Vande Bharat Train: भारतीय रेलवे के बेड़े को आधुनिक बनाने की दिशा में वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों का निर्माण एक मील का पत्थर साबित हो रहा है. देश की पटरियों पर जल्द ही दौड़ने वाली इन अत्याधुनिक स्लीपर ट्रेनों के लिए उच्च गुणवत्ता वाले उपकरणों की जरूरत होती है, जिनकी आपूर्ति देश के साथ-साथ चुनिंदा विदेशी कंपनियों द्वारा की जाती है. इन ट्रेनों के निर्माण में आने वाली लागत और विदेशी सप्लायरों की भूमिका देश के रेलवे इतिहास में एक नया अध्याय लिख रही है. आइए जानते हैं कि इस खास ट्रेन के पार्ट्स कौन सा देश बेचता है और एक ट्रेन बनाने में कितना खर्चा है.

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वैबटेक कंपनी के साथ बड़ा अनुबंध

भारतीय रेलवे ने वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों के लिए जरूरी कलपुर्जों की आपूर्ति का ठेका अमेरिकी कंपनी वैबटेक को सौंपा है. लगभग 839 करोड़ रुपये के इस महत्वपूर्ण अनुबंध के तहत यह बहुराष्ट्रीय कंपनी ट्रेनों के लिए अत्याधुनिक ब्रेक सिस्टम, स्वचालित दरवाजे और आधुनिक गैंगवे उपकरणों की सप्लाई करेगी. इन उन्नत उपकरणों के जुड़ने से ट्रेनों की गतिशीलता के साथ-साथ यात्रियों की सुरक्षा और रखरखाव की प्रक्रिया भी काफी हद तक आसान हो जाएगी.

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अमेरिका, फ्रांस और रूस की हिस्सेदारी

वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों के निर्माण में केवल घरेलू स्तर पर ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर कई नामी देशों के तकनीकी सहयोग की मदद ली जा रही है. मुख्य रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका, फ्रांस और रूस जैसे देशों की दिग्गज कंपनियां इस प्रोजेक्ट से जुड़ी हैं. ये देश ट्रेन के संचालन को सुचारू और सुरक्षित बनाने के लिए अलग-अलग महत्वपूर्ण तकनीकी उपकरण भारतीय निर्माताओं को उपलब्ध कराते हैं, जिससे ट्रेन की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की बनती है.

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फ्रांस और रूस की तकनीकी भागीदारी

विदेशी सप्लायर्स की सूची में फ्रांसीसी कंपनी एल्सटॉम का नाम भी प्रमुख है, जो इन ट्रेनों के लिए ट्रैक्शन कंपोनेंट्स और अन्य संवेदनशील इलेक्ट्रिकल उपकरणों की आपूर्ति करती है. इसके अलावा, भारत और रूस का एक संयुक्त उपक्रम किनेट रेलवे सॉल्यूशंस भी वंदे भारत स्लीपर ट्रेनों के डिजाइन तैयार करने और उनके निर्माण कार्य में अपनी अहम तकनीकी विशेषज्ञता का योगदान दे रहा है, जिससे ट्रेन की इंजीनियरिंग मजबूत हो रही है.

एक वंदे भारत ट्रेन बनाने की कुल लागत कितनी?

भारतीय रेलवे की एक स्टैंडर्ड 16 कोच वाली वंदे भारत एक्सप्रेस ट्रेन को तैयार करने में लगभग 115 से 120 करोड़ रुपये का भारी-भरकम खर्च आता है. वर्तमान में यह ट्रेन देश के भीतर निर्मित होने वाली सबसे महंगी और हाई-टेक यात्री गाड़ियों में शुमार की जाती है. यदि प्रति कोच के हिसाब से आकलन किया जाए, तो एक सिंगल कोच की अनुमानित कीमत करीब 6 से 7 करोड़ रुपये बैठती है, जो इसके आधुनिक ढांचे को दर्शाती है.

सेल्फ प्रोपल्शन तकनीक का प्रभाव

इन ट्रेनों के निर्माण में इतनी अधिक लागत आने का सबसे बड़ा कारण इसकी उन्नत तकनीक है, जिसे डिस्ट्रीब्यूटेड पावर या सेल्फ प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी कहा जाता है. पारंपरिक ट्रेनों की तरह इसमें अलग से इंजन नहीं होता, बल्कि हर दूसरे या तीसरे कोच के नीचे शक्तिशाली इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटर लगाए जाते हैं. इसी अनूठी तकनीक के कारण ट्रेन की रफ्तार और पिकअप बेहतरीन होती है, लेकिन निर्माण खर्च भी बढ़ जाता है.

यात्रियों के लिए आधुनिक सुविधाएं

वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के भीतर यात्रियों को विमान जैसी आरामदायक यात्रा का अनुभव देने के लिए कई विश्वस्तरीय फीचर्स शामिल किए गए हैं. इसमें पूरी तरह से ऑटोमेटिक स्लाइडिंग दरवाजे, मौसम के अनुकूल सील्ड गैंगवे, विमान जैसी आरामदायक सीटें, सेंसर पर आधारित बायो-टॉयलेट और ऑनबोर्ड डायग्नोस्टिक्स जैसी आधुनिक सुविधाएं शामिल हैं, जो सफर को बेहद सुखद और आरामदायक बनाती हैं.

सुरक्षा और ऊर्जा बचत के उपाय

इन ट्रेनों की सुरक्षा प्रणाली को बेहद मजबूत बनाया गया है. इसमें भारत की स्वदेशी ट्रेन प्रोटेक्शन तकनीक कवच, अत्याधुनिक सीसीटीवी कैमरे, आग लगने की घटना को तुरंत भांपने और बुझाने वाले स्वचालित उपकरण तथा इमरजेंसी टॉक-बैक सिस्टम पहले से ही फिट होते हैं. इसके अलावा रीजेनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक ब्रेक लगाते समय ऊर्जा पैदा करती है और उसे वापस सिस्टम में भेजकर बिजली की बचत करती है.

उत्पादन बढ़ने से कम होगी लागत

रेलवे अधिकारियों का मानना है कि भविष्य में जब इन अत्याधुनिक स्लीपर ट्रेनों का निर्माण बड़े पैमाने पर यानी मास प्रोडक्शन के जरिए किया जाएगा, तो प्रति यूनिट आने वाली लागत में स्वतः कमी आएगी. जैसे-जैसे देश की विभिन्न निर्माण इकाइयों में इन रैक का उत्पादन बढ़ेगा, कच्चे माल और पुर्जों की थोक खरीद के चलते इसके निर्माण खर्च को नियंत्रित करने में बड़ी मदद मिलेगी.

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