अकबर और बीरबल की दोस्ती के किस्से हर किसी ने सुने हैं. दरबार की हंसी-मजाक से लेकर मुश्किल सवालों के जवाब तक, बीरबल हमेशा बादशाह के सबसे भरोसेमंद साथी रहे. लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा दिन भी दर्ज है, जब यही रिश्ता गहरे दुख में बदल गया था. एक सैन्य अभियान, एक गलत आकलन और पहाड़ी दर्रों में हुआ घातक हमला, जिसने न सिर्फ बीरबल की जान ली, बल्कि अकबर को भी भीतर तक तोड़ दिया था.

बीरबल कौन थे और क्यों खास थे?

बीरबल, जिनका असली नाम महेश दास था, मुगल सम्राट अकबर के नवरत्नों में शामिल थे. वे अपनी बुद्धिमत्ता, कूटनीति और हाजिरजवाबी के लिए मशहूर थे. हालांकि लोककथाओं और टीवी कहानियों में उन्हें हास्य-प्रसंगों से जोड़ा जाता है, लेकिन वे दरबार में गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिका भी निभाते थे. अकबर उन्हें बेहद करीब मानते थे और कई मामलों में उनकी राय को महत्व देते थे. 

स्वात और बाजौर में बढ़ता संकट

16वीं सदी के उत्तरार्ध में अफगानिस्तान के कुछ इलाके मुगल शासन के अधीन थे, लेकिन स्वात और बाजौर क्षेत्र में युसूफजई कबीले के विद्रोही सक्रिय हो गए थे. वहां के स्थानीय लोगों को परेशान किया जा रहा था और मुगल प्रभाव को चुनौती दी जा रही थी. इतिहासकार शाजी जमां की पुस्तक ‘अकबर’ और अबुल फजल द्वारा लिखित अकबरनामा में इस अभियान का उल्लेख मिलता है. विद्रोह की खबर जब अकबर तक पहुंची, तो उन्होंने अपने विश्वस्त सेनापति जैन खान कोका को सेना के साथ भेजा, लेकिन पहाड़ी इलाकों में लड़ाई आसान नहीं थी. कोका को कड़ा प्रतिरोध झेलना पड़ा और उन्होंने अतिरिक्त सहायता की मांग की. 

बीरबल को भेजने का फैसला

अकबर के सामने विकल्प था कि अबुल फजल या बीरबल को अतिरिक्त सेना के साथ भेजा जाए. अबुल फजल स्वयं जाने को तैयार थे, लेकिन अकबर ने बीरबल को चुना. यही निर्णय बाद में भारी साबित हुआ. बीरबल बौद्धिक रूप से अत्यंत तेज थे, लेकिन युद्धकला में उनका अनुभव सीमित था. फिर भी उन्हें लगभग 8000 सैनिकों के साथ उत्तर-पश्चिमी मोर्चे पर भेज दिया गया. यह 1586 का समय माना जाता है.

मलंदराई दर्रे में घात

मुगल सेना जब मलंदराई दर्रे के पास पहुंची, तो युसूफजई लड़ाकों ने ऊंचाई से हमला किया. समकालीन इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी के अनुसार, विद्रोहियों ने पहाड़ियों से तीरों और पत्थरों की बारिश कर दी. संकरे रास्ते और दुर्गम भूभाग के कारण मुगल सैनिकों को संभलने का मौका नहीं मिला. बीबीसी की मानें तो इस हमले में 8000 सैनिक मारे गए. बीरबल भी वहीं युद्धभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए. उनके पार्थिव शरीर को वापस लाया नहीं जा सका, जो अकबर के लिए और भी गहरा आघात था. 

अकबर का शोक और गुस्सा

जब बीरबल की मृत्यु का समाचार दरबार पहुंचा, तो अकबर स्तब्ध रह गए. कहा जाता है कि दो दिन तक उन्होंने न भोजन किया, न पानी पिया. वे दरबार में उपस्थित नहीं हुए और जनता को झरोखे से दर्शन भी नहीं दिए. तूरान से आए दूत से मिलने से भी उन्होंने इनकार कर दिया था. 

अबुल फजल ने अकबरनामा में लिखा है कि बादशाह ने कुछ समय तक किसी काम में रुचि नहीं दिखाई. बाद में उनकी मां हमीदा बानो बेगम और दरबारियों ने उन्हें संभालने की कोशिश की. बदायूंनी के अनुसार, अकबर जैन खान कोका से बेहद नाराज थे और उन्होंने उन्हें अपनी शक्ल न दिखाने का आदेश दिया. अकबर इस बात से भी दुखी थे कि वे बीरबल का अंतिम संस्कार सम्मानपूर्वक नहीं कर सके. कुछ विवरणों में यह भी उल्लेख मिलता है कि वे स्वयं काबुल जाने का विचार कर रहे थे, लेकिन सलाहकारों ने उन्हें रोका. 

कैसे और किससे लिया था बदला? 

बीरबल की मृत्यु के कुछ ही सप्ताह बाद अकबर ने निर्णायक कदम उठाया. इस बार अभियान की कमान राजा टोडरमल को सौंपी गई. मुगल सेना ने संगठित तैयारी के साथ स्वात और बाजौर में दोबारा हमला किया. इस बार रणनीति अधिक सख्त और योजनाबद्ध थी. मुगल सेना को सफलता मिली और विद्रोही दबा दिए गए. इसे बीरबल की मृत्यु का प्रतिशोध माना गया. अकबर ने बीरबल को याद करते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ में सर्वश्रेष्ठ कहा.

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