West Bengal CM Suvendu Adhikari: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल करते हुए पहली बार राज्य में अपनी सरकार बना ली है. भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और वह बंगाल के पहले भाजपा मुख्यमंत्री बन गए. उनके साथ दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनीया, खुदीराम टुडू और निशीथ प्रमाणिक ने मंत्री पद की शपथ ली.
अभी आधिकारिक तौर पर डिप्टी सीएम के नाम की घोषणा नहीं हुई है, लेकिन बंगाल की राजनीति में दिलीप घोष, रूपा गांगुली और अग्निमित्रा पॉल को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने की चर्चा तेज है. इसी वजह से एक बार फिर डिप्टी सीएम का पद चर्चा के केंद्र में आ गया है. ऐसे में आइए जानते हैं कि डिप्टी सीएम को क्या अलग से सैलरी मिलती है और इस पोस्ट के लिए पार्टियां क्यों जान लगा देती हैं. डिप्टी सीएम होता क्या है?
डिप्टी सीएम यानी उपमुख्यमंत्री राज्य सरकार में मुख्यमंत्री के बाद सबसे जरूरी नेताओं में गिना जाता है. हालांकि, संविधान में इस पद का सीधा उल्लेख नहीं है, फिर भी कई राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक संतुलन बनाने के लिए यह पद बनाया जाता है. जब किसी राज्य में सरकार बनती है तो राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है. इसके बाद मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्रियों की नियुक्ति होती है. कई बार राजनीतिक समीकरण साधने, अलग-अलग जातीय और क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने या गठबंधन को मजबूत रखने के लिए डिप्टी सीएम बनाया जाता है.
क्या डिप्टी सीएम को अलग से मिलती है सैलरी?
डिप्टी सीएम बनने पर अलग और ज्यादा सैलरी नहीं मिलती है. उपमुख्यमंत्री को वही वेतन और सुविधाएं मिलती हैं जो एक कैबिनेट मंत्री को मिलती हैं. उन्हें सरकारी बंगला, स्टाफ, सुरक्षा, गाड़ी और अन्य भत्ते भी कैबिनेट मंत्री के बराबर मिलते हैं. हालांकि, पद की राजनीतिक ताकत ज्यादा मानी जाती है, क्योंकि सरकार में उनकी स्थिति मुख्यमंत्री के बाद सबसे अहम नेताओं में होती है.
डिप्टी सीएम के पास कितनी ताकत होती है?
डिप्टी सीएम के पास मुख्यमंत्री जैसी संवैधानिक शक्तियां नहीं होती हैं, वह सिर्फ उन्हीं विभागों में फैसले ले सकते हैं जिनकी जिम्मेदारी उन्हें दी जाती है. मुख्यमंत्री चाहे तो उन्हें बड़े और जरूरी विभाग दे सकता है. हालांकि, मुख्यमंत्री की अनुमति के बिना उपमुख्यमंत्री पूरे राज्य के लिए कोई बड़ा फैसला नहीं ले सकता है. कई बार मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति में डिप्टी सीएम कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता कर सकता है और सरकारी कार्यक्रमों में सरकार का प्रतिनिधित्व भी करता है.
पार्टियां डिप्टी सीएम पद के लिए क्यों जान लगा देती हैं?
भारतीय राजनीति में डिप्टी सीएम का पद सिर्फ प्रशासनिक नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी बेहद जरूरी माना जाता है.कई बार चुनाव जीतने के बाद अलग-अलग समुदायों, क्षेत्रों और नेताओं को संतुष्ट करने के लिए यह पद दिया जाता है. इससे पार्टी के अंदर संतुलन बना रहता है. यही वजह है कि कई बार एक राज्य में दो-दो या तीन-तीन डिप्टी सीएम भी बनाए जाते हैं.
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भारत में कब शुरू हुआ डिप्टी सीएम का पद?
भारत में सबसे पहले साल 1946 में बिहार में उपमुख्यमंत्री का पद बनाया गया था. कांग्रेस नेता Anugrah Narayan Sinha देश के पहले डिप्टी सीएम माने जाते हैं. उन्होंने बिहार में डॉ. श्रीकृष्ण सिंह सरकार में उपमुख्यमंत्री के तौर पर काम किया था. इसके बाद धीरे-धीरे कई राज्यों में यह पद बनने लगा.1967 के बाद जब राज्यों में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हुआ, तब डिप्टी सीएम बनाने का चलन तेजी से बढ़ गया.
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