West Bengal Election Results 2026: धर्म, कला, संस्कृति, तंत्र और दर्शन का केंद्र रहा बंगाल एक बार फिर सुर्खियों में हैं. यहां की सियासत करवट ले रही है. बीते 15 साल से बंगाल की सियासत पर काबिज ममता बनर्जी के हाथ से सत्ता फिसल रही है. विधानसभा चुनाव के नतीजे जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं, वैसे-वैसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) सत्ता की कुर्सी पर अपनी पकड़ मजबूत करती दिखाई दे रही है. अगर यही रुझान बने रहते हैं तो बंगाल की सियासत में यह बहुत बड़ा बदलाव होगा और पहली बार यहां बीजेपी सरकार बनाने में कामयाब होगी.
इसी के साथ भारतीय जनता पार्टी बंगाल की सियासत में भी अमर होकर इतिहास में वो सातवां निशान छोड़ देगी जिसकी कोशिश वो लंबे समय से कर रही है. दरअसल, बंगाल की सियासत में जब-जब परिवर्तन हुए उसने पूरा सियासी नक्शा ही बदल दिया. आज हम आपको क्रांतिकारियों की भूमि रही पश्चिम बंगाल की वो 6 तारीखें बताते हैं, जो यहां के सियासी पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो गईं. अगर बीजेपी सत्ता में आती है तो यह यहां की इतिहास की किताब का सातवां निशान होगी.
पहली तारीख: मुस्लिम शासन की शुरुआत
पश्चिम बंगाल शैव, शाक्त और बौद्ध संप्रदाय का गढ़ रहा है. इसके बाद यहां पाल और सेन राजाओं ने शासन किया. हालांकि, यहां की सियासत में पहला परिवर्तन 1204 ई. में हुआ. बख्तियार खिलजी ने यहां सेन राजवंश के राजा लक्ष्मण सेन को हराकर तुर्की शासन की नींव रखी और यहीं से पश्चिम बंगाल में मुस्लिम शासन की शुरुआत हो गई.
दूसरी तारीख: राजमहल का युद्ध और अफगानों की हार
बंगाल की सियासत की दूसरी अहम तारीख है 1576 का राजमहल का युद्ध. यह संघर्ष बंगाल में मुगल शासन स्थापित करने में निर्णायक साबित हुआ. 12 जुलाई, 1576 को अकबर के सेनापति खान जहान ने बंगाल के आखिरी स्वतंत्र सुल्तान दाऊद खान कर्रानी को मार डाला. इसके साथ ही बंगाल में अफगान शासन खत्म हुआ और यह सूबा भी मुगल साम्राज्य में शामिल हो गया.
तीसरी तारीख: प्लासी का युद्ध
मुगल साम्राज्य में शामिल होने के बाद लंबे समय तक बंगाल में नवाबों का शासन चला. इसका अंतिम शासक सिराजुद्दौला था. हालांकि, 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी के रॉबर्ट क्लाइव ने सिराजुद्दौला को प्लासी के युद्ध में हरा दिया. यहीं से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ भारत में ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई.
चौथी तारीख: बक्सर का युद्ध
बंगाल की सियासत की चौथी निर्णायक तारीख है 1764. इस दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं के खिलाफ मुगल सम्राट शाह आलम द्वितीय, बंगाल के नवाब मीर कासिम, महाराजा बलवंत सिंह और अवध के नवाब शुजा-उद-दौला की संयुक्त सेनाओं ने युद्ध लड़ा. इस चुनौतीपूर्ण युद्ध में ईस्ट इंडिया कंपनी को जीत हासिल हुई और हारे भारतीय शासकों को संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर होना पड़ा. इसी के साथ ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के दीवानी अधिकार प्राप्त हो गए.
पांचवी तारीख: कांग्रेस की हार और लेफ्ट का उदय
देश की आजादी के बाद अन्य राज्यों की तरह बंगाल में भी कांग्रेस की सरकार लंबे समय तक काबिज रही. फिर वो पांचवी तारीख आई, जिसने पश्चिम बंगाल की सियासत को पूरी तरह पलट कर रख दिया. 1947 से 1976 तक कांग्रेस शासन के बाद 1977 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर का वाम मोर्चा सत्ता में आया और ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने. वाम मोर्चा ने बंगाल की सियासत में अपनी जड़ें इतनी गहरी करीं कि अगले 34 साल तक उसे कोई हिला न पाया.
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छठी तारीख: पश्चिम बंगाल में ममता सरकार
पश्चिम बंगाल के सियासी इतिहास में 2011 एक बड़े परिवर्तन का साल रहा. सूबे के सियासत में ममता बनर्जी का उदय बड़ा टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ. 2011 के विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने 34 साल के लेफ्ट शासन को उखाड़ फेंका और 184 सीटें जीत कर सरकार बनाई. इसके बाद ममता का ऐसा दौर आया कि पश्चिम बंगाल की सियासत का पर्याय ही ममता बनर्जी बन गईं.
सातवीं तारीख: बनेगी बीजेपी सरकार?
पश्चिम बंगाल की सियासत बड़ी करवट ले रही है. 4 मई, 2026 यानी विधानसभा चुनाव के नतीजों का दिन भी यहां के सियासी इतिहास में अमर होता दिख रहा है. चुनाव आयोग के अब तक के रुझानों को देखें तो भारतीय जनता पार्टी यहां स्पष्ट बहुमत पाते दिख रही है, वहीं करीब 15 साल बाद ममता बनर्जी के शासन का अंत होता दिख रहा है.
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