरू होकर आज हमारे मोबाइल की स्क्रीन तक पहुंच गया है.

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अखबार के पन्नों पर पहली भविष्यवाणी

दुनिया की सबसे पहली मौसम रिपोर्ट 1 अगस्त, 1861 को लंदन के मशहूर अखबार द टाइम्स में प्रकाशित हुई थी. इस ऐतिहासिक रिपोर्ट में लंदन के लिए 62 डिग्री तापमान और साफ आसमान रहने का अनुमान लगाया गया था. हैरानी की बात यह है कि उस दौर में बिना किसी आधुनिक मशीनरी के यह भविष्यवाणी बिल्कुल सटीक साबित हुई थी. यह पहली बार था जब आम जनता को यह पता चला कि आने वाले घंटों में कुदरत का मिजाज कैसा रहने वाला है. इससे पहले लोग केवल आसमान देखकर या पुराने अनुभवों के आधार पर ही अंदाजा लगाया करते थे.

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मौसम विज्ञान के जनक कौन थे?

इस पूरी क्रांति के पीछे ब्रिटिश नेवी के एक जांबाज अफसर रॉबर्ट फ्रिट्जरॉय का दिमाग था. फ्रिट्जरॉय वही शख्स थे, जिन्होंने महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन के साथ एचएमएस बीगल जहाज पर पूरी दुनिया की यात्रा की थी. इसी लंबी समुद्री यात्रा के दौरान उन्होंने हवाओं के दबाव और बादलों की चाल को समझने के लिए कड़ी रिसर्च की थी. उन्होंने ही सबसे पहले यह तकनीक खोजी कि आने वाले समय के मौसम का पूर्वानुमान कैसे लगाया जा सकता है. फ्रिट्जरॉय का मानना था कि विज्ञान का इस्तेमाल केवल किताबों के लिए नहीं, बल्कि इंसानी जान बचाने के लिए होना चाहिए.

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समुद्री हादसों ने दिया 'वेदर फोरकास्ट' को जन्म

रॉबर्ट फ्रिट्जरॉय के इस जुनून के पीछे एक दर्दनाक वजह थी. उस दौर में ब्रिटेन के समुद्री तटों के पास महज 5 साल के भीतर करीब 7,400 जहाज डूब गए थे और हजारों नाविकों की जान चली गई थी. फ्रिट्जरॉय को यकीन था कि अगर मछुआरों और जहाज के कप्तानों को तूफान आने से पहले ही चेतावनी मिल जाए, तो इन जानलेवा हादसों को रोका जा सकता है. इसी नेक मकसद के साथ 1854 में ब्रिटेन में दुनिया का पहला मौसम विभाग (Meteorological Department) बनाया गया, जिसे आज हम मेट ऑफिस के नाम से जानते हैं.

रेडियो और टीवी तक पहुंचने का सफर

अखबारों में रिपोर्ट छपने के कई दशकों बाद संचार के नए साधनों ने इस जानकारी को और तेज कर दिया. 14 नवंबर, 1922 को पहली बार लंदन में बीबीसी रेडियो के जरिए लोगों ने अपने घरों में बैठकर मौसम का हाल सुना. इसके बाद 11 नवंबर, 1936 को बीबीसी ने ही टेलीविजन पर दुनिया की पहली मौसम रिपोर्ट का प्रसारण किया. उस समय टीवी पर एक नक्शे के जरिए समझाया गया था कि कहां बारिश होगी और कहां धूप खिलेगी. बिजली के टेलीग्राफ से शुरू हुआ यह सफर आज सुपर कंप्यूटर और सैटेलाइट तक पहुंच चुका है, जिससे अब हफ्तों पहले सटीक जानकारी मिल जाती है.

बिना सैटेलाइट के सटीक गणना का चमत्कार

फ्रिट्जरॉय की पहली रिपोर्ट की सफलता आज भी वैज्ञानिकों को हैरान करती है. उस समय उन्होंने केवल बैरोमीटर (हवा का दबाव नापने वाला यंत्र) और टेलीग्राफ की मदद से अलग-अलग जगहों से जानकारी जुटाई थी. उन्होंने दिखाया कि अगर डेटा को सही तरीके से समझा जाए, तो प्रकृति के संकेतों को पढ़ना मुमकिन है. आज जब हम युद्ध या आपदा के समय मौसम की पल-पल की जानकारी पाते हैं, तो इसके पीछे रॉबर्ट फ्रिट्जरॉय की वही दूरगामी सोच खड़ी है, जिसने 1861 में पहली बार अखबार के जरिए दुनिया को 'कल' का हाल बताया था.

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