Arrest Warrant Against Judges: दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा पिछले कई दिनों से सुर्खियों में बने हुए हैं. कुछ दिन पहले उनके घर से भारी मात्रा में कैश बरामद हुआ था. इसके बाद से सुप्रीम कोर्ट ने उनको इलाहाबाद हाई कोर्ट ट्रांसफर करने का आदेश दे दिया है. वहीं दिल्ली हाई कोर्ट के रोस्टर से भी उनका नाम हटाए जाने की बात की जा रही है. लेकिन क्या आपको पता है कि एक बार उत्तर प्रदेश विधानसभा ने जजों की गिरफ्तारी का वारंट जारी कर दिया था. उस वक्त खूब हंगामा हुआ था.

विधायक नरसिंह नारायण पर लगे थे भ्रष्टाचार के आरोप

यह बात उत्तर प्रदेश विधानसभा के तीसरे कार्यकाल के दौरान की है. सोशलिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता केशव सिंह ने गोरखपुर से लेकर विधान भवन के गलियारों तक पोस्टर चिपकाए थे, जिसमें कांग्रेस के विधायक नरसिंह नारायण पांडेय पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. विधायक ने इसे विशेषाधिकार का हनन माना. उस वक्त विधानसभा स्पीकर मदन मोहन वर्मा थे, तो विधायक ने उनके सामने गुहार लगाई और मामला विशेषाधिकार समिति के पास चला गया था. तब समिति ने केशव सिंह समेत चार लोगों को दोषी माना और उनको सदन में पेश होने के लिए कहा गया. बाकी लोग तो सदन में पेश हो गए, लेकिन केशव सिंह नहीं आए. केशव सिंह ने कहा उनके पास गोरखपुर से सदन तक आने के लिए पैसे नहीं हैं. 

जब गिरफ्तार हुए केशव सिंह

वह भले ही सदन में पेश नहीं हुए, लेकिन उन्होंने स्पीकर को चिट्ठी भेजी और उसमें लिखा कि सदन में उनको तलब किए जाने का फैसला नादिरशाही है. अब तत्कालीन मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी थीं, तो उन्होंने सदन में सीधा प्रस्ताव रख दिया कि केशव सिंह को गिरफ्तार करके सात दिन के लिए जेल भेज दिया जाए. गोरखपुर से मार्शल ने केशव सिंह को गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया. तब वकील बी. सोलेमन ने 19 मार्च 1964 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने इस गिरफ्तारी को गलत बताया और तो और याचिका भी दायर कर दी. केशव सिंह को जेल में छह दिन बीत चुके थे. जब सुनवाई का दिन आया तो सरकार की ओर से कोई वकील पेश नहीं हुआ. ऐसे में केशव सिंह को जमानत मिल गई. 

जजों की गिरफ्तारी को लेकर यूपी विधानसभा से निकला था वॉरेंट

इसको लेकर विधानसभा स्पीकर आगबबूला हो गए. उन्होंने इस फैसले को विधानसभा के अधिकार में हस्तक्षेप माना और हाईकोर्ट के दोनों जज नसीरुल्ला बेग और जीडी सहगल के साथ वकील बी. सोलेमन को गिरफ्तार करके सदन में पेश किए जाने का वॉरेंट जारी कर दिया था. अब दोनों जज चिंता में पड़ गए कि क्या किया जाए. तब उन्होंने अपने ही हाई कोर्ट में इस आदेश के खिलाफ याचिका दायर की थी. बाद में इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की थी.