Dabur FSSAI Action: भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण ने उन खास कंपनियों की जांच तेज कर दी है जो अपने उत्पादों की शुद्धता और गुणवत्ता के बारे में दावे करती हैं. हाल ही में डाबर इंडिया रेगुलेटर की नजर में आ गया क्योंकि उसके कई उत्पादों की मार्केटिंग बिना पर्याप्त वैज्ञानिक आधार के 100% शुद्ध और 100% प्राकृतिक जैसे दावों के साथ की जा रहा थी. इस कार्रवाई के बाद सवाल यह उठ रहा है कि क्या इन उत्पादों को अभी भी बेचा जा सकता है और अगर डाबर एफएसएसएआई के नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे कितना दंड भुगतना पड़ सकता है? आइए जानते हैं क्या है इन सवालों के जवाब.
एफएसएसएआई ने डाबर के खिलाफ कार्रवाई क्यों की?
रेगुलेटर के मुताबिक डाबर के कई उत्पादों की मार्केटिंग कुछ ऐसे दावों के साथ की जा रही थी जो खास लेबलिंग मानदंडों का पालन नहीं करते. एप्पल साइडर विनेगर और ऑर्गेनिक शहद जैसे उत्पाद कथित तौर पर बिना वैध प्राधिकरण के ऑर्गेनिक इंडिया लोगो का इस्तेमाल करके बेचे गए थे. इसके अलावा नारियल पानी और नारियल के दूध के साथ उत्पादों पर 100% शुद्धता का दावा करने वाले लेबल थे. इसी के साथ वे मिश्रित खाद्य उत्पाद थे और मौजूदा नियमों के तहत ऐसे दावों की अनुमति नहीं थी. एफएसएसएआई ने कंपनी को निर्देश दिया कि जब तक इन मुद्दों का समाधान नहीं हो जाता तब तक इन विवादित दावों वाले उत्पादों की बिक्री बंद कर दी जाए.
क्या खुदरा विक्रेताओं पर जुर्माना लगाया जा सकता है?
अगर कोई वितरक, खुदरा विक्रेता या फिर खाद्य व्यवसाय ऑपरेटर ऐसे उत्पादों को बेचना जारी रखता है जो एफएसएसएआई के निर्देशों का उल्लंघन करते हैं या फिर जिन पर प्रतिबंधित लेबलिंग दावे हैं तो उन्हें खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम 2006 के तहत कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है.
उल्लंघन की प्रकृति के आधार पर जुर्माना ₹1 लाख से ₹5 लाख तक हो सकता है. खासकर अगर नियामक प्रतिबंधों के बावजूद उत्पादों की बिक्री जारी रहती है या फिर उनमें भ्रामक जानकारी होती है.
भ्रामक दावों और लेबलिंग के लिए जुर्माना
खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम में भ्रामक विज्ञापनों और गलत लेबलिंग से निपटने के प्रावधान हैं. धारा 52 और 53 के तहत पर्याप्त औचित्य के बिना 100% शुद्ध या फिर 100% प्राकृतिक जैसे गलत दावों वाले उत्पादों को बेचने वाले व्यवसायों पर ₹3,00,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. कानून का उद्देश्य उपभोक्ताओं को ऐसे दावों से प्रभावित होने से बचाना है जिन्हें वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता.
नियम ना पालन करने वाले उत्पादों की बिक्री
लेबलिंग उल्लंघन के अलावा खास उत्पादों को निर्धारित गुणवत्ता मानकों को भी पूरा करना जरूरी है. धारा 50 और 51 के तहत अगर कोई प्रोडक्ट क्वालिटी के मामले में कानूनी मानकों या फिर ग्राहकों की उम्मीद पर खरा नहीं उतरता तो अधिकारी ₹5,00,000 तक का जुर्माना लगा सकते हैं. यह नियम उन खाद्य पदार्थों पर लागू होता है जो घटिया क्वालिटी के पाए जाते हैं या फिर नियमों का पालन नहीं करते.
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क्या ये प्रोडक्ट तुरंत दुकानों से हट जाएंगे?
ऐसा जरूरी नहीं है. रेगुलेटरी निर्देश जारी होने के बाद भी विवादित लेवल वाले प्रोडक्ट कुछ समय के लिए दुकानों की शेल्फ या फिर ई-कॉमर्स प्लेटफार्म पर दिख सकते हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि कंपनियों को अक्सर पैकेजिंग अपडेट करने, ऑनलाइन लिस्टिंग में बदलाव करने, मार्केटिंग में सुधार करने और नियमों का पालन करने के लिए समय की जरूरत होती है.
ऐसे दावे ग्राहकों पर कैसे असर डाल सकते हैं?
100% शुद्ध या फिर 100% प्राकृतिक जैसे लेवल ग्राहकों को यह सोचने पर मजबूर कर सकते हैं कि दूसरे प्रतिस्पर्धी प्रोडक्ट किस तरह घटिया या फिर कम असली हैं. हालांकि भारत में बिकने वाले सभी पैक्ड फूड को एफएसएसएआई द्वारा तय खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करना होता है. इस वजह से बिना सबूत वाले शुद्धता के दावे अनुचित व्यावसायिक फायदा दिला सकते हैं और गुमराह करने वाली मार्केटिंग के जरिए खरीदारी के फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं.
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