US Military Bases India: जैसे-जैसे मध्य पूर्व में तनाव बढ़ता जा रहा है पूरी दुनिया भर में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर खतरा मंडरा रहा है. ईरान का दावा है कि हमले में कुछ अमेरिकी सैन्य ठिकाने तबाह भी हो गए हैं. इस दौरान लोगों के बीच एक सवाल उठ रहा है कि अमेरिका जैसा देश जिसके दुनिया भर में सैकड़ों सैन्य ठिकाने हैं भारत में अपना कोई ठिकाना क्यों नहीं रखता? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.
क्या है भारत की नीति?
इस फैसले के पीछे भारत का रणनीतिक स्वायत्तता का सिद्धांत है. यह सिद्धांत विदेश और रक्षा नीति में स्वतंत्र फैसले लेने पर जोर देता है. आजादी के बाद से भारत ने खुद को किसी भी सैन्य गुट से जोड़ने से परहेज किया है. यह गुटनिरपेक्ष आंदोलन का भी संस्थापक सदस्य था. किसी विदेशी सैन्य ठिकाने को अनुमति देना संप्रभुता से समझौता करना जैसा माना जाता है. यह एक ऐसे ही बात थी जिसे जवाहरलाल नेहरू के समय से लेकर नरेंद्र मोदी के समय तक लगातार ध्यान में रखा गया है.
वैश्विक संघर्षों में सीधे तौर पर शामिल होने से बचना
किसी विदेशी ठिकाने को अपने यहां जगह देने से कोई देश संघर्षों के दौरान सीधा निशाना बन सकता है. मध्य पूर्व जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी ठिकानों पर युद्ध के समय अक्सर हमले होते रहते हैं. भारत ऐसे जोखिमों से खुद को दूर रखना पसंद करता है. किसी अमेरिकी ठिकाने को अनुमति देने से भारत ईरान या फिर दूसरे देशों से जुड़े संघर्षों में खिंच सकता है.
बड़ी ताकतों के साथ संबंधों में संतुलन
भारत कई वैश्विक ताकतों के साथ रणनीतिक संबंध बनाए रखता है. इनमें अमेरिका, रूस और यहां तक कि चीन के साथ भी जटिल संबंध शामिल हैं. किसी अमेरिकी सैन्य ठिकाने को अनुमति देने से यह संतुलन बिगड़ सकता है.
मजबूत सैन्य क्षमताएं निर्भरता को कम करती हैं
एक और मुख्य वजह भारत की अपनी सैन्य ताकत है. भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है. साथ ही परमाणु क्षमता और नौसेना की बढ़ती मौजूदगी भी है. इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए विदेशी सैनिकों या ठिकानों की जरूरत कम हो जाती है. भारत बाहरी सैन्य बुनियादी ढांचे पर निर्भर रहने की बजाय आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देता है.
भारत अमेरिका रक्षा संबंध
हालांकि भारत में कोई अमेरिकी सैन्य ठिकाना नहीं है लेकिन इसके बावजूद भी दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को काफी मजबूत है. लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट जैसे समझौते दोनों देशों को लॉजिस्टिक्स जैसे कि ईंधन भरने और मरम्मत करने के लिए एक दूसरे की सैन्य सुविधाओं का इस्तेमाल करने की अनुमति देते हैं. हालांकि यह सुविधा पूरी तरह से पहुंच तक ही सीमित है, इसका मतलब स्वामित्व या स्थायी तैनाती नहीं है.
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