परमाणु हथियार यह शब्द सुनते ही एक भयानक तस्वीर जहन में उभर आती है. भले ही इतिहास में केवल एक-दो बार इस हथियार का इस्तेमाल हुआ हो, लेकिन इसकी मौजूदगी ही अंतरराष्ट्रीय राजनीति और सुरक्षा की दिशा तय करने वाली एक बड़ी शक्ति बन चुकी है. आइए सरल भाषा में समझें कि परमाणु बम क्या है, यह कैसे काम करता है, और इसे बनाने के लिए किन चीजों की जरूरत होती है.

कैसे बनता है परमाणु बम?

परमाणु बम एक ऐसा हथियार है जो अत्यधिक ऊर्जा नाभिकीय प्रक्रियाओं से रिलीज करके बड़ा विनाश करता है. वैज्ञानिक भाषा में इसके दो प्रकार होते हैं, एक में नाभिकीय विखंडन (फिशन) की प्रक्रिया प्रमुख होती है और दूसरे में नाभिकीय संलयन (फ्यूजन) शामिल होता है. सरल शब्दों में कहें तो इन प्रक्रियाओं में परमाणु के अंदर होने वाली प्रतिक्रियाएं अचानक और नियंत्रित तरीके से बहुत अधिक ऊर्जा छोड़ देती हैं, जिससे एक विशाल धमाका, तेज ऊष्मा और रेडियोधर्मिता पैदा होती है.

किसी भी परमाणु बम बनाने में आमतौर पर यूरेनियम या प्लूटोनियम जैसी चीजें लगती हैं. खासतौर से यूरेनियम-233 और प्लूटोनियम-239 के नाभिकों के विखंडन से ही भारी ऊर्जा निकलती है. यू-233 और प्लूटो-239, इन इजोटोप्स के नाभिकीय विखंडन की प्रक्रिया बम की ऊर्जा का स्रोत होती है.

किस काम के लिए हो परमाणु बमों का इस्तेमाल

किसी भी देश के लिए परमाणु क्षमता हासिल करना केवल तकनीकी नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक निर्णय भी होता है. कई देशों ने इसे सुरक्षा-चिंता, क्षेत्रीय सामरिक संतुलन या राजनैतिक प्रतिष्ठा के कारण अपनाया है. वहीं दूसरी तरफ, परमाणु हथियारों के विनाशकारी मानवीय और पर्यावरणीय परिणामों को देखते हुए वैश्विक स्तर पर उनका प्रसार रोकने के कई प्रयास भी चले आ रहे हैं. 

NPT यानि नॉन‑प्रोलिफेरेशन ट्रीटी, IAEA जैसी संस्थाएं और विभिन्न द्विपक्षीय-बहुपक्षीय समझौते इस दिशा में काम करते हैं. इनके जरिए यह सुनिश्चित करने की कोशिश होती है कि नाभिकीय तकनीक केवल शांतिपूर्ण उपयोग के लिए रहे, जैसे कि बिजली, चिकित्सा या शोध के काम के लिए.

परमाणु हथियारों का प्रभाव

परमाणु हथियारों के प्रभाव बहुत व्यापक और लम्बे समय तक रहने वाले होते हैं, तत्काल धमाका, आग और गर्मी के साथ-साथ रेडियोधर्मिता से होने वाले दीर्घकालिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय नुकसान बड़े प्रभाव होते हैं. भ्रूण-विकास पर प्रभाव, कैंसर का जोखिम, कृषि भूमि का दूषित होना और सामाजिक‑आर्थिक विनाश ऐसे कुछ स्वरूप हैं, जिनसे प्रभावित क्षेत्र दशकों तक उबर नहीं पाता. यही कारण है कि मानवीय कारणों से भी इनके नियंत्रण और निरस्त्रीकरण पर जोर दिया जाता है.

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