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US Citizens Detained: आम मोबाइल से कितने अलग होते हैं सैटेलाइट फोन, इनकी ट्रैकिंग कितनी मुश्किल?

US Citizens Detained: श्रीनगर एयरपोर्ट पर दो अमेरिकी नागरिकों को सेटेलाइट फोन के साथ पकड़ा गया है. आइए जानते हैं कि सेटेलाइट फोन आम फोन से कितने अलग होते हैं.

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  • श्रीनगर एयरपोर्ट पर दो अमेरिकी नागरिकों से मिला सेटेलाइट फोन।
  • सेटेलाइट फोन सीधे सैटेलाइट से जुड़ता है, दुर्गम जगहों पर भी काम करता है।
  • इनकी कीमत ज्यादा होती है और इन्हें ट्रैक करना जटिल होता है।
  • भारत में बिना इजाजत सेटेलाइट फोन रखना अवैध है।

US Citizens Detained: रविवार को श्रीनगर एयरपोर्ट पर एक सिक्योरिटी अलर्ट ने सबका ध्यान खींचा. दरअसल दो अमेरिकी नागरिकों के समान से एक सेटेलाइट फोन बरामद हुआ है. सुरक्षा अधिकारियों ने दोनों अमेरिकी नागरिकों को हिरासत में ले लिया है. इसी बीच लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि आखिर सेटेलाइट फोन आम मोबाइल फोन से कैसे अलग होते हैं? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

दोनों फोन की कनेक्टिविटी 

सबसे बड़ा फर्क इन दोनों डिवाइस के कनेक्ट होने के तरीके में है. आम मोबाइल फोन आसपास के टेलीकॉम टावर पर निर्भर होता है. इससे उनका इस्तेमाल सिर्फ उन्हीं इलाकों तक सीमित रहता है जहां नेटवर्क कवरेज होता है. दूसरी तरफ सेटेलाइट फोन सीधे अंतरिक्ष में मौजूद सेटेलाइट से कनेक्ट होते हैं. इससे वे समुद्र, रेगिस्तान और पहाड़ों जैसे दूर दराज के इलाकों में भी काम कर पाते हैं.

डिजाइन और तकनीकी बनावट 

सेटेलाइट फोन आम स्मार्टफोन से अलग बनाए जाते हैं. इनमें आमतौर पर बड़े बाहरी एंटीना लगे होते हैं. ऐसा इसलिए ताकि वे सीधे सैटेलाइट को सिग्नल भेजें और उनसे सिग्नल पा सकें. यह डिजाइन लंबी दूरी तक एक स्थिर कनेक्शन बनाए रखने के लिए जरूरी है. लेकिन इसकी वजह से ये फोन आम फोन के मुकाबले ज्यादा भारी हो जाते हैं.

क्या होती है इनकी कीमत? 

सेटेलाइट फोन का इस्तेमाल करना काफी महंगा पड़ता है. भारत में सिर्फ डिवाइस की कीमत ही डेढ़ लाख रुपये या फिर उससे ज्यादा हो सकती है. इसके अलावा कॉल करने का खर्च भी आम मोबाइल टैरिफ के मुकाबले काफी ज्यादा होता है. इस वजह से ये एक खास तरह का टूल बन जाता हैं. इनका इस्तेमाल आमतौर पर सेना के जवान, रिसर्चर और इमरजेंसी सेवाओं से जुड़े लोग करते हैं.

घर के अंदर इस्तेमाल 

आम फोन के उलट सेटेलाइट फोन को काम करने के लिए आसमान का साफ नजारा चाहिए होता है. ये घर के अंदर या फिर घनी इमारतों वाले इलाकों में ठीक से काम नहीं करते. ऐसा इसलिए क्योंकि इमारतें, पेड़ या फिर दूसरी रुकावटें सैटेलाइट तक सिग्नल पहुंचने में बाधा डाल सकती हैं. 

क्या इन्हें ट्रैक किया जा सकता है? 

सेटेलाइट फोन को ट्रैक करना आम मोबाइल फोन को ट्रैक करने से ज्यादा पेचीदा काम है. टावर ट्रायंगुलेशन जैसे पुराने ट्रैकिंग तरीके यहां काम नहीं आते. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें जमीन पर कोई टावर शामिल नहीं होता. लेकिन इसके बावजूद भी एजेंसियां जीपीएस का इस्तेमाल करके या फिर सैटलाइट कम्युनिकेशन डेटा को इंटरसेप्ट करके इन डिवाइस को ट्रैक कर सकती हैं.

भारत में कानून 

सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं की वजह से भारत में सेटेलाइट फोन के इस्तेमाल पर कड़ी पाबंदियां हैं. बिना इजाजत के इन्हें अपने पास रखना या फिर इस्तेमाल करना आपको हिरासत में लिए जाने या फिर गिरफ्तार होने की वजह बन सकता है.

यह भी पढ़ें:  इस देश की राजनीति में नहीं है एक भी महिला, भारत का है पड़ोसी

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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