भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) ने आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे के साथ-साथ एशियन गेम्स के लिए भी अपनी टी20 टीम का एलान कर दिया है. उम्मीद के मुताबिक 15 साल के युवा स्टार वैभव सूर्यवंशी को भारतीय टीम में जगह मिल गई है. मैदान पर रनों की बौछार करने वाले वैभव अब विज्ञापनों के बाजार में भी छाने लगे हैं. कॉम्प्लान और रेड बुल जैसे बड़े ब्रांड्स ने इस युवा खिलाड़ी को अपना एंबेसडर बनाया है. हालांकि, टीम इंडिया के सीनियर दिग्गजों जैसे विराट कोहली और रोहित शर्मा की तरह वे खुलकर हर ब्रांड का विज्ञापन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनके सामने उम्र और नियमों की कई बड़ी दीवारें खड़ी हैं. आइए जानें. 

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उम्र और कानून की पहली बंदिश

वैभव सूर्यवंशी की उम्र अभी केवल 15 साल है, जिसका मतलब है कि वे कानूनी तौर पर एक नाबालिग हैं. भारत में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के काम करने और विज्ञापनों में हिस्सा लेने को लेकर सरकार के बेहद सख्त दिशा-निर्देश लागू हैं. बाल श्रम कानूनों के तहत उनके शूटिंग के घंटों पर कड़ी नजर रखी जाती है और किसी भी व्यावसायिक समझौते के लिए उनके माता-पिता की लिखित अनुमति होना अनिवार्य है. विराट या रोहित जैसे सीनियर खिलाड़ी पूरी तरह स्वतंत्र होकर फैसले ले सकते हैं, जबकि वैभव के मामलों में हर कानूनी पहलू को बेहद बारीकी से परखा जाता है.

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सरोगेट विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक

क्रिकेट की दुनिया में अक्सर खिलाड़ी शराब, तंबाकू या ऑनलाइन सट्टेबाजी (Gaming) से जुड़े ब्रांड्स का प्रत्यक्ष या परोक्ष (Surrogate Advertising) रूप से प्रचार करते नजर आते हैं. मगर वैभव सूर्यवंशी के मामले में कानूनी और नैतिक रूप से ऐसा करना पूरी तरह असंभव है. एक नाबालिग खिलाड़ी को ऐसे विवादित या हानिकारक उत्पादों का चेहरा नहीं बनाया जा सकता है. अगर कोई कंपनी ऐसा प्रयास भी करती है, तो बीसीसीआई और देश के कड़े विज्ञापन नियम उस पर तुरंत रोक लगा देंगे. इसलिए वैभव के पास विज्ञापनों के विकल्प बेहद सीमित और सुरक्षित श्रेणियों तक ही सीमित रहते हैं.

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बोर्ड और फ्रेंचाइजी का कड़ा पहरा

विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे दिग्गज खिलाड़ी बीसीसीआई के ए-प्लस केंद्रीय अनुबंध (Central Contract) के तहत आते हैं, जहां उनके विज्ञापनों के नियम और कमर्शियल राइट्स पूरी तरह से तय और स्पष्ट होते हैं. इसके विपरीत, वैभव जैसे उभरते हुए युवा खिलाड़ियों पर बीसीसीआई और उनकी आईपीएल फ्रेंचाइजी के नियमों का कड़ा पहरा होता है. बोर्ड और फ्रेंचाइजी यह सुनिश्चित करते हैं कि किसी भी कमर्शियल डील की वजह से खिलाड़ी के खेल या उसकी छवि को नुकसान न पहुंचे. यही वजह है कि उनकी हर व्यावसायिक डील को बोर्ड की मंजूरी के बाद ही अंतिम रूप दिया जाता है.

खेल पर फोकस रखने की चुनौती

क्रिकेट पंडितों और बीसीसीआई का हमेशा से यह मानना रहा है कि इतनी छोटी उम्र में अत्यधिक व्यावसायिक दबाव (Commercialization) युवा खिलाड़ियों के मानसिक और शारीरिक विकास को भारी नुकसान पहुंचा सकता है. 15 साल की उम्र में वैभव का मुख्य ध्यान अपने खेल को सुधारने और टीम इंडिया में जगह पक्की करने पर होना चाहिए, न कि विज्ञापनों की शूटिंग में घंटों वक्त गंवाने पर. अत्यधिक पैसों और चकाचौंध के बीच कहीं खिलाड़ी का फोकस खेल से न भटक जाए, इसलिए भी उनके विज्ञापनों और ब्रांड एंडोर्समेंट की संख्या को जानबूझकर सीमित रखा जाता है.

ब्रांड वैल्यू और इमेज का अंतर

विराट कोहली और रोहित शर्मा ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में दशकों तक पसीना बहाकर अपनी एक वैश्विक ब्रांड वैल्यू बनाई है, जिसकी तुलना अभी करियर शुरू कर रहे खिलाड़ी से नहीं की जा सकती. ब्रांड्स इस समय वैभव सूर्यवंशी को एक भविष्य के निवेश के रूप में देख रहे हैं. उनकी छवि अभी केवल बच्चों और युवाओं से जुड़े न्यूट्रिशन ड्रिंक या एनर्जी प्रोडक्ट्स के लिए ही सबसे सटीक बैठती है. जैसे-जैसे उनका प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और निखरेगा, उनकी ब्रांड वैल्यू और विज्ञापनों का दायरा भी सीनियर खिलाड़ियों की तरह बड़ा होता चला जाएगा.

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