US Iran Deal: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच अभी एक सीजफायर लागू है. लेकिन इसके बावजूद भी यह संघर्ष अभी खत्म होने से काफी दूर है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नई चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अगर ईरान किसी समझौते पर पहुंचने में नाकाम रहता है तो उसे गंभीर नतीजे का सामना करना पड़ सकता है.  दुनिया भर के संघर्षों को रोकने का दावा करने वाले ट्रंप ईरान के साथ चल रहे इस मतभेद का कोई हल निकालने में नाकाम नजर आ रहे हैं. आइए जानते हैं कि आखिर ट्रंप क्यों नहीं कर पा रहे ईरान के साथ डील और किन बातों पर दोनों की सहमति नहीं बन पा रही है.

क्या है सबसे बड़ी रुकावट? 

इस विवाद की सबसे बड़ी रुकावट ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. दरअसल अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने एनरिच्ड यूरेनियम के भंडार को पूरी तरह से खत्म कर दे और परमाणु हथियार बनाने के हर संभावित रास्ते को रोक दे.  हालांकि ईरान का यह जोर है कि उसकी परमाणु गतिविधि शांतिपूर्ण ऊर्जा उद्देश्यों के लिए है और वह इसे अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता का मामला मानता है. 

होर्मुज स्ट्रेट पर तनाव 

एक और बड़ी अड़चन होर्मुज स्ट्रेट पर कंट्रोल को लेकर है. यह दुनिया के सबसे जरूरी तेल मार्गों में से एक है. अमेरिका यह आश्वासन चाहता है कि ईरान इस मार्ग को बाधित नहीं करेगा. इससे वैश्विक ऊर्जा प्रवाह बिना किसी रूकावट के जारी रह पाएगा. 

दूसरी तरफ ईरान ने यह साफ कर दिया है कि जब तक अमेरिका के प्रतिबंध जारी रहेंगे वह इस रास्ते से मुक्त आवाजाही की गारंटी नहीं देगा. असल में तेहरान पहले इस मार्ग को बाधित करने की अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर चुका है. 

प्रतिबंध और जब्त संपत्ति का विवाद 

आर्थिक दबाव एक और बड़ी बाधा है. रिपोर्ट्स में यह संकेत मिलता है कि अमेरिका किसी समझौते के तहत ईरान की जब्त की गई अरबों डॉलर की संपत्तियों को जारी कर सकता है. लेकिन ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर ऐसे किसी भी कदम से इनकार कर दिया है. ईरान किसी भी समझौते के लिए प्रतिबंधों में राहत को जरूरी मानता है और अमेरिका प्रतिबंधों को अपनी सौदेबाजी के सबसे मजबूत हथियार के तौर पर देखता है.

क्षेत्रीय समूह को दिया जाने वाला समर्थन 

अमेरिका ने यह मांग की है कि ईरान हिज्बुल्लाह और हमास जैसे क्षेत्रीय समूहों को दिया जाने वाला अपना समर्थन खत्म कर दे.  अमेरिका इन ग्रुप्स को मिडिल ईस्ट में अस्थिरता फैलाने वाली ताकतों के तौर पर देखता है. हालांकि ईरान इन्हें इस क्षेत्र में अपने रणनीतिक प्रभाव और रक्षा नेटवर्क का एक हिस्सा मानता है.

भरोसे की कमी 

शायद सबसे अहम मुद्दा भरोसे की कमी है. ईरान अभी भी सतर्क है क्योंकि ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका ने 2018 में पिछले परमाणु समझौते से खुद को अलग कर दिया था. इस इतिहास के वजह से ईरान किसी भी नए समझौते को लेकर शंका में रहता है.

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