अंतरिक्ष पृथ्वी से जितना खूबसूरत और शांत नजर आता है, उतना ही यह इंसानों के लिए एक बेहद भयानक जगह भी है. अक्सर लोग सोचते हैं कि अगर कोई बिना सुरक्षा वाले स्पेशल सूट के सीधे अंतरिक्ष के शून्य में पहुंच जाए, तो क्या उसका शरीर गुब्बारे की तरह फट जाएगा या बर्फ की तरह जम जाएगा. असल में ऐसा कुछ भी तुरंत नहीं होता, लेकिन जिंदा बचने की उम्मीद भी न के बराबर होती है. हवा और दबाव के बिना इंसानी शरीर सिर्फ कुछ ही सेकंड में पूरी तरह बेबस होकर अपनी ताकत खो देता है.

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अचानक छिन जाएगी दिमागी सुधबुध

अंतरिक्ष में कदम रखते ही सबसे पहला हमला इंसानी फेफड़ों और खून की व्यवस्था पर होता है. वहां न तो सांस लेने के लिए हवा मौजूद है और न ही बाहरी वातावरण का कोई दबाव है. जैसे ही कोई इंसान इस वैक्यूम के संपर्क में आता है, उसके शरीर से ऑक्सीजन तेजी से बाहर खींचने लगती है. खून में बची हुई थोड़ी-बहुत ऑक्सीजन दिमाग तक सिर्फ 10 से 15 सेकंड का ही सहारा दे पाती है. इसके बाद दिमाग काम करना पूरी तरह बंद कर देता है और इंसान पलक झपकते ही बेसुध होकर गिर पड़ता है.

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सांस रोकने की गलती पड़ेगी भारी

ऐसी विकट परिस्थिति में अगर कोई व्यक्ति अपनी सांस रोककर बचने की कोशिश करे, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल साबित होगी. धरती पर हमारी हवा फेफड़ों के अंदर सुरक्षित रहती है, लेकिन अंतरिक्ष के शून्य में बाहर का दबाव शून्य होता है. ऐसे में फेफड़ों के भीतर जमा हवा बेहद तेजी से फैलने की कोशिश करेगी, जिससे फेफड़ों की नाजुक दीवारें और टिशू फट जाएंगे. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसी अनहोनी हो जाए, तो सांस को बाहर छोड़ देना ही फेफड़ों को तुरंत फटने से बचाने का एकमात्र तरीका है.

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नमी बन जाएगी भाप और सूज जाएगा शरीर

अंतरिक्ष का शून्य वातावरण शरीर के अंदर मौजूद नमी के साथ एक अजीब प्रक्रिया शुरू कर देता है. जिसे वैज्ञानिक भाषा में लिक्विड का कम दबाव पर उबलना कहते हैं, वही खेल शरीर के साथ होता है. जीभ पर जमा थूक, आंखों का पानी और चमड़ी के निचले हिस्से में मौजूद लिक्विड भाप बनकर उड़ने लगता है. खून नसों के अंदर बहता रहता है क्योंकि नसें मजबूत होती हैं, लेकिन शरीर के बाकी हिस्सों में मौजूद पानी उबलने जैसी स्थिति में आकर पूरे शरीर में भारी सूजन पैदा कर देता है.

खतरनाक किरणें और छांव का शरीर पर असर

अंतरिक्ष में सूर्य की सीधी किरणों को रोकने के लिए कोई वायुमंडल या ओजोन परत नहीं होती. इस वजह से सूरज की बेहद खतरनाक अल्ट्रावॉयलेट यानी यूवी किरणें बिना किसी रुकावट के सीधे त्वचा पर हमला करती हैं, जिससे कुछ ही क्षणों में त्वचा बुरी तरह झुलस जाती है. वहीं दूसरी तरफ, जिस हिस्से पर धूप नहीं पड़ती, वहां का तापमान बेहद नीचे गिर जाता है. हालांकि शरीर तुरंत नहीं जमता, क्योंकि अंतरिक्ष के शून्य में गर्मी को बाहर निकलने में थोड़ा समय लगता है.

दो मिनट में थम जाएंगी सांसें

बिना ऑक्सीजन के शरीर के अंदरूनी अंग बहुत तेजी से एक-एक करके काम करना बंद करने लगते हैं. दिमाग को ऑक्सीजन न मिलने की वजह से जो नुकसान होता है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती है. इसके तुरंत बाद दिल की धड़कन रुक जाती है और शरीर के बाकी मुख्य हिस्से पूरी तरह शांत पड़ जाते हैं. इस तरह बिना किसी सुरक्षा सूट के अंतरिक्ष में पहुंचे इंसान की पूरी जीवनलीला महज 1 से 2 मिनट के भीतर हमेशा के लिए समाप्त हो जाती है.

असल जीवन में नहीं होता फिल्मों जैसा हाल

साइंस फिक्शन फिल्मों में अक्सर दिखाया जाता है कि अंतरिक्ष में पहुंचते ही इंसान का शरीर धमाके के साथ फट जाता है या तुरंत बर्फ का पुतला बन जाता है. यह पूरी तरह से एक काल्पनिक सोच है. सच यह है कि हमारी त्वचा बहुत मजबूत और लचीली होती है, जो अंदर के दबाव को झेल लेती है और शरीर को फटने से बचाती है. हालांकि शरीर में सूजन जरूर आती है और इंसान बिना किसी बड़े धमाके के बेहद खामोशी से दम तोड़ देता है.

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