कॉकरोच जनता पार्टी CJP के नेता आशुतोष रांका और सोरभ दास को जंतर-मंतर पर बिना अनुमति प्रदर्शन करने और पहले से तय बॉन्ड की शर्तों का उल्लघंन करने के आरोप में कोर्ट ने जेल भेज दिया है. हालिया सुनवाई में विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों की न्यायिक हिरासत को दो और दिनों के लिए बढ़ा दिया है, जिसके कारण वे फिलहाल तिहाड़ जेल में बंद हैं.

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इस हाई-प्रोफाइल मामले के बाद से न्यायिक हिरासत शब्द एक बार फिर देश भर में सुर्खियों में आ गया है. आखिर न्यायिक हिरासत क्या होती है, यह पुलिस कस्टडी से कितनी अलग है और कानूनन किसी व्यक्ति को इसके तहत ज्यादा से ज्यादा कितने दिनों तक अंदर रखा जा सकता है. 

क्या होती है न्यायिक हिरासत?

न्यायिक हिरासत का मतलब होता है आरोपी का अदालत की कस्टडी में होना.जब किसी आरोपी को पुलिस गिरफ्तार करती है, तो कानून के मुताबिक उसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य होता है. अगर कोर्ट को लगता है कि आरोपी से पूछताछ पूरी हो चुकी है या उसे पुलिस के पास रखने की जरूरत नहीं है, तो मजिस्ट्रेट उसे जेल भेजने का आदेश देते हैं.

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न्यायिक हिरासत के दौरान आरोपी पुलिस लॉकअप में नहीं, बल्कि सेंट्रल जेल में बंद रहता है. इस दौरान आरोपी पूरी तरह से कोर्ट के नियंत्रण में होता है और पुलिस मजिस्ट्रेट की लिखित अनुमति के बिना जेल में जाकर उससे पूछताछ भी नहीं कर सकती है.

पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत में अंतर

इन दोनों हिरासतों के बीच का अंतर जानना बेहद जरूरी है. पुलिस हिरासत में आरोपी सीधे पुलिस स्टेशन के लॉकअप में रहता है और पुलिस अधिकारी उससे अपराध के सबूत जुटाने के लिए आमने-सामने पूछताछ करते हैं. इसके विपरीत, न्यायिक हिरासत में सुरक्षा की जिम्मेदारी जेल प्रशासन की होती है, जो सीधे अदालत के प्रति जवाबदेह होता है. जेल में बंद रहने के दौरान आरोपी के कानूनी अधिकारों की सुरक्षा अधिक मजबूत होती है क्योंकि वहां पुलिस का सीधा दखल नहीं रहता.

ज्याद से ज्यादा कितने दिन रहना होता है अंदर

भारतीय कानून के तहत न्यायिक हिरासत की एक बार की अधिकतम सीमा 15 दिन की होती है. यानी कोर्ट एक बार के आदेश में किसी भी आरोपी को अधिकतम 15 दिनों के लिए ही न्यायिक हिरासत में जेल भेज सकता है. हालांकि, यदि जांच एजेंसी या पुलिस को लगता है कि आरोपी की रिहाई से कानून-व्यवस्था को खतरा है या जांच प्रभावित हो सकती है, तो वे मजिस्ट्रेट से हिरासत बढ़ाने की मांग कर सकते हैं. कोर्ट इस अवधि को बार-बार 15-15 दिन करके आगे बढ़ा सकता है.

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अंतिम सीमा के कड़े नियम

बार-बार हिरासत बढ़ाने की भी कानून में एक आखिरी और तय समय सीमा तय की गई है, जिसे चार्जशीट दाखिल करने की अवधि से जोड़ा जाता है. अगर किसी आरोपी पर ऐसे अपराध का आरोप है जिसमें मौत की सजा, उम्रकैद या 10 साल से ज्यादा की जेल हो सकती है, तो पुलिस को 90 दिनों के भीतर अदालत में चार्जशीट दाखिल करनी होती है.

अन्य सामान्य या कम गंभीर मामलों में यह समय सीमा 60 दिनों की होती है. कानून का नियम कहता है कि यदि पुलिस इस तय 60 या 90 दिनों के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती है, तो आरोपी को डिफॉल्ट बेल यानी कानूनी तौर पर जमानत पाने का अधिकार मिल जाता है, भले ही उसका अपराध कितना भी बड़ा क्यों न हो.

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