First British Factory India: भारत में ब्रिटिश मौजूदगी जीत से नहीं बल्कि व्यापार से शुरू हुई थी. ब्रिटिश ताज के कंट्रोल करने से काफी पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के जरिए ब्रिटिश शासन की नींव रखी थी. इस सफर में पहला बड़ा मील का पत्थर 1613 में सूरत में पहली स्थायी ब्रिटिश फैक्ट्री की स्थापना थी. आइए जानते हैं कि कैसे यह फैक्ट्री भारत में स्थापित हुई थी और यहां क्या-क्या बनता था.

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पहली स्थायी ब्रिटिश फैक्ट्री

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाह जहांगीर से औपचारिक अनुमति लेने के बाद भारत के पश्चिमी तट पर एक फलते फूलते बंदरगाह शहर सूरत में अपनी पहली स्थायी फैक्ट्री स्थापित की थी. यह मंजूरी स्वाली की लड़ाई के बाद मिली थी. दरअसल 1612 में कैप्टन थॉमस बेस्ट के नेतृत्व में ब्रिटिश नौसेना बलों ने पुर्तगालियों को हराया था. इससे मुगल अधिकारी काफी ज्यादा खुश हुए थे और उन्होंने ब्रिटिशों को 1613 में सूरत में एक सुरक्षित व्यापारिक अड्डा स्थापित करने की अनुमति दे दी थी. 

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अस्थायी ट्रेडिंग पोस्ट 

सूरत से पहले ब्रिटिशों ने 1611 में पूर्वी तट पर मछलीपट्टनम में एक छोटी और अस्थायी शुरुआत कर दी थी. हालांकि यह एक स्थायी फैक्ट्री नहीं थी और इसे मजबूत राजनीतिक समर्थन भी मिला हुआ नहीं था. 

17वीं सदी में फैक्ट्री का क्या मतलब होता था?

1600 के दशक की शुरुआत में फैक्ट्री शब्द का मतलब कोई इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट नहीं था. दरअसल इसे एक ट्रेडिंग पोस्ट माना जाता था जहां पर ब्रिटिश फैक्टर्स रहते थे और व्यापार करते थे. फैक्टर्स का मतलब होता था कंपनी के एजेंट. इन फैक्ट्रियों में सामान रखने के लिए गोदाम, रहने के लिए क्वार्टर और प्रशासनिक कार्यालय शामिल थे. उनका एकमात्र उद्देश्य भारतीय सामान खरीदना और मुनाफे के लिए उन्हें यूरोप एक्सपोर्ट करना था. 

कपास, मलमल और रेशम का व्यापार

भारतीय कपड़ा ब्रिटिशों के लिए सबसे कीमती सामान था. बंगाल से सूती कपड़ा, कैलिको और बढ़िया मलमल यूरोपीय बाजार में काफी ज्यादा कीमती थे. भारतीय रेशम की काफी ज्यादा मांग थी. 17वीं सदी के आखिर तक भारत से कपड़ा एक्सपोर्ट काफी ज्यादा बढ़ गया था. 

मसाले, नील और शोरा

काली मिर्च, इलायची, दालचीनी और लॉन्ग जैसे मसाले ब्रिटिश व्यापार की शुरुआती आधार थे. नील, जिसका इस्तेमाल कपड़े को नीला रंगने के लिए किया जाता था काफी ज्यादा एक्सपोर्ट किया जाता था. उतना ही जरूरी शोरा भी था. यह बंगाल और बिहार से मिलता था और इसका इस्तेमाल बारूद में किया जाता था. 

चाय और अफीम 

18वीं और 19वीं सदी में अंग्रेजों ने अपने व्यापार का दायरा बढ़ाया. भारत में चाय की खेती को बढ़ावा दिया गया और साथ ही अफीम एक मुख्य एक्सपोर्ट बन गया. व्यापार के इस बाद के दौर ने एशियाई और ग्लोबल कॉमर्स को एक नया रूप देने में एक बड़ी भूमिका निभाई.

शाही समर्थन और एक बड़ा मोड़ 

एक बड़ी सफलता 1717 में मिली जब मुगल बादशाह फर्रुखसियर ने एक शाही फरमान जारी किया. इसे अक्सर ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्ना कार्टा कहा जाता है. इससे कंपनी को बिना कस्टम ड्यूटी दिए बंगाल में व्यापार करने की मंजूरी मिल गई. इससे उसे एक बड़ा आर्थिक फायदा हुआ और राजनीतिक दबदबे का रास्ता साफ हो गया.

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