भारत में इस साल अप्रैल के महीने ने ही जून जैसी तपिश का अहसास करा दिया है. देश के उत्तर से लेकर दक्षिण तक पारा 40 डिग्री सेल्सियस की दहलीज को पार कर 46-47 डिग्री तक पहुंच चुका है. सड़कों पर सन्नाटा है और हवाएं भट्टी जैसी गर्म महसूस हो रही हैं. इस भीषण गर्मी के पीछे जो सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है, वह है हीट डोम. यह कोई साधारण लू या हीटवेव नहीं है, बल्कि वातावरण की एक ऐसी स्थिति है जिसमें इंसान किसी बंद और गर्म ओवन के अंदर फंसा हुआ महसूस करता है. दिल्ली, लखनऊ, भोपाल से लेकर अकोला और तेलंगाना तक मचे इस हाहाकार ने दुनिया को चौंका दिया है क्योंकि दुनिया के 100 सबसे गर्म शहरों की सूची में से 95 शहर अकेले भारत के हैं.

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क्या है हीट डोम का विज्ञान और कैसे बनता है गुंबद?

हीट डोम को समझने के लिए आप एक प्रेशर कुकर या ढक्कन लगे बर्तन की कल्पना कीजिए. मौसम विज्ञान के अनुसार, जब ऊपरी वायुमंडल में उच्च दबाव का एक बहुत बड़ा क्षेत्र बन जाता है, तो वह किसी ढक्कन की तरह काम करने लगता है. सामान्य तौर पर सूरज की रोशनी से गर्म होकर हवा ऊपर उठती है और ठंडी हो जाती है, जिससे बादल बनते हैं या तापमान संतुलित रहता है. लेकिन हीट डोम की स्थिति में उच्च दबाव वाली हवा नीचे की ओर उतरती है और सतह की गर्म हवा को ऊपर नहीं उठने देती है. यह प्रक्रिया गर्म हवा को एक गुंबद की तरह एक ही जगह पर कैद कर लेती है, जिससे तापमान लगातार बढ़ता ही चला जाता है.

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वातावरण की कैद में तपती गर्म हवाएं

जब यह गर्म हवा गुंबद के अंदर फंस जाती है, तो सूरज की किरणें इसे और ज्यादा तपाती रहती हैं. चूंकि हवा बाहर नहीं निकल पाती और न ही ठंडी हवा अंदर आ पाती है, इसलिए उस पूरे इलाके में गर्मी जमा होती रहती है. समुद्र के ऊपर गर्म हवा का बनना और उच्च दबाव द्वारा उसे नीचे धकेलना इस प्रक्रिया को और ज्यादा हिंसक बना देता है. यही कारण है कि उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से लेकर मध्य प्रदेश और राजस्थान के रेगिस्तानी क्षेत्रों तक में तापमान रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. यहां तक कि रात के समय भी पारा नीचे नहीं गिर रहा है, जिससे लोगों को चौबीसों घंटे राहत नहीं मिल पा रही है.

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हीटवेव और हीट डोम के बीच का बड़ा फर्क

अक्सर लोग हीटवेव (लू) और हीट डोम को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन इनमें तकनीकी अंतर है. हीटवेव आमतौर पर कुछ दिनों की मौसमी घटना होती है, जो हवाओं के रुख के साथ बदल सकती है. वहीं, हीट डोम एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र को अपनी चपेट में लेता है और लंबे समय तक वहां गर्मी को ट्रैप यानी कैद करके रखता है. नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के मुताबिक, जब मजबूत उच्च दबाव वाली स्थितियां एक ही जगह स्थिर हो जाती हैं, तो वह हीट डोम का रूप ले लेती हैं. यह हीटवेव के मुकाबले कहीं अधिक स्थिर और विनाशकारी होता है, क्योंकि यह जल्दी खत्म नहीं होता है.

कितना खतरनाक है हीट वेव?

हीट डोम को विशेषज्ञों ने साइलेंट किलर का नाम दिया है. यह इंसान के शरीर को धीरे-धीरे अंदर से खोखला करता है. जब तापमान 45 डिग्री के पार जाता है और हीट इंडेक्स (महसूस होने वाली गर्मी) 50 डिग्री तक पहुंच जाता है, तो शरीर का कूलिंग सिस्टम फेल होने लगता है. इससे हीट स्ट्रोक, गंभीर डिहाइड्रेशन, किडनी फेलियर और हृदय संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ती हैं. खासकर बुजुर्गों, छोटे बच्चों और चिलचिलाती धूप में काम करने वाले मजदूरों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित होती है. रात में भी ठंडक न मिलने के कारण शरीर की रिकवरी नहीं हो पाती, जो मानसिक तनाव और शारीरिक थकान को कई गुना बढ़ा देती है.

भारत के नक्शे पर गर्मी का सबसे भीषण हमला

वर्तमान में भारत के कई बड़े शहर इस अदृश्य गुंबद के नीचे तप रहे हैं. उत्तर भारत में दिल्ली, कानपुर, बांदा और लखनऊ जैसे शहर आग की लपेट में हैं. मध्य प्रदेश के भोपाल, इंदौर और ग्वालियर में भीषण गर्मी का प्रकोप है. महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में अकोला, अमरावती और वर्धा जैसे जिलों में पारा 45 डिग्री के ऊपर बना हुआ है. वहीं राजस्थान और तेलंगाना में भी स्थिति भयावह है. गर्मी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के इन शहरों का तापमान वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक दर्ज किया जा रहा है. यह स्थिति न केवल इंसानों बल्कि फसलों और पशुओं के लिए भी काल बन रही है.

प्रकृति और खेती पर मंडराता संकट

हीट डोम का असर सिर्फ अस्पताल की कतारों तक सीमित नहीं है. यह भारत की कृषि अर्थव्यवस्था को भी गहरी चोट पहुंचा रहा है. भीषण तापमान के कारण खेतों में खड़ी फसलें समय से पहले सूख रही हैं, जिससे पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है. इसके साथ ही जल संकट भी गहराता जा रहा है क्योंकि झीलों और नदियों का पानी तेजी से वाष्पित हो रहा है. भारत में मानसून से पहले यानी मार्च से जून के बीच हीट डोम बनने की आवृत्ति पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ी है. जलवायु परिवर्तन के कारण अब ये घटनाएं अधिक समय तक टिकने वाली और अधिक विनाशकारी होती जा रही हैं.

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