MLA Powers: पश्चिम बंगाल में हाल के चुनावी झटके के बाद ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से अपने ही पार्टी के कुछ विधायकों पर उनके खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगाया है. साथ ही उन्होंने चेतावनी भी दी है कि अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी. इस राजनीतिक ड्रामे के बीच एक सवाल लोगों के मन में उठ रहा है कि आखिर एक विधायक अपने निर्वाचन क्षेत्र में कितना शक्तिशाली होता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
सरकारी प्रोटोकॉल में एक विधायक का स्थान
भारत सरकार की प्रोटोकॉल प्रणाली के तहत जिसे वारंट ऑफ प्रेसिडेंस भी कहा जाता है एक एमएलए को काफी बड़ा आधिकारिक दर्जा प्राप्त होता है. औपचारिक रैंकिंग में विधायक को कई वरिष्ठ नौकरशाहों से ऊपर रखा जाता है. इनमें जिला कलेक्टर और कुछ मामलों में मुख्य सचिव भी शामिल हैं.
इस प्रोटोकॉल की वजह से सरकारी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वह निर्वाचित विधायकों के साथ बातचीत करते समय औपचारिक सम्मान दिखाएं. कई राज्यों में प्रशासनिक दिशा निर्देश अधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे विधायकों के साथ सम्मानपूर्वक मिलें, उनके पत्रों का जवाब दें और साथ ही उनके उठाए गए सार्वजनिक मुद्दों को सुनें.
क्या एक विधायक सीधे अधिकारियों को आदेश दे सकता है?
कानूनी रूप से एक विधायक किसी अधिकारी को नियमों का उल्लंघन करने या फिर कानून को दरकिनार करने के लिए मजबूर नहीं कर सकता. वे कार्यकारी प्रशासकों की तरह काम नहीं करते. हालांकि उनका प्रभाव काफी ज्यादा होता है क्योंकि वे जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं.
जैसे एक विधायक सड़क की समस्या, कानून व्यवस्था की चिंता, बिजली के मुद्दों या फिर कल्याणकारी योजनाओं जैसी सार्वजनिक शिकायतों के संबंध में स्टेशन हाउस ऑफिसर, सब इंस्पेक्टर, ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर या फिर जिला कलेक्टर से संपर्क कर सकता है. हालांकि राजनीतिक भाषा में इन बातचीत को अक्सर आदेश के रूप में दिखाया जाता है लेकिन तकनीकी रूप से ये जनहित में की गई सिफारिश या फिर मांग होती है.
ये भी पढ़ें: पश्चिम बंगाल में किस नेता को मिली सबसे बड़ी जीत, जानें उन्होंने कितने रिकॉर्ड तोड़े?
विधायक प्रशासन को कैसे प्रभावित करते हैं?
विधायक निगरानी समिति और बैठकों के जरिए जिला स्तरीय प्रशासन में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं. वे कई विकास और निगरानी निकायों के सदस्य होते हैं. यहां अधिकारियों को रिपोर्ट देनी होती है और साथ ही सरकारी परियोजनाओं की प्रगति के बारे में भी बताना होता है.
विधानसभा सत्र के दौरान विधायक विभाग और मंत्रियों के खिलाफ सवाल भी उठा सकते हैं. बहस, प्रश्नकाल और सार्वजनिक चर्चाओं के जरिए वे प्रशासन पर दबाव बना सकते हैं. इतना ही नहीं बल्कि वे अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भी कर सकते हैं. हालांकि वे खुद की अथॉरिटी से अधिकारियों का सीधे तौर पर ट्रांसफर या फिर सस्पेंशन नहीं कर सकते.
एक विधायक की शक्तियां
स्थानीय प्रशासन पर असर डालने के अलावा विधायक की कई औपचारिक और संवैधानिक जिम्मेदारियां होती हैं. वे राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने में हिस्सा लेते हैं. विधायक राज्य के बजट पर वोट भी देते हैं और इस बात पर नजर रखते हैं की जनता का पैसा कैसे आवंटित किया जाता है और कैसे खर्च किया जा रहा है. अपने क्षेत्र के विकास के लिए मिलने वाले फंड के जरिए वे अपने इलाकों में स्थानीय विकास परियोजना की सिफारिश कर सकते हैं.
ये भी पढ़ें: किस वजह से कई साल से बंद था आसनसोल का दुर्गा मंदिर, जो बीजेपी की जीत के बाद खुला?
