Body Donation: केईएम हॉस्पिटल की एमबीबीएस छात्र सेजल पवार का नाम इन दिनों एक कॉमेडी वायरल वीडियो को लेकर चर्चा में है. स्टैंड अप कॉमेडी शो में मेडिकल शिक्षा और देहदान से जुड़े विषय पर की गई, उनकी टिप्पणियों के बाद विवाद लगातार बढ़ता गया. मामला इतना बड़ा कि अस्पताल और मेडिकल कॉलेज प्रशासन को जांच समिति गठित करनी पड़ी. शुरुआती जांच के बाद से सेजल पवार को 15 दिनों के लिए फोर्स्ड लीव पर भेज दिया गया, जबकि महाराष्ट्र साइबर सेल ने भी मामले में एफआईआर दर्ज की है. मामले के सामने आने के बाद देहदान और मेडिकल एजुकेशन में उसकी भूमिका को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है. ऐसे में चलिए अब आपको बताते हैं कि देहदान में मिले शरीर का डॉक्टर क्या करते हैं और मेडिकल कॉलेज में इसकी पूरी प्रक्रिया क्या होती है. 

Continues below advertisement

मेडिकल शिक्षा की नींव बनते हैं देहदान में मिले शरीर 

भारत में मृत्यु के बाद देहदान की परंपरा धीरे-धीरे बढ़ रही है. जागरूकता बढ़ाने के साथ अब बड़ी संख्या में लोग अपना शरीर मृत्यु के बाद मेडिकल एजुकेशन के लिए दान कर रहे हैं. देशभर के मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के छात्र इन्हीं देहदान में मिले शवों के जरिए मानव शरीर की बनावट, अंगों की स्थिति और उनके काम करने की प्रक्रिया को समझते हैं. मेडिकल एक्सपर्ट्स का कहना है कि किताबें और चित्रों से शरीर की संरचना को समझना एक बात है, लेकिन वास्तविक शरीर के माध्यम से पढ़ाई करने से छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान मिलता है. यही कारण है कि मेडिकल शिक्षा में कैडेवर यानी देहदान में मिले शवों की भूमिका बहुत जरूरी मानी जाती है. 

Continues below advertisement

शव का मेडिकल कॉलेज पहुंचते ही किया जाता है सम्मान

मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के अनुसार छात्र देहदान करने वाले व्यक्ति को अपना पहला शिक्षक मानते हैं. जब किसी देहदानी का शरीर मेडिकल कॉलेज पहुंचता है, तो छात्र डॉक्टर और प्रोफेसर उसका सम्मान करते हैं. शव को कॉलेज परिसर में ले जाने के बाद डिस्प्ले रूम में रखा जाता है, जहां सभी लोग उसे श्रद्धांजलि देते हैं. कई जगह पर फूल अर्पित किए जाते हैं और आत्मा की शांति के लिए मौन भी रखा जाता है. इसके बाद ही शरीर को मेडिकल शिक्षा के लिए उपयोग में लाया जाता है. 

शरीर की चीर-फाड़ से पहले होती है प्रार्थना 

मेडिकल कॉलेज में देहदान में मिले शवों का उपयोग सीधे पढ़ाई के लिए नहीं किया जाता, बल्कि पहले उस संस्थान की ओर से मृतक के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. छात्र और टीचर मिलकर श्रद्धांजलि देते हैं और आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं. इसके बाद एनाटॉमी डिपार्टमेंट में मेडिकल छात्रों को मानव शरीर की वास्तविक संरचना समझने के लिए शव का उपयोग किया जाता है. छात्र शरीर के अलग-अलग अंगों, मांसपेशियों, नसों और दूसरी संरचनाओं के बारे में जानते हैं. 

ये भी पढ़ें-Explained: IVF क्लीनिक में बच्चा बदली का खुलासा! कैसे गर्भाशय की जगह कांच की प्लेट पर बनता भ्रूण, भारत में क्यों बढ़ रहा चलन?

डॉक्टर बनने में क्यों जरूरी है देहदान 

एक्सपर्ट्स के अनुसार मेडिकल छात्र देहदान में मिले शवों के माध्यम से यह सीखते हैं कि शरीर के अंदर कौन सा अंग कहां स्थित है और उसका काम क्या है. शरीर की आंतरिक संरचना को समझने के लिए यह परीक्षण बहुत जरूरी माना जाता है. इस वजह से मेडिकल सेक्टर में देहदान करने वाले लोगों को विशेष सम्मान दिया जाता है. कई डॉक्टर उन्हें अपना पहला टीचर भी कहते हैं, क्योंकि उनकी वजह से ही छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त होता है. इसके अलावा मेडिकल कॉलेज की ओर से देहदान करने वाले लोगों के साथ उनके परिवारों को भी सम्मानित किया जाता है. कई मेडिकल कॉलेज में देहदान करने वाले परिवार को सर्टिफिकेट दिया जाता है.

ये भी पढ़ें-Heart Disease Risk In Women: वक्त से पहले मेनोपॉज हुआ तो बढ़ जाता है इस बीमारी का खतरा, महिलाओं को भारी पड़ रही यह दिक्कत