नेपाल के रसुवा जिले में भोटेकोशी नदी पर आई भीषण बाढ़ ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया. तिब्बत की तरफ स्थित किसी ग्लेशियर झील के अचानक फटने यानी ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड से आई इस बाढ़ में 384 से ज्यादा लोग लापता हो गए, जिनमें भारत के करीब 105 पर्यटक भी शामिल थे. कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी इस बाढ़ में बह गए. इस हादसे के बाद वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह सिर्फ नेपाल की त्रासदी नहीं है, बल्कि भारत के हिमालयी राज्यों के लिए भी एक बड़ा अलार्म है और इसमें सबसे ज्यादा नाम आ रहा है हिमाचल प्रदेश का.

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उत्तराखंड पर क्यों है आपदा का खतरा?

उत्तराखंड और नेपाल दोनों की भौगोलिक बनावट बिल्कुल एक जैसी है, क्योंकि दोनों ही सेंट्रल हिमालयन बेल्ट का हिस्सा हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह पूरा इलाका दुनिया के सबसे संवेदनशील भूकंपीय क्षेत्रों में आता है. 26 अगस्त को नेपाल में जो हुआ, वह कोई सामान्य बाढ़ नहीं थी. वहां ग्लेशियर टूटने से पानी, बर्फ, मिट्टी और बड़ी-बड़ी चट्टानों का ऐसा सैलाब निकला जिसने 100 किलोमीटर तक के रास्ते में आने वाले गांवों, जलविद्युत परियोजनाओं और पुलों को पूरी तरह तबाह कर दिया. उत्तराखंड के केदारनाथ (2013) और चमोली (2021) में भी ठीक इसी तरह ग्लेशियर फटने और एवलांच के कारण तबाही मच चुकी है.

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कैसे तैयार रहते हैं उत्तराखंड के लोग?

नेपाल की ताज़ा त्रासदी के बाद उत्तराखंड के सीमावर्ती जिलों, जैसे चंपावत और पिथौरागढ़ में अलर्ट बढ़ा दिया गया है. राज्य आपदा प्रतिवादन बल SDRF को शारदा और अन्य नदियों के तटों पर कड़ी निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं.  26 अगस्त जैसी घटनाओं से सीख लेते हुए उत्तराखंड की संवेदनशील झीलों और ग्लेशियरों के पास विशेष सेंसर और स्वचालित मौसम स्टेशन लगाए जा रहे हैं. पानी का स्तर अचानक बढ़ने पर ये सिस्टम तुरंत निचले इलाकों में सायरन और संदेशों के जरिए चेतावनी भेज देते हैं, जिससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाने का कीमती समय मिल जाता है.

साथ ही, उत्तराखंड के गांवों में स्थानीय युवाओं और महिलाओं को आपदा प्रबंधन की खास ट्रेनिंग दी जाती है. चूंकि भारी लैंडस्लाइड या बाढ़ के समय बाहरी मदद पहुंचने में वक्त लगता है, इसलिए ये स्थानीय लोग ही फर्स्ट रिस्पॉन्डर बनकर तुरंत राहत और बचाव कार्य शुरू कर देते हैं. इसके अलावा सीमावर्ती इलाकों में पुलों और सड़कों को इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे अचानक आने वाले पानी के तेज बहाव को झेल सकें. सेना, NDRF और SDRF की टीमें आधुनिक सैटेलाइट फोन और लाइफ-सपोर्ट उपकरणों के साथ हर वक्त मुस्तैद रहती हैं. 

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