Malwa Canal Project: उत्तर भारत में पानी के हक को लेकर दो राज्यों के बीच तकरार छिड़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला एक नए प्रोजेक्ट को लेकर गर्माया हुआ है. पंजाब सरकार की महात्वाकांक्षी मालवा नहर परियोजना ने हरियाणा और पंजाब के प्रशासनिक गलियारों में एक बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है. 2300 करोड़ की लागत से तैयार होने वाली यह नहर ने पुरानी कड़वाहट को दोबारा जिंदा कर दिया है. चलिए विस्तार से इसके बारे में जानें.

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आजादी के बाद पंजाब का सबसे बड़ा वाटर प्रोजेक्ट

पंजाब सरकार इस पूरी परियोजना को राज्य के इतिहास का मील का पत्थर मान रही है. सरकारी दावों के मुताबिक, देश की आजादी के बाद यह पंजाब की पहली ऐसी नहर परियोजना है, जिसे इतने बड़े पैमाने पर तैयार किया जा रहा है. आंकड़ों पर नजर डालें  तो इस नई नहर की कुल लंबाई करीब 150 किलोमीटर होने वाली है. इसकी चौड़ाई 50 फीट और गहराई साढ़े बारह फीट तय की गई है. इस विशाल ढांचे के जरिए करीब 2000 क्यूसेक पानी बहाने की क्षमता विकसित की जाएगी, जो क्षेत्र के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह से बदलने का दम रखती है.

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हरिके से शुरू होकर हरियाणा की सरहद तक जाने का रास्ता

इस कनाल का रूट बेहद दिलचस्प और रणनीतिक तौर पर तैयार किया गया है. यह नहर फिरोजपुर जिले में सतलुज नदी पर बने मशहूर हरिके हेडवर्क्स से निकाली जाएगी. इसके बाद यह पहले से जमीन पर मौजूद सरहिंद फीडर और राजस्थान फीडर नामक दो बड़ी नहरों के बिल्कुल साथ-साथ आगे बढ़ेगी. पंजाब के अलग-अलग इलाकों से होते हुए यह कनाल सीधे हरियाणा की सीमा के नजदीक बसे मुक्तसर जिले के वारिंग खेड़ा गांव तक जाकर खत्म होगी. सरहद के इतने करीब जाकर कनाल का खत्म होना ही इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ माना जा रहा है.

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सूखे खेतों को हरा-भरा बनाने की कोशिश

पंजाब सरकार का तर्क है कि इस पूरे तामझाम के पीछे उसका मकसद केवल अपने किसानों की भलाई करना है. दक्षिणी पंजाब का मालवा इलाका लंबे समय से पानी की किल्लत और सूखे जैसी मार झेलता आया है. खासकर खरीफ के मौसम में जब धान की बुवाई के लिए पानी की मांग बहुत होती है, तब यहां के किसानों को भारी दिक्कत का सामना करना होता है. सरकार का दावा है कि इस नई नहर के चालू होने से मालवा क्षेत्र की लगभग दो लाख एकड़ खेती योग्य जमीन सो सीधा सिंचाई का पानी मिल सकेग, जिससे किसानों की किस्मत बदल जाएगी.

हरियाणा की आपत्ति और तकनीकी ब्लूप्रिंट

जैसे ही पंजाब ने इस प्रोजेक्ट पर कदम आगे बढ़ाए, पड़ोसी राज्य हरियाणा ने इस पर अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज करा दी. उत्तरी क्षेत्रीय परिषद की बैठक में हरियाणा सरकार के प्रतिनिधियों ने साफ कहा कि पंजाब को इस नहर की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानि डीपीआर उनके साथ साझा करनी चाहिए. हरियाणा का सीधा सवाल यह है कि पंजाब इस बात को तकनीकी रूप से साबित करे कि इस नई नहर को भरने के लिए 2000 क्यूसेक पानी आखिर कहां से लाया जाएगा. हरियाणा को अंदेशा है कि अगर पंजाब ने ऊपर ही पानी रोक लिया, तो उनके निचले इलाकों में पानी का संकट गहरा जाएगा.

सतलुज-यमुना लिंक यानि एसवाईएल विवाद

हरियाणा के विरोध की सबसे बड़ी और बुनियादी वजह दशकों पुराना सतलुज-यमुना लिंक यानि एसवाईएल नहर विवाद है. हरियाणा का कहना है कि जब भी अदालती आदेशों के तहत एसवाईएल के जरिए हरियाणा को उसका हक देने की बात आती है तो पंजाब हमेशा से हाथ खड़े कर देता है. पंजाब का हमेशा से यह स्टैंड रहा है कि उसके पास किसी दूसरे राज्य को देने के लिए पानी की एक भी अतिरिक्त बूंद मौजूद नहीं है. ऐसे में हरियाणा का पूछना है कि अगर पंजाब के पास वाकई पानी खत्म हो चुका है तो अपनी इस नई और विशालकाय नहर के लिए उसके पास अचानक इतना पानी कहां से आया.

पंजाब सरकार का अक्रामक रुख

इस चौतरफा घेराबंदी के बीच पंजाब सरकार ने भी अक्रामक रुख अपना रखा है. पंजाब ने पानी का हिसाब-किताब रखने वाली केंद्रीय एजेंसी, भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड के आंकड़ों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया है. पंजाब का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों के पास उत्तरी राज्यों के जलाशयों में मौजूद पानी का सही और रीयल-टाइम डेटा ही नहीं है, उनके मूल्यांकन का तरीका पुराना है. वहीं पंजाब के मुख्यमंत्रियों और अधिकारियों का साफ तौर पर कहना है कि वे इस नहर के लिए किसी दूसरे राज्य के हिस्से का पानी नहीं चुरा रहे हैं, बल्कि अपने ही कोटे से पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं.

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